भारत में फलों की खेती

भारत में स्थलाकृतिक, जलवायविक तथा मृदा संबंधी विविधताएं हैं। अतः यहां विविध प्रकार के फल उत्पादित किए जाते हैं, जिनमें सेब, आलू बुखार, केला, अनार, नाशपाती, पपीता, अनन्नास, अंगूर, नारंगी, नारियल, आम, आडू, खुबानी इत्यादि प्रमुख हैं।

उष्णकटिबंधीय फल Tropical Fruits

सेब Apple– Malus domestica

सेब के उत्पादन के लिए उपयुक्त जलवायु दशाएं- ग्रीष्म में 15° सेंटीग्रेड तापमान तथा 610-760 मिलीमीटर वर्षा। ठंडे प्रदेशों में ही इसका उत्पादन संभव होता है। सेब का उपयोग एक प्रकार के पेय (शराब) के रूप में किया जाता है। भारत में सेब का उत्पादन जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं छोटे-स्तर पर नीलगिरि में होता है।

खजूरDate palm- Phoenix dactylifera

खजूर का उत्पादन मरुस्थलीय परिस्थितियों में होता है। इसके लिए सिंचाई द्वारा मिट्टी में पर्याप्त जल की आवश्यकता होती है और खजूर के पौधे का विकास उच्च तापमान के बिना संभव नहीं है। कुहासा या बादल-रहित आर्द्रता और सूर्याच्छादित आकाश खजूर के लिए अनुकूल परिस्थिति है। इसलिए, खजूर पूर्णतः उष्णकटिबंधीय फल नहीं है।

केला Banana– Musa paradisiaca

उष्ण एवं आर्द्र जलवायु में उत्पादित होने वाले केले के मुख्य रूप से दो प्रकार हैं- कच्चा खाने योग्य एवं पका खाने योग्य। चेन्नई में पूवन (आंध्र प्रदेश में इसे चक्करेकेली भी कहा जाता है); पश्चिम बंगाल में चम्पा और अमृतसागर; ओडीशा और असम में चम्पा; महाराष्ट्र में सफेद वेल्ची, लाल वेल्ची और राजेली और बिहार में मालभोग चिनिया तथा हरा छाल  पका खाने योग्य होता है। नंद्रन, मिन्डोली, मूठिया, बागनेर आदि कच्चा खाने योग्य फसल है।

केले का उत्पादन उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होता है, जहां तापमान 15° सेंटीग्रेड से कम न हो और न्यूनतम वार्षिक वर्षा 150 सेंटीमीटर होती हो। तटीय मैदान तथा सिंचाई की सुविधा से युक्त प्रायद्वीपीय क्षेत्र की जलवायु केले के उत्पादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।

केले का उत्पादन तीन राज्यों में सबसे ज्यादा होता है- महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल। गुजरात, असम, आंध्र प्रदेश, ओडीशा, बिहार, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय आदि अन्य मुख्य उत्पादक राज्य हैं।

अनन्नास Pineapple– Ananas comosus

आर्द्रतापूर्ण उष्णकटिबंधीय जलवायु का फल है। यह मैदानी क्षेत्र और 900 मीटर तक की ऊंचाई वाले ढलान पर उत्पादित होता है। अनन्नास के उत्पादन के लिए सभी प्रकार की मिट्टियां उपयुक्त होती हैं। भारत में असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक आदि राज्यों में मुख्य रूप से अनन्नास का उत्पादन होता है।

काजू cashewAnacardium occidentale

काजू का उत्पादन मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत में होता है। इसका उपयोग हम कच्चे फल एवं सूखे फल दोनों रूपों में करते हैं, परंतु अधिक उपयोग सूखे फल के रूप में करते हैं। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने भारत को काजू से परिचित करवाया। वैसे, काजू का उद्भव स्थल ब्राजील है।

अधिक गर्मी या अधिक ठंड काजू के लिए हानिकारक मानी जाती है। इसके उत्पादन के लिए उपयुक्त तापमान लगभग 20°C होता है और वर्षा 50 से.मी. से 200 से.मी. के बीच होती है। काजू का फल सामान्यतः मार्च से मई के बीच पक जाता है, परंतु नवंबर-दिसंबर में अधिक वर्षा हो जाने पर यह आगे भी बढ़ सकता है। इसके उत्पादन के लिए मिट्टी का कोई निश्चित प्रकार आवश्यक नहीं होता है। वैसे यह कंकरीली मिट्टी में भी हो जाता है।

काजू का मुख्य उत्पादन केरल के तटीय जिलों, कर्नाटक और महाराष्ट्र में होता है। तमिलनाडु के पूर्वी तट, ओडीशा, पश्चिम बंगाल और पुदुचेरी के समुद्रतटीय क्षेत्रों तथा त्रिपुरा में भी काजू का उत्पादन होता है। केरल काजू का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। भारत काजू के उत्पादन तथा निर्यात में विश्व में अग्रणी है और विश्व की कुल मांग के 50 प्रतिशत काजू की आपूर्ति करता हैं।

आम Mango- Mangifera indica

भारत में समुद्र तल से 1,500 मीटर की ऊंचाई पर आम का वृक्ष लगाया जाता है। इसके उत्पादन के लिए 75 से 250 से.मी. वार्षिक वर्षा और औसतन 28°C का तापमान उपयुक्त माना जाता है। आम का फल जून से सितंबर के बीच उत्पादित होता है, हालांकि बौर (फूल) लगने की प्रक्रिया फरवरी-मार्च में ही शुरू हो जाती है। आम का उत्पादन सभी प्रकार की जलवायु और मिट्टियों में होता है।

आम का सबसे अधिक उत्पादन भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में होता है। आध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल अन्य आम उत्पादक राज्य हैं। भारत में उत्पादित होने वाली आम की कुछ प्रमुख किस्में हैं- चौसा, सफेदा, लंगड़ा, दशहरी आदि उत्तर प्रदेश और बिहार में, अल्फांसो महाराष्ट्र और गोवा में, बंगाना पल्ली आंध्र प्रदेश में, तोतापरी और केसर गुजरात में तथा रूमानी एवं नीलम तमिलनाडु एवं कर्नाटक में।

उपोष्ण एवं उष्ण तापमान वाले फल Subtropical and Tropical Fruit

इन क्षेत्रों में उत्पादित होने वाले फलों में खट्टे फल, यथा- नारंगी, नीबू और अंगूर हैं। भूमध्यसागर में इस तरह का तापमान पाया जाता है। इन क्षेत्रों में अखरोट और बादाम भी उत्पादित होते हैं। बादामों का उत्पादन सबसे अधिक भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में होता है।

अंगूर GrapeVitis Vinifera

यह उपोष्णकटिबंधीय फल है, पर इसका उत्पादन शुष्क जलवायु में भी होता है। अंगूर में अच्छी वृद्धि सूखे तापमान, थोड़ी ठंड और लंबी शुष्क ग्रीष्म जलवायु में होती है। उष्णार्द्र क्षेत्रों में इसका उत्पादन नहीं किया जा सकता। अंगूर खुली जगहों में दोमट मिट्टी में सिंचाई की सुविधा के उपरांत वृद्धि करता है।

भारत में अंगूर की विभिन्न किस्मों का उत्पादन होता है। उत्तरी मैदान में ब्लैक प्रिंस, बेदाना और फॉस्टर,, सम शीतोषण कटिबंध में बीज रहित थॉम्पसन, सुल्ताना और सफ़ेद किशमिश, दक्षिण भारत में बंगलुरु ब्ल्यू, पंचद्राक्ष, गुलाबी, ब्लैक चम्पा और बीज रहित थॉम्पसन, पश्चिमी भारत में चीमा साहेबी, अनाबे शाही और बीज रहित थॉम्पसन का उत्पादन होता है। पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में मुख्य रूप से अंगूर का उत्पादन होता है।

नारंगी Orange- Citrus reticulate

इस फल का उत्पादन मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होता है। वर्तमान में इसे भूमध्यसागरीय फल कहते हैं। इसके लिए आदर्श स्थिति गर्मी, सूर्य की रोशनी तथा मध्यम शीत है। यह सूखे की स्थिति को सहन नहीं कर पाता है। जाड़े में नारंगी की फसल को स्वच्छ ठंडा तापमान मिलना आवश्यक होता है, जो उसकी वृद्धि की सही जानकारी देता है।

भारत में नारंगी का उत्पादन समुद्रतल से 600 से 1,500 मीटर की ऊंचाई पर होता है। इसके उत्पादन के लिए लगभग मिट्टी के विभिन्न प्रकार उपयुक्त होते हैं, परंतु आदर्श मिट्टी मध्यम और निम्न दोमट मिट्टी होती है। भारी काली मिट्टी में भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के बाद नारंगी का उत्पादन किया जा सकता है। आर्द्र पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती ढाल बनाकर की जाती हैं।

भारत में इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं-असम, नागपुर, पंजाब, वाइनाड, कुर्ग, पालनी पहाड़ी, नीलगिरि और हिमाचल प्रदेश।

नारियल Coconut- Cocos nucifera

इसका उत्पादन आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु में होता है। नारियल के उत्पादन के लिए 100 से 225 सें.मी. की वार्षिक वर्षा और तापमान 27 “C (6 से 7°C का फर्क हो सकता है) होना आवश्यक होता है। 6-7 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक पुराना पौधा अधिक उपज देता है।

नारियल मुख्यतया नदी घाटियों या नदी तटों पर उपजाया जाता है। इसके लिए बलुई दोमट उपयुक्त होती है, परन्तु इसका उत्पादन लाल दोमट, हल्की भूरी मिट्टी, हलकी काली मिट्टी और दलदली मिट्टी में भी होता है। नारियल को विविध प्रकार से उपयोग में लाया जाता है। इसके पौधे से गरी, लकड़ी, रेशा, तेल आदि विविध वस्तुएं पायी जाती हैं। नारियल की खेती मुख्य रूप से गरी की प्राप्ति के लिए होती है, जिससे तेल और खली की प्राप्ति होती है। एक वर्ष से अधिक समय में नारियल का पेड़ लगभग 15 नारियल देता है। हर एक-दो महीने पर इसकी कटाई की जाती है, जिससे 4.5 लीटर (1 गैलन) तेल की प्राप्ति होती है। नारियल की सूखी गरी से तेल निकाला जाता है। इसकी लकड़ी और भित्ति का उपयोग ईंधन के रूप में होता है। नारियल के रेशे का उपयोग सोफा आदि गद्दीदार वस्तुओं के निर्माण में होता है। इसके अलावा डंठल से ब्रश और झाड़ू बनाये जाते हैं।

नारियल उत्पादन के प्रमुख उत्पादक देश फिलीपींस और इंडोनेशिया हैं। भारत और श्रीलंका भी इसके मुख्य उत्पादक देश हैं। भारत में नारियल उत्पादन में मुख्य योगदान क्रमशः केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का होता है।

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