सुशीला दीदी

सुशीला दीदी (५ मार्च १९०५ – १३ जनवरी १९६३) भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक क्रांतिकारी महिला थीं।

जीवन वृत्त

सुशीला दीदी का जन्म पंजाब राज्य के गुजरात मण्डल के दन्तो चुहाड़ में ५ मार्च १९०५ को हुआ था। १९२६ में जब वह कॉलेज की पढ़ाई कर रहीं थी, उनमें देश प्रेम की भावना प्रबल हुई। इसके बाद वे भारत की स्वाधीनता के लिए काम करने वाले क्रांतिकारी दल में शामिल हो गईं।

क्रांतिकारी गतिविधियाँ

१९२६ ई. में बिस्मिलरोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दिये जाने की घटना ने सुशीला को क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर मोड़ दिया। वे भगवती चरण बोहरा के साथ हिन्दुस्तान शोसलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हो गईं। सान्डर्स की हत्या के बाद उन्होने भगत सिंह के छिपकर रहने के लिये कोलकाता में एक घर की व्यवस्था की। असेम्बली पर बम फेकने के बाद जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पकड़े गये तो सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी ने मिलकर अन्य क्रांतिकारियों को भाग जाने में सहायता की। १ अक्टूबर १९३१ को उन्होने अन्य के साथ मिलकर यूरोपीय सर्जेण्ट टेलर तथा उसकी पत्नी को गोली मारी और बच निकलीं।

काकोरी काण्ड के कैदियों के मुक़दमे की पैरवी के लिए अपनी स्वर्गीय माँ द्वारा शादी की ख़ातिर रखा 10 तोला सोना उठाकर दान में दिया।

  • यही नहीं उन्होंने क्रांतिकारियों का केस लड़ने के लिए ‘मेवाड़पति’ नामक नाटक खेलकर चन्दा भी इकट्ठा किया।
  • सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में ‘इन्दुमति’ के छद्म नाम से सुशीला दीदी ने भाग लिया और गिरफ्तार हुयीं।
  • इसी प्रकार हसरत मोहानी को जब जेल की सज़ा मिली तो उनके कुछ दोस्तों ने जेल की चक्की पीसने के बजाय उनसे माफी मांगकर छूटने की सलाह दी।
  • इसकी जानकारी जब बेगम हसरत मोहानी को हुई तो उन्होंने पति की जमकर हौसला अफ्ज़ाई की और दोस्तों को नसीहत भी दी।
  • मर्दाना वेष धारण कर उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में खुलकर भाग लिया और बाल गंगाधर तिलक के गरम दल में शामिल होने पर गिरफ्तार कर जेल भेज दी गयी, जहाँ उन्होंने चक्की भी पीसी।
  • यही नहीं महिला मताधिकार को लेकर 1917 में सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में वायसराय से मिलने गये प्रतिनिधिमण्डल में वह भी शामिल थीं।

बाहरी कड़ियाँ

Posted in Aik
Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *