गांधीवाद

राजनीति
पर एक शृंखला का हिस्सा
प्रमुख विषय[दिखाएँ]
प्रणालियाँ[दिखाएँ]
अकादमिक विषय[दिखाएँ]
लोक प्रशासन[दिखाएँ]
नीति[दिखाएँ]
सरकार के अंग[दिखाएँ]
संबंधित विषय[दिखाएँ]
विचारधाराएँ[दिखाएँ]
उप-श्रंखलाएँ[दिखाएँ]
राजनीति प्रवेशद्वार
देवासं

गांधीवाद के पिता महात्मा गांधी

गांधीवाद महात्मा गांधी के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को कहा जाता है, जो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेताओं में से थे। यह ऐसे उन सभी विचारों का एक समेकित रूप है जो गांधीजी ने जीवन पर्यंत जिया था।

अनुक्रम

सत्याग्रह

मुख्य लेख: सत्याग्रह

सत्य एवं आग्रह दोनो ही संस्कृत भाषा के शब्द हैं, जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान प्रचलित हुआ था, जिसका अर्थ होता है सत्य के प्रति सत्य के माध्यम से आग्रही होना।

सत्य

गांधीवाद के बुनियादी तत्वों में से सत्य सर्वोपरि है;। वे मानते थे कि सत्य ही किसी भी राजनैतिक संस्था, सामाजिक संस्थान इत्यादि की धुरी होनी चाहिए। वे अपने किसी भी राजनैतिक निर्णय को लेने से पहले सच्चाई के सिद्धांतो का पालन अवश्य करते थे।

गांधीजी का कहना था “मेरे पास दुनियावालों को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है। सत्य एवं अहिंसा तो दुनिया में उतने ही पुराने हैं जितने हमारे पर्वत हैं।”

सत्य, अहिंसा, मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय पर उनकी निष्ठा को उनकी निजी जिंदगी के उदाहरणों से बखूबी समझा जा सकता है।

कहा जाता है कि सत्य की व्याख्या अक्सर वस्तुनिष्ठ नहीं होती। गांधीवाद के अनुसार सत्य के पालन को अक्षरशः नहीं बल्कि आत्मिक सत्य को मानने की सलाह दी गयी है। यदि कोई ईमानदारीपूर्वक मानता है कि अहिंसा आवश्यक है तो उसे सत्य की रक्षा के रूप में भी इसे स्वीकार करना चाहिए। जब गांधीजी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्वदेश लौटे थे तो उन्होंने कहा था कि वे शायद युद्ध में ब्रिटिशों की ओर से भाग लेने में कोई बुराई नहीं मानते। गांधीजी के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा होते हुए भारतीयों के लिए समान अधिकार की मांग करना और साम्राज्य की सुरक्षा में अपनी भागीदारी न निभाना उचित नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ द्वतीय विश्वयुद्ध के समय जापान द्वारा भारत की सीमा के निकट पहुंच जाने पर गांधीजी ने युद्ध में भाग लेने को उचित नहीं माना बल्कि वहां अहिंसा का सहारा लेने की वकालत की है।

अहिंसा

यह भी देखें: अहिंसा,

अहिंसा का सामान्य अर्थ है ‘हिंसा न करना’। इसका व्यापक अर्थ है – किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में भी किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी पीड़ा न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी का कोई नुकसान न करना।

ब्रम्हचर्य

यह भी देखें: ब्रम्हचर्य

खादी

उपवास व्यक्ति के अनुसार ही उत्तपन्न होता है|उपवास व्यक्ति मे शारीरिक अंगो मे तन्दुरस्ती लाता है|यह अनुकुल परिस्थितियो में करना लाभदायक होता हैं|

धर्म

यह भी देखें: भगवद गीताधर्महिंदु धर्मजैन धर्मबौद्ध धर्मईसाई धर्म

गाँधीजी के अनुसार धर्म और राजनीति को अलग नही किया जा सकता है क्योंकि धर्म मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए प्रेरित करता है । स्वधर्म सबका अपना अपना होता है पर धर्म मनुष्य को नैतिक बनाता है । सत्य बोलना, चोरी नहीं करना, परदु:खकातरता,दूसरों की सहायता करना आदी यही सभी धर्म सिखाते हैं । इन मूल्यों को अपनाने से ही राजनीति सेवा भाव से की जा सकेगी । गाँधीजी आडम्बर को धर्म नही मानते और जोर देकर कहते हैं कि मन्दिर मे बैठे भगवान मेरे राम नही है । स्वामी विवेकानंदजी के दरिद्र नारायण की संकल्पना को अपनाते हुए मानव सेवा को ही वो सच्चा धर्म मानते हैं । वास्तव मे उनका विश्वास है कि प्रत्येक प्राणी इश्वर की सन्तान हैं और ये सत्य है; सत्य ही ईश्वर है ।

नेहरू का भारत

यह भी देखें: सर्वोदय

स्वतंत्रता

यह भी देखें: रंगभेदतियननमेन चौक का प्रदर्शन १९८९अफ्रीकी-अमरीकी नागरिक अधिकार आंदोलन

“बिना सत्य कुछ भी नहीं”

वर्तमान गांधीवादी

अन्ना हज़ारे, नरेश कादयान

आलोचना एवं विवाद

यह भी देखें: भारत विभाजनमहात्मा गांधी की हत्या

विभाजन की अवधारणा

सैद्धांतिक रूप से गांधीजी भारत के विभाजन के खिलाफ रहे क्योंकि इससे उनके धार्मिक एकता की भावना को चोट पहुंचती थी[1] उन्होंने भारत के विभाजन के बारे में ६ अक्टूबर १९४६ को अपने पत्र हरिजन में लिखा था:

[पाकिस्तान की मांग] जैसा कि मुस्लीम लीग द्वारा रखी गयी है पूर्ण रूप से गैर-इस्लामी है एवं मुझे इसे पापपूर्ण कहते हुए भी कोई संकोच नहीं। इस्लाम पूरी मानवता के भाईचारे एवं एकता के पक्ष में रहा है इसलिए जो भारत के टुकडे करके दो आपस में लडने वाले समूह पैदा करना चाहते हैं वे सही मायनों में न सिर्फ भारत बल्कि इस्लाम के भी दुश्मन हैं। चाहे वे मेरे टुकडे टुकडे ही क्यों न कर दें लेकिन वे मुझे किसी गलत चीज को सही मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकते[…] हमें अपनी दृष्टि छोडने की बजाय सभी मुसलमान भाइयों का दिल प्यार से जीतना होगा[2]

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ सूची

टीका-टिप्पणी

  1.  रीप्रिंट द इसेंशियल गांधी: एन एन्थॉलजी ऑफ हिज राइटिंग्स ओन हिज लाइफ, वर्क ऐंड आइडियाजArchived 2 जुलाई 2007 at the वेबैक मशीन.., लुइस फिशर, संपा., २००२ (रिप्रिंट संस्करण) पृ. १०६–१०८.
  2.  रीप्रिंट द इसेंशियल गांधी: एन एंथॉलजी ऑफ हिज राइटिंग्स ओन हिज लाइफ, वर्क ऐंड आइडियाजArchived 2 जुलाई 2007 at the वेबैक मशीन..लुई फिशर, संपा., २००२ (रीप्रिंट संस्करण) पृ. ३०८–९.

बाहरी कड़ियाँ

Posted in Aik
Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *