संघीय कार्यपालिका: उपराष्ट्रपति

Union Executive: The Vice President

उपराष्ट्रपति

भारत के राष्ट्रपति के बाद अधिकृत अग्रता-अधिपत्र में सर्वोच्च स्थान उपराष्ट्रपति को प्रदान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद-63 के अनुसार भारत की संघीय कार्यपालिका में उपराष्ट्रपति पद की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद-64 के अनुसार उपराष्ट्रपति को राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। यह अमेरिकी प्रथा का अनुसरण है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति के रूप में राज्यसभा की कार्यवाहियों का सभापतित्व करता है और लोकसभा में अपने प्रतिरूप अध्यक्ष की भांति ही सभा के सभी मामलों से संबद्ध कायों का निर्वहन करता है।

यद्यपि संविधान द्वारा उपराष्ट्रपति को कोई विशेष अधिकार नहीं प्रदान किए गए हैं, लेकिन प्रथा के अनुसार, वह अनेक औपचारिक कृत्य करने लगा है। वह राजदूतों तथा विदेशों के विशिष्ट व्यक्तियों आदि से भेंट करता है। उपराष्ट्रपति का मुख्य कार्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति की तरह उच्च सदन की अध्यक्षता करना है।

राष्ट्रपति को संविधान द्वारा विस्तृत कार्यकारी, विधायी, न्यायिक, राजनयिक एवं आपातकालीन शक्तियां प्राप्त हैं, जिनका प्रयोग वह स्वयं या उसके नाम से उसके अधीनस्थ अधिकारी करते हैं।भारत के राष्ट्रपति को आत्यंतिक वीटो, निलम्बनकारी वीटो एवं जेबी वीटो की शक्ति प्राप्त है।

अनुच्छेद-65 में कहा गया है कि उपराष्ट्रपति निम्न परिस्थितियों में राष्ट्रपति का पद ग्रहण कर सकता है-

राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग, महाभियोग अथवा अन्य किसी प्रकार से पदच्युत होने तथा रोग या अनुपस्थिति के कारण कार्यभार संचालन में असमर्थ होने पर।

जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करेगा, तब वह राज्यसभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा।

जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में उसके कार्यों का निर्वहन करेगा, तब उसे राष्ट्रपति की सम्पूर्ण शक्तियां और उन्मुक्तियां उपलब्ध होगी। संविधान की द्वितीय सूची के अनुसार जब कभी उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति का पद ग्रहण करता है तो उसे राष्ट्रपति पद के वेतन भत्ते तथा विशेषाधिकार सभी प्राप्त होते हैं। उपराष्ट्रपति केवल छः महीने तक ही राष्ट्रपति का पद संभाल सकता है।

निर्वाचन प्रक्रिया

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बन्ने वाले निर्वाचक-मंडल के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है (अनुच्छेद-66)। उपराष्ट्रपति का चुनाव भी अप्रत्यक्ष प्रणाली के आधार पर किया जाता है। संविधान के ग्यारहवें संशोधन (1961) के अनुसार, अब आवश्यक नहीं है। उपराष्ट्रपति के चुनाव संबंधी विवाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुलझाये जाते हैं।

योग्यता

उपराष्ट्रपति के रूप में किसी व्यक्ति के निर्वाचन के लिए पात्रता की शर्ते वही हैं, जो राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए हैं।

  1. भारत का नागरिक
  2. पैंतीस वर्ष से ऊपर की आयु
  3. राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल या संघ या किसी राज्य के मंत्री का पद छोड़कर कोई और लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए (अनुच्छेद 66) ।

पदावधि एवं हटाये जाने की स्थिति

उपराष्ट्रपति पद की पदावधि पांच वर्षों की होती है। उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है। वह राज्यसभा के ऐसे संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है जिसे राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित किया गया हो और जिसे लोकसभा की सहमति प्राप्त हो। उसे हटाए जाने के लिए महाभियोग की आवश्यकता नहीं है लेकिन उपराष्ट्रपति को 14 दिन पूर्व नोटिस देना आवश्यक है। जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तब उसे महाभियोग लगाकर उसी विधि से हटाया जा सकेगा जिस विधि से संविधान में राष्ट्रपति को हटाये जाने की व्यवस्था है।

राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों की तुलना
राष्ट्रपतिउप-राष्ट्रपति
निर्वाचन
निर्वाचक मंडल द्वारा निर्वाचित होता है जो-संसद के दोनों सदनों; औरराज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनता है।आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारासंसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनाने वाले निर्वाचक मंडल द्वारा निर्वाचित होता है।आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारा
निर्वाचन के लिए अहर्ताएं
भारत का नागरिक होना चाहिए35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हत होना चाहिए, तथा;भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं होना चाहिए। किंतु इसके अपवाद हैं- राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल या संघ या राज्य के मंत्री का पद । भारत का नागरिक होना चाहिए35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हत होना चाहिए, तथा;राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल या संघ या किसी राज्य के मंत्री का पद छोड़कर कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए।
पदावधि
पांच वर्ष की पदावधि होती है।इसके पहले उप-राष्ट्रपति को संबोधित लेख द्वारा अपने पद का त्याग कर सकता है।महाभियोग की प्रक्रिया से हटाया जा सकता है।पुनः निर्वाचित हो सकता है।पांच वर्ष की पदावधि होती है।इसके पहले राष्ट्रपति को संबोधित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है।राज्य सभा के सदस्यों के बहुमत के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकता है, जिससे लोक सभा सहमत हो।
कार्य
संघ की कार्यपालिका शक्ति उसमे निहित है और वह उसका उपयोग संघ की मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है। करता है।उप-राष्ट्रपति के रूप में उसका कोई कार्य नहीं है। जब राष्ट्रपति पद रिक्त होता है तब वह नए राष्ट्रपति के निर्वाचन तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है।जब राष्ट्रपति का पद रिक्त होता है, उस अवधि को छोड़कर संघ की कार्यपालिका शक्ति उसमें निहित है और वह उसका उपयोग उप-राष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में कार्य करता है।

वेतन और भत्ते

उपराष्ट्रपति को निःशुल्क शासकीय निवास उपलब्ध होता है। उपराष्ट्रपति को वेतन एवं समस्त भत्ते संचित निधि से दिए जाते हैं।

शपथ

उपराष्ट्रपति अपने पद की शपथ राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष लेता है।

कार्य एवं शक्तियां

राज्यसभा के सभापति के रूप में:

उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करता है। राज्यसभा के सभापति का कार्य लोकसभा के अध्यक्ष से मिलता-जुलता है। वह सदन के विधेयकों पर बोलने के लिए सदस्यों को बुलाता है और बहस समाप्त होने पर मतदान कराता है। इसके पश्चात् मतदान के परिणाम की घोषणा करता है कि विधेयक पारित हुआ या नहीं। विधेयक पर मतों की स्थिति समान हो जाने पर वह अपना निर्णायक मत देता है। वह यह भी निर्णय देता है कि कौन-से प्रश्न सदन में पूछने योग्य हैं और कौन से नहीं। जब विधेयक राज्यसभा द्वारा पारित कर दिए जाते हैं तो विधेयकों पर उसके हस्ताक्षर आवश्यक हैं। वह सदन के सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है।

कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में: यदि राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग, पद से हटाए जाने या अन्य कारण से राष्ट्रपति पद रिक्त होता है तो जब तक नया राष्ट्रपति निर्वाचित होकर पद ग्रहण नहीं कर लेता तब तक उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा [अनुच्छेद 65(1)]।

जब राष्ट्रपति अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ होता है तब उपराष्ट्रपति उसके कृत्यों का निर्वहन करता है। भारतीय संविधान में यह अवधारणा करने के लिए कि कब राष्ट्रपति अनुपस्थिति या ऐसे ही कारणवश अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है, कोई तंत्र विहित नहीं किया है। अतएव इस विषय में कौन पहल करे? यह बड़ा संवेदनशील मामला बन जाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि 20 जून, 1960 के पहले संविधान के इस उपबंध का कोई उपयोग नहीं किया गया था, यद्यपि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1958 में अपनी विदेश यात्रा में काफी समय भारत के बाहर रहे। जून

भारत में उपराष्ट्रपति का पद अमेरिकी व्यवस्था से लिया गया है।इसका निर्वाचन एवं योग्यताएं राष्ट्रपति के पद की भांति हैं।यह राज्यसभा का पदेन सभापति होता है और किसी भी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर राष्ट्रपति पद के कृत्यों का निर्वहन् करता है।

1960 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 15 दिन की सोवियत संघ की यात्रा के समय पहली बार डॉ. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करने का अवसर दिया गया। दूसरा अवसर, मई 1961 में आया जब राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद गंभीर रूप से बीमार होकर अपने कार्य करने में असमर्थ थे। कुछ दिनों के संकट के पश्चात् राष्ट्रपति ने स्वयं यह सुझाव दिया कि जब तक वे स्वस्थ नहीं हो जाते तब तक उपराष्ट्रपति उनका कार्यभार संभालेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि यह अवधारणा करने की शक्ति कि कब राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है और कब वह अपने कर्तव्यों को पुनः ग्रहण कर लेगा, राष्ट्रपति में ही है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों के पदों में मृत्यु, पद-त्याग, हटाए जाने आदि से रिक्तता के कारण भारत का मुख्य न्यायमूर्ति और उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय का ज्येष्ठतम न्यायाधीश, जो उपलब्ध हो, राष्ट्रपति के कृत्यों का तब तक निर्वहन करेगा जब तक नया राष्ट्रपति निर्वाचित न हो जाए।

1969 में राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् उपराष्ट्रपति श्री वी.वी. गिरि ने पदत्याग कर दिया था तब मुख्य न्यायमूर्ति श्री हिदायतुल्ला ने 20 जुलाई, 1969 से कृत्यों का निर्वहन किया था।

अन्य कार्य

उपराष्ट्रपति का यह दायित्व होता है कि जब कभी उसे राष्ट्रपति का त्यागपत्र प्राप्त हो, वह उसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष तक तुरंत पहुंचाए। अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक समारोहों तथा राजकीय यात्राओं में उपराष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। संविधान के अनुसार उसे कोई भी कार्य औपचारिक कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य नहीं सौंपे गए हैं, फिर भी व्यवहार में मंत्रिमंडल के समस्त निर्णयों की सूचना उसे दी जाती है।

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