पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी

रात के आकाश में जो खगोलीय पिंड सबसे बड़ा और चमकदार दिखाई देता है, वह है – चंद्रमा। यह धरती की धुरी की डाँवाडोल गति को नियंत्रित कर इसकी जलवायु को अपेक्षाकृत स्थिर बनाता है, जिससे पृथ्वी निरंतर एक जीवंत ग्रह बनी रहती है। पूरे सौर-परिवार में चंद्रमा पृथ्वी के सबसे समीप है। लेकिन prithvi se chandrama ki duri kitni hai? तो बता दे, पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की औसत दूरी 3,84,400 कि.मी. है। जिसका मतलब है कि पृथ्वी और चंद्रमा के मध्य पृथ्वी के आकार के 30 ग्रह आसानी से फिट हो सकते हैं।

चंद्रमा की कक्षा दीर्घ वृत्ताकार (elliptical) है तथा पृथ्वी की कक्षा की तुलना में लगभग 5 डिग्री झुका हुआ है। इसलिए पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी हर वक्त एक समान नहीं होती। तात्कालिक चंद्र दूरी लगातार 75 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बदलती रहती है। चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी से अधिकतम 4,05,696 कि.मी. तथा न्यूनतम 3,63,105 कि.मी. दूर होता है। इन दोनों दूरियों को मिलाकर हमें जो 3,84,400 कि.मी. की औसत दूरी प्राप्त होती है, इसे ही हम चंद्र दूरी (lunar distance) मानते हैं।

पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी

चंद्रमा एक समकालिक कक्षा (synchronous orbit) में रहकर पृथ्वी की परिक्रमा करता है; यानी इसे पृथ्वी की परिक्रमा में उतना ही समय लगता है जितना इसे अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगाने में। इसे पृथ्वी की परिक्रमा तथा धुरी पर घूर्णन में कुल 27 दिन, 7 घंटे और 43 मिनट का समय लगता हैं।

अपनी कक्षा में ऐसी विशेष गति के कारण ही चंद्रमा का केवल एक ही हिस्सा हमेशा पृथ्वी की ओर रहता है। इसके दूसरे हिस्से का दर्शन मनुष्य ने तब तक नहीं किया था जब तक सोवियत संघ के अंतरिक्ष-यान ‘लूना 3’ ने पहली बार 7 अक्टूबर, 1959 को उसकी पहली तस्वीर धरती पर नहीं भेजी थी।

इसके के दोनों हिस्सों में दो-दो दिनों के दिन और रातें होती हैं।

Q2. पहली बार पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी कैसे मापी गई थी?

उत्तर: आज वैज्ञानिक कई आधुनिक तरीकों, जैसे – लेज़र, स्पेसक्राफ्ट या कंप्यूटर मॉडलिंग का उपयोग करके किसी भी खगोलीय पिंड की दूरी ज्ञात कर लेते हैं। लेकिन वर्ष 1950 से पहले तक ऐसा संभव नहीं था।

पहली बार वर्ष 1958 में इंग्लैंड के रोयल रडार इस्टैब्लिशमेंट अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा रडार सिग्नल का उपयोग करके पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी मापी गई थी।

उस प्रयोग में तीव्र क्षमता वाले रेडियो सिग्नलस को रडार के माध्यम से चंद्रमा की ओर प्रेषित किया गया और जब वे रेडियो सिग्नलस उसकी सतह से टकराकर वापस पृथ्वी पर आये तो उन्हें पुनः रडार के रिसीवर द्वारा ग्रहण कर लिया गया।

अंत में सिग्नलस के चंद्र सतह पर पहुंचने तथा फिर टकराकर वापस आने में लगने वाले समय का हिसाब लगाकर दोनों के बीच की दूरी की गणना कर ली गई। उस वक्त वह ज्ञात की गई दूरी 384402 ±1.2 कि.मी. थी। यह उस समय चंद्र दूरी का सबसे सटीक माप था।

Q3. चंद्रमा का जन्म कैसे हुआ था?

उत्तर: चंद्रमा के जन्म से संबंधित जो सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत है, वह है – Giant-impact hypothesis. इस सिद्धांत को Big Splash या Theia Impact के नाम से भी जाना जाता है।

इस परिकल्पना के अनुसार लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व धरती की टक्कर उस वक्त सौरमंडल में मौजूद एक ‘थिया’ नामक ग्रह के साथ हुई थी। उस थिया ग्रह का आकार लगभग आज के मंगल ग्रह जितना ही था।

चंद्रमा के जन्म से संबंधित सिद्धांत
चांद के निर्माण की प्रक्रिया / Credit : wikimedia.org

उस टक्कर के बाद थिया और पृथ्वी से निकले मलबों ने पृथ्वी के चारों ओर एक वलय का निर्माण कर लिया था, जिन्होंने बाद में धीरे-धीरे एक दूसरे में समाहित होकर आज के चंद्रमा को जन्म दिया।

Q4. पृथ्वी से चाँद पर जाने में कितना समय लगता है?

उत्तर: पृथ्वी से चंद्रमा की यात्रा करने में लगने वाला समय इस बात पर निर्भर करेगा कि आप जिस रॉकेट और स्पेशक्राफ्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं उसकी रफ्तार कितनी है?

उदाहरण के लिए मान ले कि अगर आप चंद्रमा पर जाने के लिए वर्ष 2006 में बौने ग्रह प्लूटो के लिए भेजे गये New Horizons मिशन के रॉकेट Atlas V से यात्रा करना चाहते हैं तो आप मात्र 8 घंटे 35 मिनट में चंद्रमा पर पहुंच जाएंगे। New Horizons अभी तक चांद जितनी दूरी सबसे कम समय में तय करने वाला मानव-रहित मिशन है।

वही अगर आप चांद पर पहली बार आदमी को पहुंचाने वाले मिशन Apollo 11 के शक्तिशाली राॅकेट Saturn V से यात्रा करना चाहते हैं तो आपको वहां तक पहुंचने में 51 घंटे 49 मिनट का समय लगेगा।

चांद पर भेजे गये पहले मानव-युक्त मिशन को Saturn V रॉकेट की सहायता से 16 जुलाई, 1969 को प्रक्षेपित किया गया था; जिसने 19 जुलाई यानी लगभग 51 घंटे बाद तीन चंद्र यात्रियों को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा दिया था। यह सबसे कम वक्त में चांद पर पहुंचने वाला मानव-युक्त मिशन था।

Q5. पृथ्वी की तुलना में चंद्रमा कितना बड़ा है?

उत्तर: चंद्रमा हमारे सौरमंडल का 5वां सबसे बड़ा उपग्रह है। हम जब भी इसे रात के आसमान में देखते हैं यह तुलनात्मक रूप से बहुत बड़ा दिखाई देता है; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका आकार किसी विशालकाय ग्रह के समान है। यह आसमान में बड़ा केवल इसलिए दिखता है क्योंकि यह अन्य खगोलीय पिंडों की तुलना में धरती के सबसे करीब है।

चंद्रमा के आकार पर अंतरिक्ष एजेंसी नासा का कहना है कि – “यदि पृथ्वी एक निकल धातु के आकार की होती, तो चंद्रमा कॉफी की एक बीन जितना बड़ा होता।”

चंद्रमा का आकार

चंद्रमा का व्यास 3,474 कि.मी. है, वही पृथ्वी का व्यास 12,742 कि.मी. है। इसका मतलब है कि चंद्रमा का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 27% ही है।

चंद्रमा के सतह का क्षेत्रफल 3.8 करोड़ वर्ग कि.मी. है। आपको सुनने में यह क्षेत्रफल बहुत बड़ा लग रहा होगा लेकिन वास्तव में यह एशिया महाद्वीप के क्षेत्रफल से भी छोटा है। एशिया का कुल क्षेत्रफल 4.45 करोड़ वर्ग कि.मी. है। दूसरी ओर पृथ्वी के सतह का कुल क्षेत्रफल 51.01 करोड़ वर्ग कि.मी. है, जो कि चंद्रमा के संपूर्ण क्षेत्रफल से 73% अधिक है।

वही अगर हम इसके आयतन (volume) की बात करे, तो चंद्रमा का आयतन 21.9 अरब घन कि.मी. है; जबकि पृथ्वी का आयतन 1 खरब घन कि.मी. से भी अधिक है।

Q6. Supermoon क्या है?

उत्तर: सुपरमून चंद्रमा की अपनी दीर्घवृत्तीय कक्षा में ऐसी स्थिति है, जिसमें चांद कभी-कभी पूर्णिमा के वक्त धरती की सबसे नजदीक की स्थिति में आ जाता है। उस समय चांद पृथ्वी से 3,60,000 कि.मी. से भी कम दूरी पर होता है। अपनी इस विशिष्ट स्थिति के कारण चंद्रमा वर्ष के अन्य दिनों की तुलना में 14% ज्यादा बड़ा और 30% ज्यादा चमकीला दिखाई पड़ता है। तकनीकी भाषा में इस खगोलीय घटना को ‘पेरिजी-सिजगी’ (Perigee-syzygy) कहा जाता है।

अभी हाल में फुल सुपरमून 7 मई, 2020 को हुआ था और अब अगला सुपरमून 28 मार्च, 2021 को होगा।

14 नवंबर, 2016 को हुआ फुल सुपरमून पिछले 69 वर्षों में पृथ्वी के सबसे नजदीक हुआ फुल सुपरमून था। 21वीं सदी का पृथ्वी से सबसे निकटतम फुल सुपरमून 6 दिसंबर, 2052 को होगा।

Q7. चंद्रमा के सबसे बड़े इम्पैक्ट क्रेटर का नाम क्या है?

उत्तर: चंद्रमा के सबसे बड़े इम्पैक्ट क्रेटर का नाम है – दक्षिण धुव्र-ऐटकेन घाटी (South pole-Aitken basin). यह क्रेटर चंद्रमा के उस हिस्से में मौजूद है, जो हमें पृथ्वी से दिखाई नहीं देता। इसका व्यास लगभग 2,500 कि.मी. तथा गहराई लगभग 8 कि.मी. हैं।

ऐटकेन सिर्फ चंद्रमा का ही नहीं बल्कि पूरे सौरमंडल का भी सबसे विशाल इम्पैक्ट क्रेटर है, जिसका निर्माण लगभग 3.9 अरब वर्ष पहले विशालकाय उल्कापिंडों के टकराने से हुआ था। यह चंद्रमा की सतह पर मौजूद सभी क्रेटरों में सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबसे गहरा है।

अमेरिकी खगोल विज्ञानी ‘रॉबर्ट ग्रांट ऐटकेन’ के सम्मान में इसका नाम दक्षिण धुव्र-ऐटकेन घाटी रखा गया है।

Q8. चंद्रमा की सतह पर उतरने वाले पहले अंतरिक्ष-यान का क्या नाम था?

उत्तर: चंद्रमा की सतह पर पहली बार ‘लूना 2’ अंतरिक्ष-यान उतरा था। इसे सोवियत संघ द्वारा 12 सितंबर, 1959 को प्रक्षेपित किया गया था, जो 13 सितंबर, 1959 को चंद्रमा की सतह पर उतरा। यह दुनिया का पहला ऐसा मानव-निर्मित संरचना था, जिसने पहली बार किसी दूसरे खगोलीय पिंड की सतह को छुआ था।

लूना 2 अंतरिक्ष-यान
लूना 2 अंतरिक्ष-यान

Q9. सूर्य से चंद्रमा की दूरी कितनी है?

उत्तर: जैसा कि आप जानते है, जैसा आप जानते है, चंद्रमा 3,50,000 कि.मी. से लेकर 3,80,000 कि.मी. के बीच पृथ्वी से दूर स्थित होकर अंडाकार कक्षा में पृथ्वी के चारों ओर घूमता है, ठीक ऐसी ही कक्षा में पृथ्वी भी सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है। इसलिए चंद्रमा और पृथ्वी दोनों सूर्य से लगभग एक ही औसत दूरी पर हैं। औसतन, पृथ्वी और चंद्रमा सूर्य से लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर हैं।

Q10. चंद्रमा के जिस क्षेत्र में मनुष्य ने पहली बार कदम रखा था, उस क्षेत्र का नाम क्या है?

उत्तर: 21 जुलाई, 1969 को जब अपोलो 11 मिशन के यात्री पहली बार चंद्रमा के जिस क्षेत्र में उतरे थे उसका नाम था – The Sea of Tranquillity. चंद्रमा के इस क्षेत्र के नाम में ‘सागर’ (sea) शब्द का अर्थ यह नहीं है कि उस इलाके में कोई सागर या समुद्र है।

Apollo 11 landing site - The Sea of Tranquillity
Apollo 11 landing site – The Sea of Tranquillity

दरअसल, चंद्रमा की सतह पर यह क्षेत्र गहरे काले धब्बे के रूप में दिखाई देता है, इसलिए शुरूआती खगोलविदों ने जब इसे देखा था तब उन्होंने इसे गलती से सागर मान लिया और इसका नाम पानी के सागर से के साथ जोड़ दिया था।

चंद्रमा की सतह पर कहीं भी पानी नहीं है।

Q11. दुनिया की पुरानी संस्कृतियों में चाँद को स्त्रिी से जोड़कर क्यों देखा जाता था?

उत्तर: प्राचीन चीनी संस्कृति में चंद्रमा को यिन (Yin), यानी स्त्री के रूप में पहचाना जाता था, जबकि यांग (Yang), मतलब सूरज पुरुष का प्रतिनिधित्व करता था।

यही बात हमें प्राचीन यूनान एवं रोम की संस्कृति में भी देखने को मिलती है, जहां सूर्य से संबंधित तमाम देवता पुरूष हैं, वही चांद से जुड़े हुए सभी देवता स्त्री हैं। उदहारण के लिए, सेलिन, फोएबे एवं आर्टेमिस प्राचीन यूनान में और लून एवं डायना प्राचीन रोम में चंद्रमा से संबंधित देवियाँ हैं।

ऐसा माना जाता है कि इन संस्कृतियों में चंद्रमा को स्त्री से जोड़कर इस कारण देखा जाता था क्योंकि चंद्रमा के आकार बदलने की प्रक्रिया का और महिलाओं के मासिक धर्म के चक्र का समय (15 दिन) बिल्कुल समान हैं।

Q12. प्राचीन यूनान के किस दार्शनिक को यह कहने पर कि चांद गोल है, कैद कर दिया गया था?

उत्तर: यूनान के वह प्राचीन प्रकृति दार्शनिक थे – अनएक्सगोरस (Anaxagoras)

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