इल्बर्ट विधेयक

इल्बर्ट विधेयक 9 फरवरी 1883 से समस्त देश में एक ही फौजदारी कानून लागू कर दिया गया था और प्रत्येक प्रांत में उच्च न्यायालय स्थापित कर दिए गए थे । उससे पूर्व देश में दो प्रकार के कानून चलते थे । प्रेसिडेंसी नगरों में अंग्रेजी कानून और ग्रामीण प्रदेशों में मुगल कानून । उस समय ऐसा सोचा गया था कि यूरोपीय व्यक्तियों को मुस्लिम कानून के अंतर्गत लाना ठीक नहीं है और उस समय एक प्रथा बन गई थी कि प्रेसिडेंसी नगरो भारतीय दंड नायक तथा सेशन जज भारतीय तथा यूरोपीय दोनों के मुकदमों की सुनवाई कर सकते थे । परंतु ग्रामीण प्रदेशों में केवल यूरोपीय न्यायाधीशों ही यूरोपीय अभियुक्तों का मुकदमा सुन सकते थे । दीवानी मामलों में ऐसा कोई भेदभाव नहीं था 1872 में तीन भारतीय संसर्वित जानपद सेवा में नियुक्त हुए थे । उनमें एक थे श्री बिहारी लाल गुप्ता । वह वह कोलकाता में प्रेसिडेंट दण्डनायक के पद पर पर कार्य कर रहे थे । 1882 में उनकी पदोन्नति हो गई और वह कोलकाता से बाहर भेज दिए गए और अब अवस्था यह हो गई कि इस पदोन्नति के पश्चात उन्हें यूरोपीय अभियुक्तों का मुकदमा सूनने का अधिकार नहीं रहा । उसने बंगाल के उप गवर्नर सर एशले इडेन को इस विषय में पत्र लिखा कि पदोन्नति पर उसके अधिकार कम हो जाए तो यह न्याय संगत बात नहीं । इस भारतीय और यूरोपीय पदाधिकारियों में द्वेश उत्पन्न करने वाले भेदभाव से न्यायाधीशों के अधिकार और शक्तियाँ नष्ट होती थी ।

सर पीसी ईल्बर्ट जो वायसराय की परिषद में विधि सदस्य थे । उन्होंने इस अन्याय को दूर करने की भावना से एक विधेयक जिसे इल्बर्ट बिल की संज्ञा दी जाती है । विधान परिषद में 2 फरवरी 1883 को प्रस्तुत किया । विधेयक का उद्देश्य था कि जातिभेद पर आधारित सभी न्यायिक आयोग्यताएं तुरंत समाप्त कर दी जाए और भारतीय तथा यूरोपीय न्यायाधीशों की शक्तियां कर समान कर दी जाए ।

ज्योहीं यह विधेयक प्रस्तुत किया गया की एक बवंडर खड़ा हो गया । यूरोपीय लोगों ने इसे अपने अधिकारों पर कुठाराघात बतलाया। वास्तव में झगड़ा करने वाले बड़े बड़े उद्दानो वालेयूरोपीय स्वामी थे । ये लोग प्रायः अपने मजदूरों तथा कार्यकर्ताओं से कठोर व्यवहार करते थे और कभी-कभी तो पीटते पीटते उनकी हत्या भी कर देते थे । इन लोगों को यूरोपीय न्यायाधीश बिना दण्ड के ही अथवा थोड़ा सा दंड देकर छोड़ देते थे । इन विशेष अधिकारों की रक्षा के हेतु यूरोपीय समुदाय ने एक प्रतिरक्षण संघ बनाया । डेढ़ लाख रुपया चंदे के रूप में एकत्रित किया गया । उन्होंने भारत और लंदन में इस हेतु प्रचार किया और यह कहा “क्या हमारा निर्णय काले लोग करेंगे ? क्या वे हमें जेल भेजेंगे ? क्या वे हम पर आज्ञा चलाएंगे ? कभी नहीं । यह आसंभव है । यह अधिक अच्छा है कि भारत में अंग्रेजी राज्य ही समाप्त हो जाए परंतु यह ठीक नहीं कि हम इस प्रकार के तिरस्कृत कानूनों के अधीन रहे उनके अनुसार वायसराय ने अपने ही देशवासियों पर प्रहार कर दिया है ” उन्होंने उसे गालियां निकाली और अंग्रेजी सरकार से अनुरोध किया कि उसका कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व ही उसे वापस बुला ले । यह भी संभव था कि कोलकाता में जातीय दंगे हो जाते । कुछ यूरोपीय ने तो यहां तक षडयंत्र रचा कि वायसराय के निवास पर तैनात सन्तरी को पराजित करके वायसराय को बंदी बनाकर उसे एक स्ट्रीमर में डालकर इंग्लैंड भेज दिया जाए । असम के उद्यानों के मालिकों ने एक और षड्यंत्र रचा कि जब वायसराय वहां आखेट के हेतु आए तो उसका अपहरण कर लिया जाए । लंदन के प्रसिद्ध पत्र दी टाइम्स ने रिपन की नीतियों की आलोचना की । महारानी विक्टोरिया ने भी वायसराय के प्रस्ताव के बुद्धिमत्ता पर संदेह प्रकट किया ।

रिपन को भी झुकना पड़ा और अंत में एक ऐसा समझौता हो गया जिसके अनुसार ऐसा निर्णय हुआ कि जो उद्देश्य था वह पूरा नहीं हो सका । 26 जनवरी 1884 को एक नया विधेयक पारित किया गया जिसके अनुसार यदि यूरोपीय लोगों के मुकदमे दंडनायको अथवा सेशन जजो के सामने आए तो वे लोग 12 व्यक्तियों की शपथ ज्यूरी (Jury) द्वारा मुकदमे की सुनवाई मांग सकते थे और 12 व्यक्तियों में से कम से कम 7 का यूरोपीय अथवा अमेरिकन होना आवश्यक था । ग्रामीणों प्रदेशों में jury जहां द्वारा मुकदमे की सुनवाई असंभव थी वहां वह मुकदमा न्यायाधीशो को उच्च न्यायालय की आज्ञा पर कहीं और हस्तांतरित करना होता था । -Arpan

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