माइटोकॉन्ड्रिया की खोज

माइटोकॉन्ड्रिया को हिंदी में ‘सूत्रकणिका’ भी कहा जाता है। यह हमारे कोशिका का अहम भाग है क्योंकि यह भोजन से ऊर्जा बनाता है, जिसे कोशिका के बाकी हिस्से उपयोग करते हैं। जीव-जंतु तथा पेड़-पौधे बहुत सारी जटिल कोशिकाओं से बने होते हैं; जिन्हें सुकेन्द्रिक कोशिका (Eukaryote cell) कहा जाता है। इन सुकेन्द्रिक कोशिकाओं के अंदर कुछ विशेष संरचनाएँ होती हैं जो कुछ विशेष कार्यों को पूरा करती हैं। ऐसी संरचना को कोशिकांग (Organelle) कहा जाता है। माइटोकाॅन्ड्रिया भी एक ऐसा ही कोशिकांग है।

लेकिन कोशिका के लिए ऊर्जा का निर्माण करने वाले इस Mitochondria ki khoj kisne ki thi और कब? तो इसका उत्तर है, इस कोशिकांग की खोज स्विट्जरलैंड के शरीर-रचना एवं शरीर-क्रिया विज्ञानी अल्बर्ट वॉन कोलिकर (Albert von Kolliker) द्वारा सन् 1857 में किया गया था।

physiologist Albert von Kolliker

Q2. माइटोकॉन्ड्रिया का नामकरण किसने किया था?

उत्तर: माइटोकॉन्ड्रिया का नामकरण इसके खोज के 47 वर्षों बाद जर्मन माइक्रोबायोलॉजिस्ट कार्ल बेंडा (Carl Benda) द्वारा सन् 1898 में किया गया था। इसके पहले सन् 1886 में रिचर्ड अल्टमैन द्वारा इसे ‘bioblasts’ भी कहा गया था।

Q3. एक कोशिका में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या कितनी हो सकती है?

उत्तर: अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या भिन्न होती है। कुछ सामान्य कोशिकाओं में मात्र एक या दो माइटोकॉन्ड्रिया होते है। हालांकि जीवों की जटिल कोशिकाओं (जैसे मांसपेशियों की कोशिकाओं में), जिन्हें बहुत ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती हैं; उनमें इनकी संख्या एक हजार से लेकर दो हजार तक हो सकती हैं।

Q4. माइटोकॉन्ड्रिया का मुख्य कार्य क्या है?

उत्तर: इनका मुख्य कार्य कोशिका के लिए ऊर्जा का उत्पादन करना है। कोशिकाएँ ऊर्जा के लिए विशेष प्रकार के अणु का उपयोग करती हैं, जिन्हें adenosine triphosphate (ATP) कहते है और जिसका निर्माण कोशिका के अंदर ही होता है।

कोशिका के लिए ऊर्जा पैदा करने के अतिरिक्त माइटोकॉन्ड्रिया अन्य कार्य भी करते हैं। जैसे –

  • कोशिकीय चयापचय (cellular metabolism)
  • साइट्रिक एसिड साइकिल (CAC)
  • ऊष्मा उत्पन्न करना
  • कैल्शियम की सांद्रता (concentration) को नियंत्रित करना
  • कुछ खास स्टेरॉयड को उत्पन्न करना

Q5. किस प्रक्रिया द्वारा माइटोकॉन्ड्रिया ऊर्जा का उत्पादन करता है?

उत्तर: माइटोकॉन्ड्रिया द्वारा ऊर्जा का उत्पादन कोशिकीय श्वसन (cellular respiration) की प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। माइटोकाॅन्ड्रिया भोजन के अणुओं को कार्बोहाइड्रेट के रूप में लेते है तथा ATP का निर्माण करने के लिए उसे ऑक्सीजन के साथ मिला देता है। ये सही रासायनिक प्रतिक्रिया के लिए प्रोटीन (जो एक प्रकार का एंज़ाइम ही होता है) का प्रयोग करते है।

Q6. माइटोकॉन्ड्रिया का आकार कितना होता है?

उत्तर: इसका आकार 0.5 से लेकर 10 माइक्रोमीटर (μm) तक हो सकता है। यहां मैं बता दू कि 1 μm, 0.001 मिलीमीटर के बराबर होता है।

Q7. ऐसा कौन-सा युकेरियोट जीव है जिसमें माइटोकॉन्ड्रिया नहीं पाया जाता?

उत्तर: Monocercomonoides

माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना (Mitochondrion Structure)

ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए माइटोकाॅन्ड्रिया के पास विशिष्ट संरचना होती है।

Image: LadyofHats [Public domain], via Wikimedia Commons
  • बाहरी झिल्ली (Outer membrane) – बाहरी भाग बाहरी झिल्ली द्वारा सुरक्षित रहता है। यह बहुत ही कोमल होता है तथा इसका आकार वृताकार गोलिका जैसा, राॅड जैसा लंबा या और किसी चीज जैसा हो सकता है।
  • आंतरिक झिल्ली (Inner membrane) – कोशिका के दूसरे कोशिकांगों (Organelles) की तरह माइटोकॉन्ड्रिया की भी आंतरिक झिल्ली होती है। इसमें बहुत सारे मोड़ होने के कारण यह सिकुड़ा हुआ होता है तथा ऊर्जा बनाने के लिए बहुत सारे कार्य करता हैं।
  • क्रिस्टी (Cristae) – आंतरिक झिल्ली में मौजूद मोड़ों व तहों को क्रिस्टी कहा जाता है। ये तहें आंतरिक झिल्ली की सतह का क्षेत्रफल बढ़ाने में मदद करती है।
  • मैट्रिक्स (Matrix) – आंतरिक झिल्ली के अंदर मौजूद स्थान को मैट्रिक्स कहा जाता है। माइटोकॉन्ड्रिया का ज्यादातर प्रोटीन इसी स्थान में होता है। राइबोसोम और डीएनए भी इसी मैट्रिक्स में होते है।

माइटोकॉन्ड्रिया से जुड़ी कुछ रोचक बातें

  1. जब आवश्यकता होती है तब ये अपना आकार बदल कोशिका के अंदर कही भी स्थान बदल लेता है।
  2. जब कोशिका को ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है, तब माइटोकाॅन्डिया फैलकर बड़ा हो जाता है तथा अपने आपको विभाजित कर लेता है। लेकिन अगर कोशिका कम ऊर्जा की जरूरत होती है तो कुछ माइटोकाॅन्ड्रिया मर जाते है या अपने आप को कुछ समय के लिए निष्क्रिय कर लेते है।
  3. माइटोकाॅन्ड्रिया कुछ जीवाणुओं के बिल्कुल समान है। इस कारण, कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि यह वास्तव में पहले जीवाणु ही थे जिन्हें बाद में जटिल कोशिकाओं द्वारा अवशोषित कर लिया गया।
  4. अलग-अलग माइटोकाॅन्ड्रिया अलग-अलग प्रकार के प्रोटीन बनाते है। कुछ माइटोकाॅन्ड्रिया 100 से भी ज्यादा तरह के प्रोटीन का निर्माण कर सकते हैं, जिन्हें कोशिका द्वारा विभिन्न कार्यों में प्रयोग किया जा सकता है।
  5. ATP के रूप में ऊर्जा उत्पन्न करने के अलावा, माइटोकाॅन्ड्रिया कुछ मात्रा में कार्बन-डाइऑक्साइड गैस भी उत्पन्न करते है।
  6. माइटोकाॅन्ड्रिया एक बैटरी की तरह काम करता है, जो हमारे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद 90% से भी ज्यादा ऊर्जा का निर्माण करता है।
  7. दिल की मांसपेशियों की प्रत्येक कोशिका का 40% हिस्सा माइटोकॉन्ड्रिया से बना होता है और लिवर की प्रत्येक कोशिका का 25% हिस्सा माइटोकॉन्ड्रिया से बना होता है।
  8. माइटोकॉन्ड्रिया का आकार इतना छोटा होता है कि इसे स्पष्ट रूप से ऑप्टिकल माइक्रोस्कोप से नहीं देखा जा सकता, इसलिए इसके लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का प्रयोग करना पड़ता है।

Ribosome की खोज किसने की थी?

राइबोसोम माइटोकॉन्ड्रिया की तरह ही एक कोशिकांग है। जो कोशिका के अंदर ऊर्जा के स्थान पर प्रोटीन का उत्पादन करता है। इसकी खोज सन् 1955 में रोमानियाई मूल के अमेरिकी कोशिका जीव-विज्ञानी जॉर्ज एमिल पलाडे (George Emil Palade) द्वारा किया था।

हालांकि जाॅर्ज पलाडे ने राइबोसोम का पता लगाया था लेकिन इसकी पूरी संरचना की खोज एवं निर्धारण तीन अलग-अलग वैज्ञानिकों – ऐडा ई. योनाथ, वेंकटरामन रामकृष्णन और थॉमस आर्थर स्टीट्ज द्वारा किया गया, जिन्हें वर्ष 2009 में रासायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!