भारत की खोज

15वीं शताब्दी में भारत पूरे संसार में अपने हीरे, जवाहरात तथा विशेषकर मसालों (काली मिर्च, इलायची, दालचीनी आदि) के लिए बहुत प्रसिद्ध था, जिस कारण उस समय भारत के साथ व्यापार करने के लिए यूरोप तथा अरब के देशों के बीच होड़ लगी रहती थी। उस वक्त एशिया के प्रमुख देशों जैसे- भारत, चीन, म्यांमार आदि के साथ व्यापार केवल स्थलीय मार्ग से ही होता था, जिसे सिर्फ मुस्लिम शासक एवं व्यापारी ही इस्तेमाल किया करते थे। उस मार्ग से यूरोपीयों को मुस्लिम शासक व्यापार नहीं करने देते थे। व्यापार मार्ग की समस्या को खत्म करने के लिए कई यूरोपीय देशों ने यूरोप और भारत के मध्य एक समुद्री मार्ग खोजने का प्रयत्न किया मगर उनमें मात्र पुर्तगाल ही सफल हो पाया। लेकिन क्या आपको पता है, Bharat ki khoj kisne ki thi? यानी पहली बार किसने यूरोप से समुद्र के रास्ते भारत आने का मार्ग खोजा था? तो बता दे, वह पहला पुर्तगाली व्यक्ति था – वास्को डी गामा (Vasco da Gama)

वास्को डी गामा वो पहला यूरोपीय समुद्री नाविक और खोजकर्ता था, जिसने पहली बार 17 मई, 1498 को समुद्र के रास्ते वर्तमान केरल राज्य के कालीकट तट पर अपना कदम रखा था। डी गामा के आने से पूर्व तक भारत कई बाहरी घुसपैठियों और हमलावरों, जैसे – सिकंदर, अरब और मंगोल आदि को देख चुका था। लेकिन वे सभी उस समय प्रसिद्ध स्थलीय मार्ग ‘खैबर दर्रा’ से होकर आये थे; समुद्री मार्ग से नहीं।

खोजकर्ता वास्को डी गामा
यूरोप और भारत के बीच समुद्री मार्ग की खोज करने वाला – वास्को डी गामा

डी गामा की समुद्री मार्ग से भारत की खोज, भारत को पश्चिमी दुनिया से जोड़ने में मील का पत्थर साबित हुआ। इससे भारत और चीन जैसे सुदूर पूर्व के देशों के मसालों, रेशम, चांदी, सोने आदि की पहुंच पश्चिमी देशों तक हो गई। हालांकि, ये भी सत्य है कि पश्चिमी देशों की भारत के धन-दौलत के प्रति उत्सुकता ने बाद में लालच का रूप ले लिया और उन्होंने भारत को भी अपना एक बड़ा उपनिवेश बना लिया।

डी गामा की वह समुद्री यात्रा उस समय की सबसे महान ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक थी। कई इतिहासकार उस यात्रा को कोलंबस द्वारा अमेरिका के लिए समुद्री मार्ग खोजे जाने से कही अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।

वास्को डी गामा – एक पुर्तगाली खोजकर्ता

डी गामा का जन्म किस वर्ष हुआ था, इस प्रश्न पर इतिहासकारों को संशय है। फिर भी कुछ इतिहासकार का विश्वास है कि उसका जन्म 1960 के दशक के आस-पास ही पुर्तगाल के सिन्स (Sines) शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उसके पिता एस्टेवा भी एक अच्छे नाविक एवं समुद्री खोजकर्ता थे। वे 1460 से 1478 तक सिन्स शहर के सिविल गवर्नर और कमांडर रह चुके थे। वास्को डी गामा एस्टेवा दंपत्ती का तीसरा बेटा था तथा उसका सारा बचपन एक नाविक और यात्रा के माहौल में बिता था। सन् 1480 में डी गामा ने अपने पिता का अनुसरण करते हुए पुर्तगाली नौसेना (Order of Santiago) में शामिल हो गया, यही उसने नौचालन और लंबी समुद्री यात्रा करना सीखा।

पुर्तगाल के राजा हेनरी, जिन्हें Henry the Navigator के नाम से भी जाना जाता था, ने उत्तर और पश्चिम अफ्रीका में कई सफल समुद्री यात्राओं तथा खोजों को आर्थिक सहायता एवं संरक्षण प्रदान किया था। उस समय उनके द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त लंबी समुद्र यात्राओं एवं नये देशों की खोज ने पुर्तगाल को एक समुद्री और औपनिवेशिक शक्ति बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था।

1487 में पुर्तगाल के ही एक प्रसिद्ध खोजकर्ता, बार्टोलोमू डायस (Bartolomeu Dias) ने अफ्रीका के दक्षिणी सिरे तक यात्रा कर यह पता लगाया था कि हिन्द और अटलांटिक महासागर एक दूसरे से जुड़े हुए है।

डी गामा, जो समुद्री यात्राओं एवं खोजबीन में गहरी दिलचस्पी रखता था, वो जानता था कि यदि हिन्द और अटलांटिक महासागर अफ्रीकी भूमि के अंत में जुड़ते हैं, तो वह अफ्रीका के दूर दक्षिणी कोने पर मौजूद ‘Cape of Good Hope’ के माध्यम से भारत तक पहुंचने का मार्ग खोज जा सकता है; और यही कारण है कि बाद में जब वह केप ऑफ़ गुड होप नामक स्थान पर पहुंचा, तो उसने महसूस किया था कि उसका भारत तक मार्ग खोजने का सपना यथार्थ में तबदील हो सकता है।

1497 में डी गामा ने यात्रा शुरू की

डा गामा की पहली भारत यात्रा का मानचित्र
डा गामा की पुर्तगाल से भारत तक यात्रा का समुद्री मार्ग (Credit: Encyclopædia Britannica, Inc.)

8 जुलाई, 1497 को डी गामा ने चार जहाजों और 170 आदमियों के दल के साथ पुर्तगाल के लिस्बन शहर से अपनी यात्रा शुरू की। वह स्वयं 200 टन वजनी सेंट गेब्रियल नामक जहाज में सवार हुआ और अपने छोटे भाई पाउलो को सेंट राफेल नामक जहाज का नेतृत्व सौप दिया।

कुछ दिनों बाद वर्तमान मोरक्को देश के निकट स्थित कैनेरी द्वीप से गुजरते हुए उनका जहाजी बेड़ा केप वर्दे द्वीपसमूह पहुंचा और वही 3 अगस्त तक रहा। जहाज पर वे अपने साथ पत्थरों के स्तंभ (Padrao) भी लेकर आये थे, उन्हें वे अपने मार्ग को चिन्हित करने के लिए विभिन्न महत्वपूर्ण पड़ावों पर स्थापित कर दिया करते थे।

आगे डी गामा ने पहले गिनी की खाड़ी की तेज समुद्री धाराओं से बचने के लिए अटलांटिक महासागर में एक लंबा चक्कर लगाया और फिर केप ऑफ़ गुड होप के दौरे के लिए पूर्व की ओर एक मोड़ ले लिया। यह भारत की खोज में उनका पहला प्रमुख गंतव्य था।

7 नवंबर को उनका बेड़ा आज के दक्षिण अफ्रीका में स्थित ‘सेन्ट हेलेना बे’ पहुंचा। उस समय सेन्ट हेलेना बे का मौसम बहुत रखाब था। प्रतिकूल हवाओं और समुद्री लहरों ने आगे 22 नवंबर तक उनकी यात्रा में देरी कि। लेकिन फिर भी कुछ दिनों बाद मौसम अच्छा होने पर आगे उन्होंने केप आंफ गुड होप (नीचे चित्र देखें) का दौरा किया और फिर मार्ग को चिहिन्नत करने के लिए पहले की भांति वहां एक पत्थर का स्तंभ भी स्थापित किया तथा फिर आगे की यात्रा की तैयारी करने लगे।

वास्को डी गामा का स्तंभ
केप ऑफ़ गुड होप में वास्को डी गामा द्वारा लगाया गया स्तंभ

केप ऑफ़ गुड होप से आगे की यात्रा उन्होंने 8 दिसंबर को शुरू कि और क्रिसमस तक वे दक्षिण अफ्रीका के नटाल तट पर पहुंच गये। अलग-अलग नदियों को भीतर और बाहर से पार करते हुए डी गामा का बेड़ा आगे धीरे-धीरे मोजाम्बिक की ओर अग्रसर हुआ। इस बीच वे लगभग एक महीने तक कही रूके और जहाजों की मरम्ती का कार्य किया।

2 मार्च, 1498 को डी गामा का बेड़ा मोज़ाम्बीक द्वीप पर पहुंच गया। जब डी गामा अपने दल के साथ मोज़ाम्बीक की धरती पर उतरा और वहां के निवासियों से मिला तो उन्हें लगा कि ये पुर्तगाली जहाज़ी भी उन्ही की तरह मुसलमान हैं।

डी गामा का मोजाम्बिक में पड़ाव डालना काफी उपयोगी सिद्ध हुआ। वहां उसे समुद्र के किनारे लंगरगाह पर सोने, चांदी तथा मसालों से भरे हुए 4-5 जहाज दिखे तथा उसकी मुलकात ऐसे स्थानीय लोगों से भी हुई जो कभी-कभी भारतीय समुद्री तटों की यात्रा भी करते थे। इससे वास्को डी गामा को पूरा विश्वास हो गया कि वह उचित दिशा की तरफ आगे बढ़ रहा था और उसे उस दिशा को समझने में भी मदद हुई, जिधर अब उसे आगे बढ़ना था।

गुजराती नाविक ने दिखाया आगे का रास्ता

7 अप्रैल, 1498 को उनका बेड़ा मोम्बासा (वर्तमान केन्या) में प्रवेश कर गया तथा यात्रा के एक और महत्वपूर्ण ठहराव मोम्बासा के ही मालिंदी में लंगर डाल दिया।

मालिंदी में डी गामा की मुलाकात कांजी मालम नामक एक ऐसे गुजराती नाविक से हुई, जो भारत के दक्षिण-पश्चिम तट के कालीकट जाने का मार्ग जानता था। उस गुजराती नाविक के महत्व को देखते हुये डी गामा ने उसे भी मार्गदर्शक के रूप में अपने बेड़े में शामिल कर लिया।

20 दिन लगातार हिन्द महासागर में चलने के बाद डी गामा को धीरे-धीरे भारत के घाट और पहाड़ दिखने लगे और अंततः 17 मई, 1498 को वह भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित कालीकट के बंदरगाह पर उतरा।

कालीकट में स्थानीय नेताओं द्वारा उसका स्वागत शांति से किया गया। वह यहां लगभग अगले तीन महीने तक रहा और भारत के बारे में बहुत सारी जानकारी इकट्ठा किया।

पुर्तगाल वापसी

वास्को डी गामा दो साल से अधिक समय तक लंबी यात्रा करते हुए 18 सितंबर को पुनः लिस्बन लौट आया। इस दौरान उसने लगभग 38,600 किमी. की यात्रा की थी। इस लंबी साहसिक यात्रा में उसके कुल 170 साथियों में से 116 की यात्रा के दौरान ही मृत्यु हो गई थी।

वास्को डी गामा की इस उपलब्धि से पुर्तगाल के राजा बहुत खुश हुए थे तथा उन्होंने उसे दूसरी बार फिर 1502-03 में भारत की यात्रा पर भेजा था। इतिहासकारों का मानना है कि जब डी गामा विभिन्न प्रकार के भारतीय मसालों और रेशम के साथ अपने देश पुर्तगाल लौटा, तो उसने केवल मसाला बेचकर यात्रा पर खर्च किए गए पैसों से चार गुना अधिक पैसे कमा लिए थे।

1524 में डी गामा की मृत्यु कालीकट में ही तब हो गई थी जब वह अपनी तीसरी यात्रा पर भारत आया था।

जब डी गामा ने यूरोप और भारत के बीच का समुद्री मार्ग खोज लिया, तब डी गामा का नाम समस्त यूरोप में बहुत विख्यात हो गया और उसकी उस साहसिक यात्रा की चर्चा सभी यूरोपीय देशों में होने लगी तथा धीरे-धीरे तब अन्य देशों ने भी उसी खोजे गये समुद्री रास्ते से अपने अभियान भारत भेजने शुरू कर दिये। अब पुर्तगालियों के बाद डच, डेनिश, ब्रिटिश और फ्रांसीसी भी भारत आना शुरू हो गये। उसके बाद आगे के दशक में भारत में जो हुआ वह सब इतिहास है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • सन् 1524 में अपने तीसरे भारतीय अभियान के दौरान वास्को डी गामा को पुर्तगाली भारतीय राज्य का गवर्नर नियुक्त किया गया था।
  • भारत के लिए समुद्री मार्ग ढूढ़ने की जिम्मेदारी पुर्तगाल के राजा द्वारा मूल रूप से डी गामा के पिता एस्टेवा को दी गई थी। लेकिन एस्टेवा द्वारा यात्रा में कई वर्षों तक देरी के कारण आखिरकार उस अन्वेषण बेड़े की कमान उनके बेटे डी गामा को दे दी गई।
  • चंद्रमा की सतह पर मौजूद एक बड़े क्रेटर का नाम वास्को डी गामा है। उसका व्यास 94 कि.मी. और गहराई लगभग 2 कि.मी. है।
  • डी गामा द्वारा भारत आने और फिर पुर्तगाल वापस जाने में तय कि गई दूरी, उस समय तक किसी व्यक्ति द्वारा समुद्री यात्रा में तय कि गई सबसे अधिक दूरी थी।
  • पुर्तगाली भाषा की सबसे लोकप्रिय कविता ‘The Lusiads’ को प्रसिद्ध पुर्तगाली कवि Camoens ने डी गामा की उस साहसिक यात्रा से प्रभावित होकर उसके सम्मान में लिखा था।
  • सन् 1502 में डी गामा की दूसरी भारत यात्रा के दौरान उसके बेड़े में 20 सशस्त्र जहाज शामिल थे।
  • डी गामा के 6 बेटे और एक बेटी थी। उसका दूसरा बेटा, एस्टेवाओ डी गामा भी पुर्तगाली भारत का गवर्नर बना था।
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