भारतीय स्वतंत्रता लीग

भारतीय स्वतंत्रता लीग (संक्षेप में ‘आईआईएल’ भी कहते हैं) 1920 से 1940 के दशक तक भारत के बाहर रहने वाले लोगों को संगठित करने के लिए संचालित एक राजनीतिक संगठन था जिसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को हटाना था। भारतीय राष्ट्रवादियों द्वारा 1928 में स्थापित यह संगठन दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न हिस्सों में स्थित थे, इसमें कई भारतीय प्रवासी शामिल थे और बाद में निर्वासन झेल रहे भारतीय राष्ट्रवादी, द्वितीय विश्व युद्ध के पहले भाग के दौरान जापान के सफल मलायन अभियान के बाद इसमें शामिल हो गये। मलाया में जापानी शासन के दौरान, जापानियों ने मलाया में रह रहें भारतीयों को भारतीय स्वतंत्रता लीग में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।[1]

मुख्य रूप से भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जापानी समर्थन प्राप्त करने के लिए स्थापित लीग के तहत मोहन सिंह के नेतृत्व में पहली भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया गया, हालांकि बाद में इसे भंग कर दिया गया। बाद में, दक्षिण पूर्व एशिया में सुभाष चंद्र बोस के आगमन के बाद, उन्होंने इसी ढ़ाचे का उपयोग कर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की थी।

अनुक्रम

पृष्ठभूमि

दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानी कब्जे के साथ, एक बड़ी प्रवासी भारतीय आबादी भी इसमें शामिल था। युद्ध के मलाया पहुंचने से पहले ही वहाँ स्थानीय भारतीय संघों का ढांचा अस्तित्व में था। इनमें से सबसे बड़ी प्री-वॉर सेंट्रल इंडियन एसोसिएशन, सिंगापुर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और अन्य संगठनों थे, और उनके सदस्यों में प्रमुख भारतीय प्रवासी, उदाहरण के लिए के. पी. केशव मेनन, नडियाम राघवन, प्रीतम सिंह, एससी गोहो और अन्य आदि थे। व्यवसाय प्राधिकरण के प्रोत्साहन के साथ, इन समूहों ने स्थानीय भारतीय स्वतंत्रता लीग में मिलना शुरू कर दिया और स्थानीय भारतीय आबादी और जापानी कब्जे के बल के बीच प्रमुख उभरते संगठन बन गए।

भारतीय स्वतंत्रता लीग में शामिल होने से लोगों में सुरक्षा और स्वतंत्रता के प्रति एक उबाल लेकर आई।[2] सभी सदस्यो को एक आईआईएल कार्ड बाटा गया। जिसे दिखाये जाने पर रेलवे टिकट की खरीदी में आसानी आई और आईआईएल मुख्यालयों में इन कार्ड का प्रयोग कर उचित कीमतों पर मुश्किल से मिलने वाले सामानों जैसे टुथ-पेस्ट और साबुन की खरीदारी की आसानी से की जा सकती थी।[2] इसके माध्यम से राशन भी जारी किए जाते थे।[3] इसके अलावा, चूंकि आईआईएल को स्विस रेड क्रॉस के साथ काम करने की इजाजत थी, इसलिए सदस्यों को सिलोन जैसे कठिन स्थानों के लिए पत्र भेजना और पाना आसान हो गया था।[2]

रासबिहारी बोस

मुख्य लेख: रासबिहारी बोस

रास बिहारी बोस एक भारतीय क्रांतिकारी थे, जिन्होंने 1912 के दिल्ली-लाहौर षडयंत्र की योजना -जिसमें तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग की हत्या की शाजिश थी- में और 1915 के गदर षड्यंत्र में भागीदारी निभाई थी। ब्रिटीश राज द्वारा खोजने के अथक प्रयाश के बीच, रासबिहारी जापान चले गए, जहां उन्हें जापानी देशभक्ति समाजों के बीच शरण मिला। बाद में रासबिहारी ने जापानी भाषा सीखी, और एक जापानी महिला से विवाह कर स्वाभाविक जापानी नागरिक बन गये।[4]

मलयान अभियान से पहले और उसके दौरान, रासबिहारी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उद्देश्य से जापानीयों में रुचि बढाने की कोशिश की थी। फुजीवाड़ा से रिपोर्ट को प्रोत्साहित कर और स्थानीय स्वतंत्रता लीग की स्थापना के साथ, आईजीएचक्यू ने भारतीय आंदोलन को आकार देने और विस्तार करने के लिए रासबिहारी से मदद मांगी।

रासबिहारी ने आईजीएचक्यू को विकसित राजनीतिक संगठन में आईएनए को विकसित कर संलग्न करने की सलाह दी, जो दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय नागरिक आबादी के लिए भी बात करेगी।[5]

टोक्यो सम्मेलन

मार्च 1942 में, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता लीग के स्थानीय नेताओं को टोक्यो में एक सम्मेलन में आमंत्रित किया। यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया गया और प्रतिनिधिमंडल मार्च 1942 के अंत में टोक्यो होटल में मिले थे।

हालांकि, टोक्यो सम्मेलन किसी भी निश्चित निर्णय तक पहुंचने में असफल रहा। रासबिहारी को लेकर कई भारतीय प्रतिनिधिमंडल में मतभेद थे, विशेषकर जापान के साथ अपने लंबे संबंध और दक्षिण-पूर्व एशिया में कब्जे वाली शक्ति के रूप में जापान की वर्तमान स्थिति और को देखते हुए, और जापानीयों के बढ़ते दिलचस्पी से सावधान थे।[5] सदस्य गण भविष्य में बैंकाक सम्मेलन में फिर से मिलने के लिए सहमत हो गये।[5] भारतीय प्रतिनिधिमंडल अप्रैल में रासबिहारी के साथ सिंगापुर लौट आया।

अखिल मलय-भारतीय स्वतंत्रता लीग

सिंगापुर में, एक सार्वजनिक बैठक की अध्यक्षता के लिये रासबिहारी को आमंत्रित किया गया था, जिसमें अखिल मलय-भारतीय स्वतंत्रता लीग की घोषणा की गई थी।[5] लीग की अध्यक्षता एक प्रमुख मलय-भारतीय और पेनांग बैरिस्टर, नडियाम राघवन को दी गई थी। शासी बोर्ड में के पी केशव मेनन और एससी गोहो, बाद में सिंगापुर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के अध्यक्ष शामिल थे। लीग ने कई प्रस्ताव दिए, जिसमें कार्यकारी शाखा के रूप में कार्य परिषद की रचना, एक ऐसे निकाय का गठन जिसे क्षेत्रीय लीग रिपोर्ट कर सके, साथ ही साथ आईएनए और परिषद के बीच एवं परिषद और जापानी अधिकार के बीच संबंध स्थापित करना आदि शामिल थे।[5] इन प्रस्तावों पर, टोक्यो सम्मेलन में मिले प्रतिनिधित्व की तुलना में ज्यादा लोगो से मत कराने और अगली बैठक जापानी जमीन से दूर कराने के लिये मतदान करने के लिए निर्णय लिया गया था। लीग के शिविरों के निर्देशक निर्जन सिंह गिल समेत लीग के कई सदस्य, लीग और स्वतंत्रता आंदोलन के संबंध में जापानी इरादों से डरते थे।[6]

लीग को भारतीय आबादी के बीच व्यापक समर्थन मिला; अगस्त के अंत तक सदस्यता एक सौ से हजार के करीब पहुचंने का अनुमान लगाया गया था। लीग के सदस्यों को, युद्ध के मध्य में आपातकाल के दौरान और आधिपत्य अधिकारियों से निपटने के दौरान, जनसंख्या को लाभ मिला। लीग की सदस्यता कार्ड धारक के द्वारा भारतीय (और इस प्रकार एक सहयोगी) के रूप में पहचान, इसका इस्तेमाल कर राशन जारी करना जैसे कार्य आसान हो गया।[3] इसके अलावा, लीग ने स्थानीय भारतीय आबादी की स्थितियों में सुधार करने के प्रयास किए, जिसमें बेरोज़गार हुए बागान मजदूरों के कारण शामिल थे।[5]

बैंकाक सम्मेलन

जून 1942 में, बैंकाक सम्मेलन आयोजित किया गया था। जिसमें भारतीय स्वतंत्रता लीग का संविधान रखा गया। लीग में काउंसिल फॉर एक्शन और इसके नीचे प्रतिनिधियों की एक समिति शामिल थी। समिति के नीचे क्षेत्रीय और स्थानीय शाखाएं थीं।[7] रासबिहारी बोस परिषद की अध्यक्ष थे, जबकि के पी केशव मेनन, नडियाम राघवन परिषद के नागरिक सदस्यों में से थे। मोहन सिंह और गिलानी के नाम से एक अधिकारी, आईएनए के सदस्य थे।[7] प्रतिनिधियों की समिति के सदस्य के लिये भारतीय जनसंख्या वाले 12 क्षेत्रों के सदस्यों को चुना गया था, जिसमें प्रतिनिधि भारतीय आबादी के अनुपात में रखे गये थे।[7][8] बैंकाक सम्मेलन में निर्णय लिया कि भारतीय राष्ट्रीय सेना को इसके अधीनस्थ किया जाना चाहिए।[7]

बैंकाक सम्मेलन में एक चौबीस बिंदु संकल्प को अपनाया गया और जापानी सरकार से प्रत्येक बिंदु पर जवाब की उम्मीद लगाई गई। इनमें जापानी सरकार से स्पष्टतया और सार्वजनिक रूप से भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र और लीग को देश का प्रतिनिधि और अभिभावक के रूप में पहचान देने की माँग की गई।[7] अन्य बिंदुओं में उनसे आज़ाद हिंद की जापानी संबंध स्पष्ट करने, उनकी संप्रभुता और उसकी क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की मांग की गई, इसके अलावा सभी ने सर्वसम्मति से मांग की कि जापान स्पष्ट और प्राथमिक रूप से लीग को आगे लाने की प्रतिबद्धता दिखायेगा।[9] संकल्प में आगे मांग की गई कि भारतीय राष्ट्रीय सेना को एक सहयोगी सेना की स्थिति दी जाएगी और उसी तरह का व्यवहार किया जाएगा, और सभी भारतीय पीओयू को आईएनए के लिये रिहा कर दिया जाएगा। जापानियों को सेना के लिये ऋण की मदद करनी चाहिए, और भारत की मुक्ति के मुकाबले के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिये मार्च करने को नहीं कहा जाना चाहिए।[7] संकल्प को जापानी अधिकारी इवाकुरो किकन सौंप दिया गया।

ग्रेटर ईस्ट एशिया सम्मेलन

ग्रेटर ईस्ट एशिया सम्मेलन के प्रतिभागी

नवंबर 1943 में, ग्रेटर ईस्ट एशिया सम्मेलन टोक्यो में आयोजित किया गया था। राज्य के प्रमुख जो ग्रेटर ईस्ट एशिया सह-समृद्धि क्षेत्र के सदस्य थे, एकत्र हुए थे। सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद के अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में भाग लिया था।

बाद के समय में

1945 में, जकार्ता के भारतीय समुदाय के नेता प्रीतम सिंह ने भारतीय स्वतंत्रता लीग और इंडोनेशिया के स्वतंत्रता के लिए संघर्ष दोनों में हिस्सा लिया था।[10]

1972 में, केंद्र ने स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना[11] शुरूआत की। जिसके माध्यम से स्वतंत्रता कार्यकर्ता पेंशन के हकदार थे।[12] हालांकि, इस योजना को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोध किया गया था।[12] उदाहरण के लिए, एसएमएम शनमुगम को पेंशन पाने के लिये 24 साल की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी, और उन्हें अंतत: अगस्त 2006 में पेंशन प्राप्त हुई।[12]

लोकप्रिय संस्कृति में

फिल्म निर्माता के ए देवराजन की 1998 की फिल्म गोपुरम में भारतीय स्वतंत्रता लीग को प्रमुख रूप से दर्शाया गया था।[13] फिल्म में, एक भारतीय पत्रकार के नानाजी 1930 के दशक में जापान में स्वतंत्रता कार्यकर्ता थे जिन्हें ब्रिटिश पुलिस खोज रही थी।[13] आखिरकार, नाना जापान में भारतीय स्वतंत्रता लीग में शामिल हो जाते और उनको वहाँ हुए अनुभव को प्रस्तुत किया गया है।[13]

अमिताव घोष के उपन्यास द ग्लास पैलेस (2000) में, घोष ने राजकुमार राह और उसकी विस्तारित परिवार की रंगून टीक व्यापार से प्राप्त संपत्ति की काल्पनिक काहानी कही है।[14] इस पुस्तक में, उमा डे एक विधवा और भारतीय स्वतंत्रता लीग कार्यकर्ता हैं।[14] पुस्तक के बाद के आधे हिस्से में उसकी उपस्थिति का उपयोग उपन्यास के शेष औपनिवेशिक डिवीजनों को दर्शाने के लिए किया गया है।[14]

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