भूपेन्द्रनाथ बोस

भूपेन्द्रनाथ बोस (1859 – 1924) अविभाजित बंगाल के कृष्णनगर में एक कायस्थ परिवार में जन्में थे। भूपेन्द्रनाथ की शिक्षा कृष्णनगर और कोलकाता में हुई थी। वे संस्कृत और फारसी के विद्वान थे। छात्र जीवन में ही वे इंग्लैंड और यूरोप की यात्राएं कर चुके थे। कोलकाता से उन्होंने 1881 में एम.ए. और 1883 में वकालत परीक्षा पास की। कोलकाता में वकील के रूप में काम करने के दौरान वे राजनीतिक आन्दोलन की ओर मुड़ गए।

1905 के बंग-भंग के आदेश को रद्द कराने के लिए भूपेन्द्रनाथ बोस 1907 में प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैंड गए। 1904 से 1910 तक बंगाल लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य के नाते उन्होंने आजादी के लिए आवाज उठाई और राष्ट्रीय आन्दोलन के काम में पूरी तरह जुट गए। वे अखबारों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे। 1910 में बने प्रेस एक्ट को स्वीकृति मिलने पर उसका विरोध किया था।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जीबिपिनचन्द्र पालबाल गंगाधर तिलक और अब्दुल रसूल उनके समकालीन राजनीतिज्ञ थे, परन्तु वे दादाभाई नौरोजी से सर्वाधिक प्रभावित रहे। उन्होंने 1922 में जिनेवा के अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया।

1923 में वे बंगाल के राज्यपाल की एक्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य बने। वे शिक्षा के मसलों से करीब से जुड़े रहे और उन्हें राष्ट्रीय संदर्भों में अधिक विकसित और सक्षम बनाने पर बल दिया। 1924 में अवसान के वक्त वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर काम कर रहे थे।

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