संघीय कार्यपालिका: राष्ट्रपति

Union Executive: The President

संविधान के भाग-V के अध्याय-1 (अनुच्छेद-52 से 78 तक) के अंतर्गत संघीय कार्यपालिका का उल्लेख किया गया है। भारत की संघीय कार्यपालिका राष्ट्रपतिउप-राष्ट्रपतिप्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद से मिलकर बनती है। संविधान के अनुच्छेद-73 के अधीन संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक होगा, जिनके बारे में संसद कानून बना सकती है और उन समस्त  अधिकारों के प्रयोग तक होगा जो किसी अंतरराष्ट्रीय संधि अथवा समझौते के आधार पर भारत सरकार को प्राप्त होंगे।

राष्ट्रपति

भारतीय संघ की कार्यपालिका के प्रधान की राष्ट्रपति कहा जाता है (अनुच्छेद-52)। हमारे संविधान में राष्ट्रपति के पद को सर्वाधिक सम्मान, गरिमा एवं प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह राष्ट्र का अध्यक्ष होता है। संघ की सम्पूर्ण कार्यपालिका शक्ति उसी में निहित होती है और भारत सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्यवाही राष्ट्रपति के नाम से ही संचालित की जाती है। भारत में संसदीय प्रणाली होने के कारण ब्रिटेन की साम्राज्ञी की भांति भारत का राष्ट्रपति कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान होता है और मंत्रिमण्डल वास्तविक कार्यकारी। राष्ट्रपति की स्थिति वैधानिक अध्यक्ष की है तथा उनका पद धुरी के समान है जो राजनीतिक व्यवस्था को संतुलित करता है। ब्रिटेन की साम्राज्ञी और भारत के राष्ट्रपति के पद में मूलभूत अंतर यह है कि ब्रिटेन की साम्राज्ञी का पद वंशानुगत है, जबकि भारत का राष्ट्रपति एक निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचित किया जाता है। राष्ट्रपति अपने अधिकारों का प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ सरकारी अधिकारियों के माध्यम से करता है।

निर्वाचन प्रक्रिया

राष्ट्रपति का निर्वाचन, निर्वाचक मंडल के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा करते हैं। इस निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं। राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के मनोनीत सदस्य, राज्य विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य तथा राज्य विधान परिषदों के सदस्य शामिल नहीं किये जाते। 71वें संविधान संशोधन के पूर्व संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं के सदस्यों को राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में शामिल नहीं किया जाता था। पुडुचेरी तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभाओं के सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में शामिल किये जाते हैं। राष्ट्रपति के निर्वाचन पद्धति से सम्बद्ध अनुच्छेद 55 के अनुसार राष्ट्रपति के निर्वाचन में दो सिद्धांतों को अपनाया जाता है:

  1. समरूपताकासिद्धांत: इस सिद्धांत के अनुसार सभी राज्यों की विधानसभाओं के प्रतिनिधित्व का मान निकालने के लिए एक ही प्रक्रिया अपनायी जाती है तथा सभी राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्यों का योग संसद के सभी सदस्यों के मत मूल्य के योग के समतुल्य अर्थात् समान होता है। राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य तथा संसद के सदस्यों के मत मूल्य को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनायी जाती है।
  • विधानसभा के सदस्यों के मत मूल्य का निर्धारण प्रत्येक राज्य की विधानसभा के सदस्यों के मतों की संख्या निकलने के लिए उस राज्य की कुल जनसंख्या को राज्य विधानसभा की कुल निर्वाचित सदस्य संख्या से विभाजित करके भागफल की 1000 से विभाजित किया जाता है। यदि उक्त विभाजन के परिणामस्वरूप शेष 500 से अधिक आये, तो प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़ दिया जाता है। राज्य विधानसभा के सदस्योंका मूल्य इस प्रकार निकला जाता है-

राज्य की विधानसभा के एक सदस्य का मत मूल्य = राज्य की कुल जनसंख्या / राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या / 1000

  • संसदसदस्यकेमतमूल्यकानिर्धारण: संसद सदस्य का मत मूल्य निर्धारित करने के लिए राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों मत का मूल्य जोड़कर उसमे संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के योग का भाग दिया जाता है। संसद सदस्य का मत मूल्य निम्न प्रकार निकाला जाता है-

संसद सदस्य का मत मूल्य = कुल राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्यों का योग / संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों का योग

मूल रूप से जनसंख्या का निर्धारण अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना के प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा। हालांकि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना पद पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा 1971 की जनगणना की ही आधार माना गया जो वर्ष 2000 तक मान्य थी। वर्ष 2000 में संघीय कैबिनेट ने इसकी सीमावधि में वृद्धि करते हुए यह प्रतिबंध तब तक के लिए बढ़ा दिया जब तक 2026 के पश्चात् के जनगणना संबंधी आंकड़े प्रकाशित नहीं किए जाते (84वां संविधान संशोधन, 2001)। इस प्रकार वर्तमान में राष्ट्रपति चुनावों के लिए जनसंख्या का आधार 1971 की जनगणना ही थी।

  • एकलसंक्रमणीयसिद्धांत: इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि यदि निर्वाचन में एक से अधिक उम्मीदवार हों, तो मतदाताओं द्वारा मतदान वरीयता क्रम से दिया जाए। इसका आशय यह है कि मतदाता, मतदान पत्र में उम्मीदवारों के नाम या चुनाव चिन्ह के समक्ष अपना वरीयता क्रम लिखेगा। अनुच्छेद 55 के अनुसार निर्वाचन में मतदानगुप्त होगा।
  • मतगणना: राष्ट्रपति के चुनाव के पश्चात् उसी व्यक्ति को निर्वाचित घोषित किया जाता है, जो आधे से अधिक मत प्राप्त करता है। गणना प्रारंभ होने पर सर्वप्रथम अवैध मत पत्रों की निरस्त करके शेष वैध मत पत्रों का मत मूल्य निकाला जाता है और निकाले गये मत मूल्य में 2 का भाग देकर भागफल में एक जोड़कर निर्वाचित घोषित किये जाने वाले उम्मीदवार का कोटा निकाला जाता है। यदि मतगणना के प्रथम दौर में किसी उम्मीदवार को नियत किये गये कोटा के बराबर मत मूल्य प्राप्त हो जाता है, तो उसे निर्वाचित घोषित किया जाता है। यदि किसी उम्मीदवार को नियत कोटे के बराबर मत मूल्य नहीं प्राप्त होता है, तो मतगणना का दूसरा दौर प्रारंभ होता है। दूसरे दौर की मतगणना में जिस उम्मीदवार को प्रथम वरीयता का सबसे कम मत मिला होता है, उसको गणना से बाहर करके उसकी द्वितीय वरीयता के मत मूल्य को अन्य उम्मीदवारों को स्थानांतरित कर दिया जाता है। यदि द्वितीय दौर की गणना में भी किसी उम्मीदवार को नियत किए गये कोटे के बराबर मत मूल्य नहीं प्राप्त होता, तो तीसरे दौर की गणना होती है। तीसरे दौर की गणना में उस उम्मीदवार की गणना से बाहर कर दिया जाता है, जो दूसरे दौर की गणना में सबसे कम मत मूल्य पाता है और इस उम्मीदवार के तृतीय वरीयता मत मूल्य को शेष उम्मीदवारों के पक्ष में हस्तांतरित कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक अपनायी जाती है, जब तक किसी उम्मीदवार को नियत किये गये कोटे के बराबर मत मूल्य प्राप्त नहीं हो जाता।

नए दिशा-निर्देश

राष्ट्रपति चुनावों के लिए चुनाव आयोग ने 2007 में प्रथम बार दिशा-निर्देश जारी किए। इनके अनुसार अब इस महत्वपूर्ण मतदान की वीडियो कवरेज होगी, मतदाताओं (सांसद-विधायक) द्वारा मोबाइल फोन अंदर ले जाने पर प्रतिबंध होगा और उन्हें अपने साथ संसद एवं विधानसभाओं द्वारा जारी परिचय-पत्र, निर्वाचन फोटो प्रमाण-पत्र और चुनावप्रमाण-पत्र की मूल प्रति रखनी होगी।

पद के लिए योग्यता

संविधान के अनुच्छेद-58 के अनुसार कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति पद के लिए योग्य तब होगा, जब वह

  1. भारत का नागरिक हो,
  2. पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए योग्य हो, तथा;
    1. भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन या उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण नहीं करता हो। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति या उप-राष्ट्रपति के पद पर या संघ अथवा किसी राज्य के मंत्रिपरिषद का सदस्य हो, तो यह नहीं माना जाएगा कि वह लाभ के पद पर है।

राष्ट्रपति संसद के किसी सदन का या किसी राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान राष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है। राष्ट्रपति लाभ का कोई अन्य पद ग्रहण नहीं करेगा।

पदावधि एवं हटाये जाने की स्थिति

राष्ट्रपति की पदावधि पद ग्रहण की तिथि से पांच वर्ष की होती है। पांच वर्ष के पहले राष्ट्रपति की पदावधि दो प्रकार से समाप्त हो सकती है-

  1. उप-राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा।
  2. महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा संविधान के उल्लंघन के आरोप में हटाए जाने पर।
  3. राष्ट्रपति अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता।

पुनर्निर्वाचनकेलिएपात्रता: कोई व्यक्ति, जो राष्ट्रपति के रूप में पद धारण करता है अथवा कर चुका है, इस संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए उस पद हेतु पुनर्निर्वाचन का पात्र होगा।

महाभियोग की प्रक्रिया: महाभियोग एक न्यायिक प्रक्रिया है जो संसद में चलाई जाती है। संसद का कोई भी सदन राष्ट्रपति पर संविधान के उल्लंघन का आरोप लगाएगा। दूसरा सदन उन आरोपों की जांच करेगा या करवाएगा।

किंतु ऐसा आरोप तब तक नहीं लगाया जा सकता जब तक कि:

  1. चौदह दिन की लिखित सूचना देकर सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों ने हस्ताक्षर करके प्रस्थापना अंतर्विष्ट करने वाला संकल्प प्रस्तावित नहीं किया हो,
  2. उस सदन की कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई-बहुमत द्वारा ऐसा संकल्प पारित नहीं किया गया हो।

राष्ट्रपति को ऐसे अन्वेषण में उपस्थित होने और अपना प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार होगा। यदि ऐसे अन्वेषण के परिणामस्वरूप राष्ट्रपति के विरुद्ध लगाया गया आरोप सिद्ध हो जाता है तो आरोप का अन्वेषण करने या कराने वाले सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा संकल्प पारित कर दिया जाता है। संकल्प पारित किये जाने की तिथि से ही राष्ट्रपति पदच्युत समझा जाएगा।

राष्ट्रपति को अनुच्छेद 56 और 61 के उपबंधों के अनुसार, महाभियोग के अलावा किसी और ढंग से नहीं हटाया जा सकता।

पदावधि पूर्ण होने अथवा आकस्मिक रिक्ति को भरने हेतु निर्वाचन:

  1. राष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन पदावधि समाप्त होने से पूर्ण कर लिया जाएगा।
  2. राष्ट्रपति की मृत्यु, पद-त्याग अथवा पद से हटाए जाने अथवा किसी अन्य कारण से उसका पद रिक्त होने की अवस्था में रिक्ति की भरने हेतु निर्वाचन रिक्ति होने की तिथि के पश्चात् यथाशीघ्र और प्रत्येक दशा में छह माह के भीतर करा लिया जाएगा और निर्वाचित होने वाला व्यक्ति अनुच्छेद-56 के उपबंधों के अधीन अपने पद ग्रहण की तिथि से पांच वर्ष की सम्पूर्ण अवधि तक पद पर बने रहने का अधिकारी होगा।

शपथ

राष्ट्रपति को पद एवं गोपनीयता की शपथ सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।

चुनाव संबंधी विवाद राष्ट्रपति के चुनाव को जिन आधारों पर चुनौती दी जा सकती है, वे इस प्रकार हैं-

  1. मतदाताओं पर अनुचित दबाव का आरोप,
  2. अवैध तरीके से मत पत्र रद्द किये जाने का आरोप,
  3. राष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित संवैधानिक नियमों की अवहेलना का आरोप, तथा;
  4. किसी भी उम्मीदवार का नामांकन-पत्र अनुचित ढंग से स्वीकार या रद्द किये जाने का आरोप।

राष्ट्रपति के निर्वाचन की वैधता की चुनौती से संबंधित याचिका वही दायर कर सकता है जो उम्मीदवार हो अथवा निर्वाचक। संविधान के अनुच्छेद 71 में उपबंध है कि राष्ट्रपति या उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न सभी शंकाओं और विवादों की जांच तथा निपटारा उच्चतम न्यायालय करेगा और उसका निर्णय अंतिम होगा।

उल्लेखनीय है कि 1976 में डॉ. जाकिर हुसैन तथा 1969 में श्री वी.वी. गिरि के चुनावों को उच्चतम न्यायालय ने वैध घोषित किया था। श्री ज्ञानी जैल सिंह के चुनाव के संबंध में जो चुनाव याचिकाएं दायर की गई थीं, उच्चतम न्यायालय द्वारा वे सभी रद्द कर दी गई। 13 दिसंबर, 1983 को उच्चतम न्यायालय ने श्री जैल सिंह के चुनाव की वैध घोषित किया।

वेतन और भत्ते

संविधानतः राष्ट्रपति को निःशुल्क शासकीय आवास (राष्ट्रपति भवन) उपलब्ध होगा और उसे संसद द्वारा समय-समय पर निश्चित किए जाने वाले वेतन, भत्ते एवं विशेषाधिकार प्राप्त होंगे। पदावधि की समाप्ति के पश्चात् उसे पेंशन दिए जाने संबंधी भी व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद-59 के अनुसार राष्ट्रपति की उपलब्धियां और भत्ते उसके कार्यकाल में घटाए नहीं जा सकते।

राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष क्यों?

भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप न होकर एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक मंडल में संसद एवं राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। भारत में राष्ट्रपति की अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति के अंगीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. राष्ट्रपति का निर्वाचन यदि जनता द्वारा प्रत्यक्ष होता तो एक अरब मतदाताओं द्वारा निर्वाचन में भाग लेना अव्यावहारिक और कष्टप्रद ही होता।
  2. राष्ट्रपति कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद के हाथों में निहित है, अतः इस शासन व्यवस्था में जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति की स्थिति असंगत हो जाती।
  3. राष्ट्रपति के अप्रत्यक्ष निर्वाचन के पीछे एक अन्य उद्देश्य यह था कि राष्ट्र का प्रमुख बहुमत के स्थान पर स्पष्ट बहुमत से निर्वाचित हो। इस पद्धति (आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली) में छोटे-छोटे राजनीतिक दलों को भी महत्व प्राप्त हो जाता है और राष्ट्रपति का निर्वाचन बहुमत वाले दल की स्वेच्छाचारिता से बचाया जा सकता है।
  4. अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति के अंतर्गत राष्ट्रपति निर्वाचन हेतु बनाए जाने वाले निर्वाचक मण्डल में संसद सदस्यों के साथ-साथ राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार राष्ट्रपति सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
राष्ट्रपति संघीय कार्यपालिका का प्रमुख है।इसका निर्वाचन पांच वर्ष की अवधि हेतु आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से अप्रत्यक्ष रूप से संसद एवं राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बने एक निर्वाचक मण्डल द्वारा किया जाता है।इस अवधि से पूर्व यह स्वयं त्याग-पत्र देकर अथवा संसद द्वारा संविधान में वर्णित महाभियोग की प्रक्रिया चलाकर पद से हटाया जा सकता है।

निर्वाचन प्रणाली का मूल्यांकन

आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति एक अत्यंत जटिल, दुर्बोध और पेचीदा पद्धति है। राष्ट्रपति निर्वाचन में प्रत्याशियों की संख्या दो से अधिक होने पर मतदाता केवल एक ही प्रत्याशी को मत देते हैं अथवा किसी भी प्रत्याशी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, जिससे आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति ही व्यर्थ हो जाती है। वास्तव में जहां केवल एक ही व्यक्ति को चुना एवं जाना हो वहां इस निर्वाचन पद्धति को अंगीकार किया जाना व्यवहारिक एवं महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

दूसरी ओर यदि देखा जाए तो सैद्धांतिक दृष्टिकोण से काफी जटिल दिखाई देने वाली यह निर्वाचन पद्धति व्यावहारिक धरातल पर काफी सरल है। संघात्मक सिद्धांत के अधिक अनुरूप होना ही इस निर्वाचन पद्धति का सबसे बड़ा गुण है।

राष्ट्रपति की शक्तियां

संविधान द्वारा राष्ट्रपति की जो शक्तियां प्रदान की गई हैं, वे अत्यंत विस्तृत एवं व्यापक हैं। अनुच्छेद-53 के अनुसार संघीय कार्यपालिका की सभी शक्तियां राष्ट्रपति में निहित हैं, इनका प्रयोग संविधान के अनुसार या तो राष्ट्रपति स्वयं करता है, या उसके नाम से उसके अधीनस्थ पदाधिकारी करते हैं।

राष्ट्रपति की शक्तियों को निम्नलिखित श्रेणियों में रखा जा सकता है-

कार्यकारी शक्तियां

कार्यकारी शक्ति का प्राथमिक अर्थ है- विधानमंडल द्वारा अधिनियमित विधियों का कार्यपालन। किंतु आधुनिक राज्य में कार्यपालिका का कार्य उतना सादा नहीं है जितना अरस्तू के युग में था। कार्यपालिका शक्ति की परिधि के परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकार व्याख्या की गई है- कार्यपालिका कृत्य का क्या अर्थ है और उसकी क्या विवक्षा है, इसकी सर्वग्राही परिभाषा कर पाना संभव नहीं है। विधायी और न्यायिक शक्ति को निकाल देने पर शासकीय कृत्यों में जो भी अवशिष्ट रहता है, सामान्यतः वही कार्यपालिका का कृत्य है। किंतु यह संविधान या किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए हैं।

कार्यपालिका कृत्य में आते हैं- नीति-निर्धारण और उसकी कार्य में परिणिति, व्यवस्था बनाए रखना, सामाजिक और आर्थिक कल्याण का प्रोन्नयन, विदेश नीति का मार्गदर्शन, राज्यके साधारण प्रशासनकोचलाना या उसका अधीक्षण।

1976 से पूर्व संविधान में यह अभिव्यक्त उपबंध नहीं था कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद द्वारा दिए गए परामर्श के अनुसार कार्य करने के लिए आबद्ध है। 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 से अनुच्छेद 74(1) का संशोधन करके स्थिति स्पष्ट कर डी गयी है कि- राष्ट्रपति को अपनी सहायता और परामर्श देने के लोए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में इनके परामर्श के अनुसार कार्य करेगा।

अर्थात् उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट कुछ मामलों को छोड़कर राष्ट्रपति को किसी मामले में अपने विवेकानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं प्रदान नहीं की गयी है।

राष्ट्रपति की कार्यपालिका संबंधी शक्तियों को मुख्यतः तीन भागों में बांटा जा सकता है-

मंत्रिपरिषद का गठन: अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति, संघ की कार्यपालिका शक्ति के संचालन में परामर्श देने के लिए मंत्रिपरिषद का गठन करता है। सामान्यतः राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करता है, जो लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता हो। प्रधानमंत्री कें परामर्श पर राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। प्रायः यह परंपरा रही है कि प्रधानमंत्री, लोकसभा का सदस्य होता है क्योंकि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, लेकिन राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि यदि लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल किसी ऐसे व्यक्ति को अपना नेता चुनता है जो संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है तो राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है लेकिन इस प्रकार नियुक्त किये गये व्यक्ति को 6 माह के अंदर संसद का सदस्य होना पड़ता है। इसी तरह प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को मंत्रिपरिषद में शामिल कर सकता है, जो संसद सदस्य नहीं है। यदि ऐसा व्यक्ति मंत्रिपरिषद में शामिल किया जाता है, तो उसे छः मास के अंदर संसद के किसी सदन का सदस्य बनना पड़ता है।

नियुक्ति संबंधी शक्ति: संविधान के द्वारा राष्ट्रपति को उच्च पदाधिकारियों को नियुक्त करने तथा उन्हें हटाने की शक्ति प्रदान की गई है। कार्यपालिका का अध्यक्ष होने के नाते राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है और प्रधानमंत्री के परामर्श से अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है। इनके अतिरिक्त राष्ट्रपति निम्नलिखित उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति करता है-

  1. भारत का महान्यायवादी,
  2. भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक,
  3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश,
  4. राज्य के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश,
  5. राज्यों के राज्यपाल,
  6. मुख्य निर्वाचन आयुक्त,
  7. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य।

राष्ट्रपति अपने द्वारा नियुक्त प्राधिकारियों तथा अधिकारियों को पदमुक्त भी कर सकता है।

आयोगोंकागठन: कार्यपालिका संबंधी शक्तियों के अंतर्गत राष्ट्रपति को आयोगों को गठित करने की शक्तियां भी प्रदान की गयी हैं। राष्ट्रपति द्वारा गठित किए जाने वाले आयोग हैं-

  1. जल प्रदाय में हस्तक्षेप का अन्वेषण करने के लिए आयोग,
  2. वित्त आयोग,
  3. संघ लोक सेवा आयोग और राज्यों के समूहों के लिए संयुक्त आयोग
  4. अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर प्रतिवेदन देने के लिए आयोग,
  5. राजभाषा आयोग,
  6. भाषायी अल्पसंख्यक आयोग,
  7. पिछड़े वर्ग की दशाओं का अन्वेषण करने के लिए आयोग।

विधायीशक्तियां

विधायी क्षेत्र में भी राष्ट्रपति की शक्तियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इंग्लैण्ड के सम्राट के समान, भारत का राष्ट्रपति भी संघ की संसद का अभिन्न अंग है। अनुच्छेद 74(1) के अनुसार, राष्ट्रपति विधायी शक्तियों का प्रयोग मंत्रियों की सलाह पर ही कर सकता है। संविधान द्वारा राष्ट्रपति की जो विधायी शक्तियां प्रदान की गई हैं, वे निम्नलिखित हैं-

संसद से संबंधित शक्तियां: राष्ट्रपति संसद के सदनों के अधिवेशन बुलाता है, सत्रावसान करता है तथा लोकसभा को भंग कर सकता है। गतिरोध उत्पन्न होने की स्थिति में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत करने की भी शक्ति उसे प्राप्त है। राष्ट्रपति को लोकसभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात् प्रथम सत्र के आरंभ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में एक साथ समवेत संसद के दोनों सदनों में अभिभाषण करने की शक्ति प्रदान की गई है। आरंभिक भाषण का वही उपयोग होता है जो इंग्लैंड में सिंहासन से भाषण का होता है। राष्ट्रपति संसद के किसी एक सदन में या संसद के संयुक्त अधिवेशन में अभिभाषण कर सकता है।

अभिभाषण करने के अधिकार के अतिरिक्त भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह संसद में उस समय जब विधेयक लम्बित है किसी विधेयक के संबंध में या किसी अन्य विषय के संबंध में किसी भी सदन को संदेश भेज सकता है और उसके संदेश पर यथाशीघ्र विचार करना आवश्यक होता है।

संसद के दोनों सदनों का गठन मुख्यतः निर्वाचन के द्वारा होता है चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष। किंतु राष्ट्रपति को दोनों सदनों में कुछ सदस्यों के नाम निर्दिष्ट करने की शक्ति दी गई है-

  1. राष्ट्रपति राज्यसभा में ऐसे 12 व्यक्तियों को मनोनीत कर सकता है जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक विषयों का विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव हो [अनुच्छेद 80(1)]।
  2. अनुच्छेद- 331 के अनुसार राष्ट्रपति की यह शक्ति भी प्रदान की गई है कि यदि उसे यह लगता है कि लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो वह लोकसभा में उस समुदाय के दो सदस्यों को मनोनीत कर सकता है।
राष्ट्रपति की विवेकानुसार शक्तियां
संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का दायित्व है कि वह मंत्रिपरिषद के परामर्श से काम करे, फिर भी कुछ ऐसे अप्रत्यक्ष क्षेत्र हैं जहां राष्ट्रपति को अपने विवेक तथा बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। वे इस प्रकार हैं:प्रधानमंत्री की नियुक्ति से सम्बन्धित अनुच्छेद 75(1) के अनुसार जब ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि किसी भी एक पार्टी की लोकसभा सदस्यों के बहुमत का स्पष्ट समर्थन प्राप्त न हो तो इस स्थिति का लाभ उठाकर राष्ट्रपति अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना सकता है। ध्यातव्य है कि, राष्ट्रपति ऐसे पदावरोही प्रधानमंत्री की सलाह पर नये प्रधानमंत्री की नियुक्ति नहीं कर सकता है, जो चुनाव में हार गया हो या जिसने लोकसभा का समर्थन खो दिया हो।प्रधानमंत्री की अचानक मृत्यु से उत्पन्न स्थिति में, जहां सत्तारूढ़ विधानमंडल पार्टी नेता का चुनाव करने के लिए तत्काल बैठक न कर सकती हो, जहाँ मंत्रिमंडल के मंत्रियों के बीच कोई निश्चित वरिष्ठता क्रम न हो और जहां मंत्रिमंडल से बाहर के किसी व्यक्ति के नाम का सुझाव दिया गया हो।ऐसी मंत्रिपरिषद की सलाह पर लोकसभा का विघटन [अनुच्छेद 85(2)], जिसने लोकसभा में बहुमत का समर्थन गंवा दिया हो या जिसके विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर दिया गया हो।उस स्थिति में मंत्रियों की बर्खास्तगी, जब मंत्रिपरिषद ने लोकसभा का विश्वास गंवा दिया ही पर वह इस्तीफा देने के लिए तैयार न हो।ऐसी कुछ स्थितियों में राष्ट्रपति की भूमिका अत्यंत नाजुक तथा निर्णायक हो जाती है।

राष्ट्रपति को कुछ प्रतिवेदनों और कथनों को संसद के समक्ष रखने की शक्ति और कुछ कर्तव्यों के माध्यम से वह संसद के सम्पर्क में आता है। राष्ट्रपति का यह कर्तव्य है कि संसद के समक्ष ये दस्तावेज रखवाएं-

  1. वार्षिक वित्तीय बजट और अनुपूरक विवरण।
  2. भारत सरकार के लेखाओं के संबंध में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का प्रतिवेदन।
  3. वित्त आयोग की सिफारिश और उसके साथ उन पर की गई कार्यवाही का स्पष्टीकारक ज्ञापन।
  4. संघ लोक सेवा आयोग का प्रतिवेदन।
  5. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के विशेष अधिकारी का प्रतिवेदन।
  6. पिछड़े वर्ग के आयोग का प्रतिवेदन।
  7. भाषाई अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकारों का प्रतिवेदन।

विधेयकपेशकरने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी या सिफारिश:

निम्नलिखित विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी या सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किये जा सकते-

  1. नए राज्यों के निर्माण या वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन संबंधी विधेयक। ऐसे विधान की सिफारिश करने की अनन्य शक्ति राष्ट्रपति की दी गई है जिससे वह ऐसा विधान प्रारंभ करने के पूर्व प्रभावित राज्यों के विचार प्राप्त कर सके।
  2. धन विधेयक [अनुच्छेद 117(1)]।
  3. कोई विधेयक, जो सही अर्थों में धन विधेयक नहीं है किंतु जिससे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़ेगा।
  4. जिस कराधान से राज्य का हित हो, उस कराधान पर प्रभाव डालने वाले विधेयक।
  5. अनुच्छेद 304 के अनुसार व्यापार की स्वतंत्रता पर निर्बंधन अधिरोपित करने वाले राज्य विधेयक।

राज्यविधानमंडलद्वाराबनायीजानेवालीविधिकेसंबंधमेंराष्ट्रपतिकीशक्ति:

राज्य विधान मण्डल द्वारा बनायी जाने वाली विधि के सम्बंध में राष्ट्रपति को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं:

  1. यदि राज्य विधान मण्डल कोई ऐसा विधेयक पारित करता है जिससे उच्च न्यायालय की अधिकारिता प्रभावित होती है तो राज्यपाल उस विधेयक पर अनुमति नहीं देगा और उसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित कर देगा।
  2. राज्य विधान मण्डल द्वारा सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए पारित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित रखा जाएगा।
  3. किसी राज्य के अंदर दूसरे राज्यों के साथ व्यापार आदि पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयकों को विधानसभा में पेश करने के पहले राष्ट्रपति की अनुमति लेनी होगी।
  4. वित्तीय आपात स्थिति के प्रवर्तन की स्थिति में राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है कि सभी धन विधेयकों की राज्य विधानसभा में पेश करने से पहले उन पर राष्ट्रपति का अनुमोदन लिया जाये।

अध्यादेशजारीकरनेकीशक्ति: अनुच्छेद 128 के अनुसार यदि किसी समय (जबकि संसद के दोनों सदनों का सत्र नहीं चल रहा हो) राष्ट्रपति को ऐसा संज्ञान हो कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण उन पर तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है, तो वे परिस्थितियों की अपेक्षानुसार ऐसा अध्यादेश प्रख्यापित कर सकते हैं। ऐसे अध्यादेश संसद के अधिनियम के समान शक्तिमान और प्रभावी ह्प्न्गें लेकिन उनमे ऐसा कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए जिसके लिए संविधान के अधीन संसद अधिनियम बनाने के लिए सक्षम नहीं हो। उक्त अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि इनकी संसद के दोनों सदनों के सभा-पटल पर रखा जाए। इसका निरानुमोदन चाहने वाले सांविधिक संकल्प पेश करने के लिए भी प्रावधान है। संविधान के अंतर्गत एक अध्यादेश संसद के पुनः सत्रारम्भ से छः सप्ताह की समाप्ति पर अथवा यदि उक्त अवधि की समाप्ति से पूर्व उसका निरानुमोदन चाहने वाले संकल्प दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाते हैं तो अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाता है। जब संसद के सदनों के सत्रारम्भ भिन्न-भिन्न तारीखों की होते हैं तो छः सप्ताह की अवधि की गणना इसमें से बाद की तारीख से की जाएगी।

दोनों सदनों के प्रक्रिया नियमों में अध्यादेशों के प्रख्यापन के लिए परिस्थितियों को स्पष्ट करने वाले विवरण सभा-पटल पर रखने का प्रावधान किया गया है ताकि अध्यादेशों पर विचार करते समय सदस्यगण उसका उपयोग कर सकें।

संसदीय कार्य मंत्रालय अध्यादेशों की प्रतियों को सभा-पटल पर रखकर, मंत्रालयों से स्पष्टीकरण-विवरण को सभा-पटल पर रखने का निवेदन करके और संबंधित अध्यादेशों का निरानुमोदन चाहने वाले सांविधिक संकल्पों पर विचार के साथ-साथ उनके प्रतिस्थापन में विधेयकों पर विचार के लिए समय की व्यवस्था करके भारत के संविधान तथा संसद के दोनों सदनों में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के विभिन्न प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करता है। यह सारी कार्रवाई संविधान में निर्धारित छः सप्ताह की अवधि के भीतर पूरी करने के सभी प्रयास किए जाते हैं।

विशेषाधिकार या वीटो की शक्ति

संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक अधिनियम तब तक नहीं बन सकता जब तक कि उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं मिल जाती। जब दोनों सदनों से पारित किये जाने के पश्चात् कोई विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो राष्ट्रपति निम्नलिखित तीन बातों में से कोई एक कर सकता है-

  1. वह यह घोषित कर सकता है कि वह विधेयक को अनुमति देता है,
  2. वह यह घोषित कर सकता है कि वह विधेयक को अनुमति देने से इंकार करता है,
  3. यदि वह धन विधेयक नहीं है तो पुनर्विचार के लिए पुनः संसद में भेज सकता है। धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटाया जा सकता।

जहां कार्यपालिका और विधानमंडल एक-दूसरे से पृथक् और स्वाधीन हैं, वहां कार्यपालिका विधायन के लिए उत्तरदायी नहीं होती है। ऐसी स्थिति में यह उचित होगा कि उसे अवांछनीय विधायन रोकने के लिए कुछ नियंत्रण का अधिकार हो।

भारत के राष्ट्रपति की वीटो शक्ति

विश्व के कुछ देशों के राष्ट्राध्यक्षों की वीटो शक्तियां और भारत के राष्ट्रपति की वीटो शक्तियों का तुलनात्मक विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत के राष्ट्रपति की वीटो शक्ति आत्यंतिक, निलंबनकारी और जेबी वीटो का संयोजन है। संविधान के अनुसार किये गये कार्यो तथा परम्पराओं के आधार पर यह माना जाता है कि राष्ट्रपति को निम्नलिखित वीटो शक्तियां प्राप्त हैं-

आत्यंतिक वीटो: आत्यंतिक वीटो का परमाधिकार इंग्लैंड के क्राउन को प्राप्त है। यदि वह किसी विधेयक को स्वीकृति नहीं देता है तो संसद के मतों के होते हुए भी वह कानून नहीं बन सकता। मंत्रिमंडलीय प्रणाली के विकास के कारण वर्ष 1700 से इस शक्ति का प्रयोग नहीं हो रहा है। इस प्रणाली में सभी सरकारी विधायनों की मंत्रिमंडल ही सदन में प्रारंभ करता है और संचालित करता है। व्यवहार और आचरण की दृष्टि से इंग्लैंड में वर्तमान काल में वीटो की कार्यपालिका शक्ति नहीं है। भारत के संविधान में पूर्ण मंत्रिमंडलीय दायित्व होते हुए भी इस उपबंध को समाविष्ट किया गया है। राष्ट्रपति सामान्यतया इस शक्ति का प्रयोग गैर-सरकारी विधेयकों को अनुमति न प्रदान करके कर सकता है। सरकारी विधेयकों के संदर्भ में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें विधेयक के पारित हो जाने के पश्चात् और दूसरा मंत्रिमंडल, जिसका संसद में बहुमत है, राष्ट्रपति को उस विधेयक के विरुद्ध वीटो के प्रयोग की सलाह देता है। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रपति के लिए वीटो का प्रयोग संवैधानिक होगा।

निलम्बनकारी वीटो: जब किसी विधेयक का अध्यारोहण विधानमंडल के सामान्य बहुमत से ही संभव हो जाता है तो उसे निलंबनकारी वीटो कहते हैं। इस प्रकार का वीटो फ्रांस के राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में है। जब राष्ट्रपति किसी विधेयक की अनुमति देने से स्पष्ट रूप से इंकार करने के स्थान पर विधेयक या उसके किसी भाग को पुनर्विचार के लिए वापस कर देता है तो यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति ने निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग किया है। पुनर्विचार के लिए वापस किया गया विधेयक यदि पुनः सामान्य बहुमत से पारित कर दिया जाता है, तो उस स्थिति में राष्ट्रपति को अपनी अनुमति देने के लिए विवश होना पड़ेगा। भारत में राष्ट्रपति द्वारा लौटाए जाने का प्रभाव निलंबन मात्र होता है।

जेबी वीटो: इस प्रकार के वीटो का प्रयोग अमेरिकी राष्ट्रपति करता है। जब वीटो विधेयक उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो वह चाहे तो न ही उस पर हस्ताक्षर करे और न ही उसे 10 दिन के सीमा रेखा के अंदर वापस करे। यदि इसी कालांतर में कांग्रेस स्थगित हो जाती है तो विधेयक अधिनियम नहीं बन पाता। इस प्रक्रिया को जेबी वीटो कहा जाता है। कांग्रेस अधिवेशन के अंतिम थोड़े-से दिनों में राष्ट्रपति प्रस्तुत विधेयक पर अनुमति विधारित करके उसका कानून बनना अवरोधित कर सकता है। अनुच्छेद-111 के अनुसार यदि राष्ट्रपति किसी विधेयक को वापस करना चाहता है तो वह विधेयक को प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र लौटा देगा। संविधान में इसके लिए कोई समय सीमा निश्चित नहीं की गयी है। समय-सीमा के अभाव में, भारत का राष्ट्रपति जेबी वीटो की शक्ति का प्रयोग करता है। इसे पॉकेट वीटो भी कहा जाता है। जब राष्ट्रपति अनुमति के लिए प्रस्तुत विधेयक पर न तो अनुमति देता है, न ही इंकार करता है अथवा न ही उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजता है विशेषकर तब जब वह पाता है कि मंत्रिमंडल का पतन शीघ्र होने वाला है, तो यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति ने जेबी वीटो का प्रयोग किया है। उदाहरणस्वरूप इस वीटो का प्रयोग राष्ट्रपति (ज्ञानी जैल सिंह) ने 1986 में संसद द्वारा पारित भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक के संदर्भ में किया था। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने इसे न तो अनुमति दी, न ही इंकार किया और न ही इसे संसद में पुनर्विचार के लिए वापस भेजा। अभी तक यह राष्ट्रपति की जेब में ही है।

विशेषित वीटो: इस प्रकार का वीटो अमेरिकी राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में है। वीटो विशेषित तब होता है जब विधानमंडल के असाधारण बहुमत से उसका अध्यारोहण किया जा सकता है और उस बहुमत से विधेयक को कार्यपालिका के वीटो को रौदकर, अधिनियम बनाया जा सकता है। जब राष्ट्रपति के समक्ष कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है और वह उसकी अनुमति नहीं देता है तो वह अपने आक्षेपों के कथन के साथ विधेयक की 10 दिन के भीतर कांग्रेस की उस शाखा को वापस करेगा जहां से वह प्रांरभ हुआ था। इसके उपरांत प्रत्येक सदन विधेयक पर पुनर्विचार करता है और यदि वह प्रत्येक सदन द्वारा उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से स्वीकार कर लिया जाता है तो वह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना ही कानून बन जाता है। इस प्रकार विशेषित वीटो का अध्यारोहण हो जाता है। यदि दो-तिहाई बहुमत नहीं प्राप्त होता है तो वीटो बना रहता है और विधेयक कानून नहीं बन पाता।

विशेषित वीटो एक ऐसा माध्यम है, जिससे कार्यपालिका विधान के दोष दिखाकर उस पर विधानमंडल से पुनर्विचार करा सकती है किंतु अंत में विधानमंडल का असाधारण बहुमत ही अभिभावी होता है। इस प्रकार अमेरिका में जहां कार्यपालिका विधायिका को सत्रावसान, विघटन या अन्य किसी प्रकार से नियंत्रित नहीं कर सकती है वहां विशेषित वीटो एक उपयोगी साधन है।

सैन्य शक्ति

राष्ट्रपति भारत की तीनो सेनाओं अर्थात् जल, थल और वायु सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होता है। इन सेनाओं के प्रमुखों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है। राष्ट्रपति को युद्ध या शांति की घोषणा करने या रक्षा बलों को अभिनियोजित करने की शक्ति है किंतु संसद इन शक्तियों के प्रयोग को नियंत्रित कर सकती है। भारत के राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियां अमेरिकी राष्ट्रपति या इंग्लैंड के सम्राट की तुलना में सीमित हैं।

संविधान में यह उपबंध है कि संसद की मंजूरी के अभाव में राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग करने में सक्षम नहीं होगा। उदाहरणार्थ वे कार्य, जिनमें धन व्यय होगा [अनुच्छेद 114(3)], जैसे-सैन्य बलों की भर्ती, प्रशिक्षण और अनुरक्षण।

राजनयिक शक्तियां

राजनयिक शक्ति एक व्यापक विषय है। इसमें वे सभी विषय आते हैं जो संघ को किसी विदेशी राज्य के संस्पर्श में लाते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों में राष्ट्रपतिदेशका प्रतिनिधित्व करता है। वह विदेशों में भारतीय राजदूतों, व्यापार दूतों और राजनयिक प्रतिनिधियों की नियुक्ति करता है। संसद के अनुसमर्थन के अधीन रहते हुए अन्य देशों से संधि और करार करने का कार्य राष्ट्रपति मंत्रियों की सलाह के आधार पर करता है।

विधान के विषय के रूप में राजनयिक प्रतिनिधित्व संसद का विषय है किन्तु राज्य का प्रधान होने के नाते भारत का राष्ट्रपति अंतरराष्ट्रीय क्रिया-कलापों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अतिरिक्त अन्य देशों से भारत में आने वाले राजदूत अपने प्रमाण-पत्र राष्ट्रपति को ही प्रस्तुत करते हैं।

न्यायिक शक्तियां

कार्यपालिका को न्यायिक शक्ति प्रदान करने का उद्देश्य यह है कि यदि कोई न्यायिक भूल हुई हो तो उसमें सुधार किया जा सके। इस प्रकार राष्ट्रपति की मुख्यतः दो प्रकार की न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं-

क्षमादान की शक्ति: संविधान के अनुच्छेद-72 के अनुसार राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान किए गए हैं कि वह किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा कर दे अथवा दंड कम कर दे या निलंबित कर दे अथवा दंड को किसी अन्य दंड में बदल दे। क्षमा से अभिप्राय यह है कि, जिसमें अपराधी को सभी दंडों और निरर्हताओं से मुक्ति मिल जाती है। किंतु क्षमा प्रदान करने अथवा दंड को कम करने की शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति इन परिस्थितियों में ही कर सकता है- उन मामलों में जिनमें किसी व्यक्ति को केंद्रीय कानूनों के तहत दंडित किया गया हो; उन सभी मामलों में जिनमें मृत्युदंड न्यायालय द्वारा दिया गया हो; उन मामलों में जिनमें दंड सैनिक न्यायालय द्वारा दिया गया हो।

केहर सिंह बनाम भारत संघ, 1989 विवाद के पश्चात् उच्चतम न्यायालय ने क्षमादान की शक्ति के संबंध में अग्रलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए-

  1. जो व्यक्ति राष्ट्रपति को क्षमादान के लिए आवेदन करता है उसे राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं है।
  2. इस शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति के विवेकाधीन है। न्यायालय मार्गदर्शन के सिद्धांत अधिकथित करने की आवश्यकता नहीं समझता।
  3. इस शक्ति का प्रयोग केंद्रीय सरकार की सलाह पर किया जाएगा।
  4. राष्ट्रपति न्यायालय के निर्णय पर विचार करके उससे भिन्न मत अपना सकता है।
  5. राष्ट्रपति के निर्णय का न्यायालय पुनर्विलोकन मारूराम के मामले में बताई गई सीमा में ही कर सकते हैं।

मारूराम के मामले में बताये गये निर्देश के अनुसार न्यायालय वहां हस्तक्षेप कर सकेगा, जहां राष्ट्रपति का निर्णय अनुच्छेद 72 के उद्देश्यों से पूर्णतया असंगत है या तर्कहीन, मनमाना, विभेदकारी या असद्भावी है। भारत के संविधान में क्रमशः अनुच्छेद 72 और 161 के अधीन राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपाल दोनों को ही क्षमादान की शक्ति प्राप्त है।

सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श की शक्ति

संविधान का अनुच्छेद-143 राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श की अधिकारिता प्रदान करता है। सार्वजनिक महत्व की विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय की राय मांग सकता है जिसके बारे में उसका विचार हो कि ऐसी राय प्राप्त करना समीचीन है। राष्ट्रपति से प्राप्त ऐसे निर्देश के बाद सर्वोच्च न्यायालय, ऐसी सुनवाई के बाद जो उचित समझे, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय के बारे में रिपोर्ट देगा। राय केवल सलाह के रूप में होती है। राष्ट्रपति सलाह मानने को बाध्य नहीं है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति की तुलना
राष्ट्रपतिराज्यपाल
सेना के न्यायालय द्वारा दिए गए दंड या दंडादेश के संदर्भ में क्षमादान, प्रविलंबन, विराम, निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति है।ऐसी कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं है।
उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है, जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार है।मृत्युदंड को छोड़कर, उन सभी विषयों में राज्यपाल की शक्तियां राष्ट्रपति के समान हैं, जिन पर संघ की कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार है (भारतीय दंड संहिता की धारा 54 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1974 की धारा 432-433 में कुछ परिस्थितियों में मृत्युदंड को निलंबित करने, उसका परिहार करने या लघु करण की शक्ति प्राप्त है)।
उन सभी परिस्थितियों में जहां दंडादेश मृत्युदंड है, वहां उपरोक्त सभी प्रकार की शक्ति है।मृत्यु दंडादेश की दशा में क्षमा करने की शक्ति प्राप्त नहीं है। किंतु विधि द्वारा यदि निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्रदान की गई है तो वह अप्रभावित है क्योंकि संविधान में इसे अछूता रखा गया है।

वित्तीय शक्तियां

कोई भी वित्त-विधेयक लोकसभा में राष्ट्रपति की अनुमति के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। उसकी अनुमति के बिना वित्तीय अनुदान की मांग नहीं की जा सकती। इसका अभिप्राय यह है कि वित्त-विधेयक केवल मंत्री द्वारा ही प्रस्तुत किया जा सकता है। देश का वार्षिक बजट और पूरक बजट तैयार करना और उसे लोकसभा के समक्ष प्रस्तुत कराना राष्ट्रपति का दायित्व है। देश की आकस्मिक निधि पर भी राष्ट्रपति का नियंत्रण रहता है। राष्ट्रपति की यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह आवश्यकता पड़ने पर संसद की स्वीकृति के बिना भी आकस्मिक निधि से धन निकाल सके।

राष्ट्रपति वित्त आयोग की नियुक्ति करता है। वितीय आयोग केंद्र और राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधों की जाँच करता है तथा यज्यों को दी जाने वाली राशि का निर्धारण करता है।

प्रकीर्ण शक्तियां

कार्यपालिक शक्ति के प्रधान के नाते संविधान ने राष्ट्रपति में कुछ शक्तियां निहित की हैं जिन्हें अवशिष्ट शक्तियां कह सकते हैं और जो संविधान के अनेक उपबंधों में बिखरी हुई पाई जाती हैं-

  1. राष्ट्रपति को अनेक विषयों के संबंध में नियम और विनियम बनाने का सांविधानिक अधिकार है। उदाहरण स्वरूप, भारत के लोक लेखाओं में धन जमा करना और वापस लेना, संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या, उनकी पदावधि और सेवा की शर्तें, संघ और संसद के सचिवालय में सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्ते संसद और राज्य विधान मंडलों की सहवर्ती सदस्यता का प्रतिषेध। संसद के सदनों के संयुक्त अधिवेशन से संबंधित प्रक्रिया जो दोनों सदनों के सभापति और अध्यक्ष के परामर्श से बनाई जाएगी, उच्चतम न्यायालय के आदेशों को प्रवर्तित करने की रीति, राज्यपाल को संदेय परिलब्धियों का राज्यों में आवंटन, किसी ऐसी आकस्मिकता में जिसके लिए संविधान में उपबंध नहीं है, राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का विनिर्दिष्ट किया जाना, उन विषयों का विनिर्दिष्ट किया जाना, जिनपर भारत सरकारको संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श करना आवश्यक नहीं होगा।
  2. उसे अध्यादेश प्रख्यापित करने के लिए राज्यपाल को अनुदेश देने की शक्ति है यदि वैसे ही उपबंध अंतर्दिष्ट करने वाले विधेयक को संविधान के अधीन राष्ट्रपति की पूर्ण मंजूरी की अपेक्षा होती [अनुच्छेद 213(1)]।
  3. उसे व्यापक महत्व के किसी प्रश्न को उच्चतम न्यायालय को निर्दिष्ट करने की शक्ति है।
  4. उसे विनिर्दिष्ट विषयों के बारे में प्रतिवेदन करने के प्रयोजन के लिए कुछ आयोग नियुक्त करने की शक्ति है। उदाहरण के लिए ये आयोग हैं- अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन तथा अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण पर प्रतिवेदन देने के लिए आयोग, विधि आयोग, राजभाषा आयोग, अंतरराज्यीय परिषद।
  5. उसे संघ राज्यक्षेत्रों के संबंध में या संघ द्वारा सीधे प्रशासित राज्यक्षेत्रों के सबंध में कुछ विशेष शक्ति प्राप्त है। ऐसे राज्यक्षेत्रों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा या उसी के प्रति उत्तरदायी प्रशासन के माध्यम से किया जाएगा, राष्ट्रपति को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दादरा और नागर हवेली के राज्यक्षेत्रों के संबंध में अंतिम विधायी शक्ति प्राप्त है। वह ऐसे राज्यक्षेत्रों पर लागू होने वाली संसद द्वारा बनाई गई किसी भी विधि का निरसन या संशोधन कर सकता है।
  6. राष्ट्रपति को अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों और असम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के संदर्भ में कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त हैं:
  • संसद द्वारा संशोधन के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति को यह शक्ति है कि वह आदेश द्वारा किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकेगा या यह घोषित कर सकेगा कि कोई क्षेत्र अनुसूचित क्षेत्र नहीं रहेगा या किसी अनुसूचित क्षेत्र की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगा तथा इसी प्रकार की अन्य शक्तियां भी उसे प्राप्त हैं।
  • किसी भी राज्य में जिसमें अनुसूचित जनजातियां हैं किंतु अनुसूचित क्षेत्र नहीं हैं, राष्ट्रपति के निर्देशानुसार जनजाति परिषद् स्थापित की जा सकेगी।
  • राज्यपाल द्वारा किसी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों की शांति और सुशासन के लिए बनाए गए सभी नियम राष्ट्रपति के समक्ष तुरंत रखे जाएंगे और जब तक वह उन पर अनुमति नहीं देता है तब तक उनका कोई प्रभाव नहीं होगा।
  • राष्ट्रपति किसी भी समय किसी राज्य के राज्यपाल से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह उस राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रतिवेदन दे और ऐसे क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में निर्देश दे सकता है।

अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बारे में राष्ट्रपति को कुछ विशेष शक्तियां और उत्तरदायित्व प्राप्त हैं:

  1. संसद द्वारा उपांतरण के अंधीन रहते हुए राष्ट्रपति को प्रत्येक राज्य और संघ राज्यक्षेत्र में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सूची बनाने और उसे अधिसूचित करने की शक्ति है। राज्य से संबंधित सूची की दशा में राज्यपाल से परामर्श करने की अपेक्षा है।
  2. राष्ट्रपति अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इस संविधान के अधीन उपबंधित रक्षोपायों के अन्वेषण करने और उनके कार्यकरण के संबंध में प्रतिवेदन देने के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त करेगा।
  3. राष्ट्रपति राज्यों में अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए आयोग की नियुक्ति किसी भी समय कर सकेगा और संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति तक करेगा।

राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति

व्यावहारिक रूप में यदि देखा जाए तो संविधान का संकेत यही है कि राष्ट्रपति केवल एक संवैधानिक राज्याध्यक्ष है। संविधान द्वारा राष्ट्रपति को निःसंदेह बहुत व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं। किंतु संसदीय शासन प्रणाली के अंतर्गत वास्तविक कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल के अधीन होती है।उदाहरण के लिए राष्ट्रपति संसद का अधिवेशन बुलाने और अधिवेशन की स्थगित करने की शक्ति रखता है, परंतु वह इस शक्ति का प्रयोग प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सुझाव के अनुसार करता है। राष्ट्रपति, प्रत्येक वर्ष संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में भाषण देने का अधिकार रखता है। परंतु इसका अर्थ यह है कि मंत्रिमंडल, राष्ट्रपति के माध्यम से अपना कार्यक्रम संसद के समक्ष रखता है। भारत के संविधान में राष्ट्रपति की स्थिति वही है, जो ब्रिटेन के संविधानमें सम्राट की है। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार- राष्ट्रपति राज्य का मुखिया है, पर कार्यपालिका का नहीं। वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, परंतु राष्ट्र का शासन नहीं चलाता है।

अनुच्छेद-74 में यह उपबंध जोड़ दिया गया है कि, राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सिर्फ यह कह सकता है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। पुनर्विचार के बाद मंत्रिमंडल जो मंत्रणा या सलाह देगा राष्ट्रपति उसी के अनुसार कार्य करेगा।

अब तक संविधान में जितने भी महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं, उन सब में अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल का ही था। उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति केवल संवैधानिक अध्यक्ष है, वास्तविक प्रधान नहीं।

राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों की तुलना
राष्ट्रपतिउप-राष्ट्रपति
निर्वाचन
निर्वाचक मंडल द्वारा निर्वाचित होता है जो-संसद के दोनों सदनों; औरराज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनता है।आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारासंसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनाने वाले निर्वाचक मंडल द्वारा निर्वाचित होता है।आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारा
निर्वाचन के लिए अहर्ताएं
भारत का नागरिक होना चाहिए35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हत होना चाहिए, तथा;भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं होना चाहिए। किंतु इसके अपवाद हैं- राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल या संघ या राज्य के मंत्री का पद । भारत का नागरिक होना चाहिए35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हत होना चाहिए, तथा;राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल या संघ या किसी राज्य के मंत्री का पद छोड़कर कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए।
पदावधि
पांच वर्ष की पदावधि होती है।इसके पहले उप-राष्ट्रपति को संबोधित लेख द्वारा अपने पद का त्याग कर सकता है।महाभियोग की प्रक्रिया से हटाया जा सकता है।पुनः निर्वाचित हो सकता है।पांच वर्ष की पदावधि होती है।इसके पहले राष्ट्रपति को संबोधित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है।राज्य सभा के सदस्यों के बहुमत के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकता है, जिससे लोक सभा सहमत हो।
कार्य
संघ की कार्यपालिका शक्ति उसमे निहित है और वह उसका उपयोग संघ की मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है। करता है।उप-राष्ट्रपति के रूप में उसका कोई कार्य नहीं है। जब राष्ट्रपति पद रिक्त होता है तब वह नए राष्ट्रपति के निर्वाचन तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है।जब राष्ट्रपति का पद रिक्त होता है, उस अवधि को छोड़कर संघ की कार्यपालिका शक्ति उसमें निहित है और वह उसका उपयोग उप-राष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में कार्य करता है।
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