द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध
Second Anglo-Sikh War

पंजाब का भौगोलिक मानचित्र
तिथि18 अप्रैल 1848 – 30 मार्च 1849स्थानपंजाबपरिणामनिर्णायक ब्रिटिश जीत
ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिख साम्राज्य को जोड़ दिया
योद्धा
 ईस्ट इंडिया कंपनी सिख साम्राज्य

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध पंजाब के सिख प्रशासित क्षेत्रों वाले राज्य तथा अंग्रेजों के ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1848-49 के बीच लड़ा गया था। इसके परिणाम स्वरूप सिख राज्य का संपूर्ण हिस्सा अंग्रेजी राज का अंग बन गया।

परिचय

मुल्तान के गवर्नर मूलराज ने, ‘उत्तराधिकार दंड’ माँगे जाने पर त्यागपत्र दे दिया। परिस्थिति संभालने, लाहौर दरबार द्वारा खान सिंह के साथ दो अंग्रेज अधिकारी भेजे गए, जिनकी हत्या हो गई। तदंतर मूलराज ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह द्वितीय सिक्ख युद्ध का एक आधार बना। राजमाता रानी जिंदा को सिक्खों को उत्तेजित करने के संदेह पर शेखपुरा में बंदी बना दिया था। अब, विद्रोह में सहयोग देने के अभियोग पर उसे पंजाब से निष्कासित कर दिया गया। इससे सिक्खों में तीव्र असंतोष फैलना अनिवार्य था। अंतत: कैप्टन ऐबट की साजिशों के फलस्वरूप, महाराजा के भावी श्वसुर, वयोवृद्ध छतर सिंह अटारीवाला ने भी बगावत कर दी। शेर सिंह ने भी अपने विद्रोही पिता का साथ दिया। यही विद्रोह सिक्ख युद्ध में परिवर्तित हो गया।

  • प्रथम संग्राम (13 जनवरी 1849) चिलियाँवाला में हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों की सर्वाधिक क्षति हुई। संघर्ष इतना तीव्र था कि दोनों पक्षों ने अपने विजयी होने का दावा किया।
  • द्वितीय मोर्चा (21 फरवरी) गुजरात में हुआ। सिक्ख पूर्णतया पराजित हुए; तथा 12 मार्च को यह कहकर कि आज रणजीत सिंह मर गए, सिक्ख सिपाहियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। 29 मार्च को पंजाब अंग्रेजी साम्राज्य का अंग घोषित हो गया।

युद्ध की पृष्ठभूमि

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों के दौरान पंजाब के सिख साम्राज्य को महाराजा रणजीत सिंह ने समेकित और विस्तारित किया था। इसी अवधि के दौरान, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्रों का विस्तार तब तक बढ़ाया गया जब तक कि वे पंजाब के नजदीक न हों। रंजीत सिंह ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ एक असहज गठबंधन बनाए रखा, जबकि सिख खालसा सेना की सैन्य ताकत बढ़ रही थी, जिसने खुद को राज्य और धर्म के अवतार के रूप में देखा, ताकि वह अपने राज्य के खिलाफ ब्रिटिश आक्रामकता को रोक सके और सिख क्षेत्र का विस्तार कर सके। उत्तर और उत्तर पश्चिम, अफगानिस्तान और कश्मीर से क्षेत्र को जीत संके।[1]

जब 1839 में रंजीत सिंह की मृत्यु हो गई, तो सिख साम्राज्य कमजोर पड़ना शुरू हो गया। केंद्रीय दरबार (अदालत) में अल्पकालिक शासकों का उत्तराधिकार था, और सेना और दरबार के बीच तनाव बढ़ रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब की सीमाओं पर अपनी सैन्य ताकत का निर्माण शुरू किया। आखिरकार, बढ़ते तनाव ने सिख सेना को कमजोर और संभवतः विश्वासघाती नेताओं के अधीन ब्रिटिश क्षेत्र पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।.[2] कठिन लड़ाकू पहला एंग्लो-सिख युद्ध सिख सेना के लिए हार में समाप्त हुआ।

सन्दर्भ

  • डॉ॰ हरीराम गुप्त: हिस्ट्री ऑव द सिक्खस;
  • अनिलचंद्र बनर्जी: ऐंग्लो सिक्ख रिलेशंस; केंब्रिज हिस्ट्री ऑव इंडिया, खंड ५

इन्हें भी देखें

[छुपाएँ]देवासंसिख साम्राज्य 
शासकरणजीत सिंहखड़क सिंहनौ निहाल सिंहचाँद कौरशेर सिंहदलीप सिंह
सैन्य
संघर्ष
अफ़ग़ान-सिख युद्धअटकमुल्तानशोपियांनौशेराजमरूदप्रथम आंग्ल-सिख युद्धमुदकीफिरोज़शाहअलीवालसोबरायद्वितीय आंग्ल-सिख युद्धरामनगरचिलियानवालामुल्तानगुजरातअन्यसिख मिस्लों में आपसी लड़ाइयाँ
शत्रुमुग़ल साम्राज्यअफगानिस्तान की अमीरातब्रिटिश साम्राज्य
क़िलेदल्लेवाल क़िलाजमरूद किलामुल्तान क़िलाहरकिशनगढ़ क़िलासुमेरगढ़ क़िलाउड़ी का क़िलालाहौर का किला
  1.  Hernon 2002, p.575
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