औरंगज़ेब

औरंगज़ेब
औरंगज़ेब
छठवें मुग़ल शहंशाह
शासनावधि31 July 1658 – 3 March 1707
राज्याभिषेक13 June 1659 at शालीमार बाग , दिल्ली
पूर्ववर्तीशाहजहाँ
उत्तरवर्तीMuhammad Azam Shah (titular)
बहादुर शाह I
जन्मMuḥī al-Dīn Muḥammad[1]
3 नवम्बर 1618 (N.S.)
DahodMughal Empire
निधन3 March 1707 (N.S.) (aged 88)
अहमदनगरMughal Empire
समाधिTomb of AurangzebKhuldabad
Consortदिलरस बानो बेगम
Wivesनवाब बाई
औरंगाबादी महल
संतानज़ेब-उन-निसाMuhammad SultanZinat-un-Nissaबहादुर शाह IBadr-un-NissaZubdat-un-NissaMuhammad Azam ShahSultan Muhammad AkbarMehr-un-NissaMuhammad Kam Bakhsh
पूरा नाममुहिउद्दीन मुहम्मदशासनावधि नामAlamgir
घरानातैमूरी
पिताशाहजहाँ
मातामुमताज़ महल
धर्मसुन्नी इस्लाम

अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मोहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर (3 नवम्बर – 3 मार्च 1707), जिन्हें आम तौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर (प्रजा द्वारा दिया गया शाही नाम जिसका मतलब होता है विश्व विजेता) के नाम से जाना जाता था, भारत पर राज करने वाले छठे मुग़ल शहंशाह थे। उनका शासन 1658 से लेकर 1707 में उनकी मृत्यु होने तक चला। औरंगज़ेब ने भारतीय उपमहाद्वीप पर आधी सदी से भी ज़ियादा समय तक राज किया। वे अकबर के बाद सबसे ज़ियादा समय तक शासन करने वाले मुग़ल शहंशाह थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने दक्षिणी भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार करने का भरपूर प्रयास किया पर उनकी मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य सिकुड़ने शुरू हो गया।

औरंगज़ेब के शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने विस्तार के शिखर पर पहुंचा। वे अपने समय के शायद सबसे दौलतमंद और ताक़तवर शख़्स थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में दक्षिण भारत में प्राप्त विजयों के के ज़रिए मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील में फैलाया और 15 करोड़ लोगों पर शासन किया जो की दुनिया की आबादी का 1/4 था।

औरंगज़ेब ने पूरे साम्राज्य पर फ़तवा-ए-आलमगीरी (शरियत या इस्लामी क़ानून पर आधारित) लागू किया और कुछ समय के लिए ग़ैर-मुसलमानों पर और ज़ियादा कर भी लगाया। ग़ैर-मुसलमान प्रजा पर शरी’अत लागू करने वाले वे पहले मुसलमान शासक थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में मुग़ल नौकरशाही में काफ़ी ज़ियादा हिंदुओं को नियुक्त किया और सिखों के गुरु तेग़ बहादुर को दारा शिकोह के साथ मिलकर बग़ावत करने के जुर्म में मृत्युदंड दिया था।

शुरूआती जीवन

औरंगज़ेब का जन्म 3 नवम्बर १६१८ को दाहोद, गुजरात में हुआ था।[2] वो शाहजहाँ और मुमताज़ महल की छठी संतान और तीसरा बेटा था। उसके पिता उस समय गुजरात के सूबेदार थे। जून १६२६ में जब उसके पिता द्वारा किया गया विद्रोह असफल हो गया तो औरंगज़ेब और उसके भाई दारा शूकोह को उनके दादा जहाँगीर के लाहौर वाले दरबार में नूर जहाँ द्वारा बंधक बना कर रखा गया। २६ फ़रवरी १६२८ को जब शाहजहाँ को मुग़ल सम्राट घोषित किया गया तब औरंगज़ेब आगरा किले में अपने माता पिता के साथ रहने के लिए वापस लौटा। यहीं पर औरंगज़ेब ने अरबी और फ़ारसी की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की।

सत्तासन

मुग़ल प्रथाओं के अनुसार, शाहजहाँ ने 1634 में शहज़ादा औरंगज़ेब को दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया। औरंगज़ेब किरकी (महाराष्ट्र) को गया जिसका नाम बदलकर उसने औरंगाबाद कर दिया। 1637 में उसने रबिया दुर्रानी से शादी की। इधर शाहजहाँ मुग़ल दरबार का कामकाज अपने बेटे दारा शिकोह को सौंपने लगा। 1644 में औरंगज़ेब की बहन एक दुर्घटना में जलकर मर गई। औरंगज़ेब इस घटना के तीन हफ्ते बाद आगरा आया जिससे उसके पिता शाहजहाँ को उसपर बेहद क्रोध आया। उसने औरंगज़ेब को दक्कन के सूबेदार के ओहदे से बर्ख़ास्त कर दिया। औरंगज़ेब 7 महीनों तक दरबार नहीं आ सका। बाद में शाहजहाँ ने उसे गुजरात का सूबेदार बनाया। औरंगज़ेब ने सुचारू रूप से शासन किया और उसे इसका सिला भी मिला, उसे बदख़्शान (उत्तरी अफ़गानिस्तान) और बाल्ख़ (अफ़गान-उज़्बेक) क्षेत्र का सूबेदार बना दिया गया।

इसके बाद उसे मुल्तान और सिंध का भी गवर्नर बनाया गया। इस दौरान वो फ़ारस के सफ़वियों से कंधार पर नियंत्रण के लिए लड़ता रहा पर उसे हार के अलावा और कुछ मिला तो वो था- अपने पिता की उपेक्षा। 1652 में उसे दक्कन का सूबेदार फ़िर से बनाया गया। उसने गोलकोंडा और बीजापुर के खिलाफ़ लड़ाइयाँ की और निर्णायक क्षण पर शाहजहाँ ने सेना वापस बुला ली। इससे औरंगज़ेब को बहुत ठेस पहुँची क्योंकि शाहजहाँ ऐसा उसके भाई दारा शिकोह के कहने पर कर रहा था।

सत्ता संघर्ष

शाहजहाँ १६५२ में ऐसे बीमार हुए कि लोगों को उनका अन्त निकट लग रहा था। ऐसे में दारा शिकोहशाह शुजा और औरंगज़ेब के बीच में सत्ता संघर्ष शुरू हुआ। शाह शुजा जिसने स्वयं को बंगाल का राज्यपाल घोषित कर दिया था, अपने बचाव के लिए बर्मा के अरकन क्षेत्र में शरण लेने पर विवश हुआ। १६५९ में औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को ताज महल में बन्दी बना लिया और स्वयं को शासक घोषित किया। दारा शिकोह को गद्दारी के आरोप में फाँसी दी गई। शासक होकर भी औरंगज़ेब ने राजकोष से अपने पर कुछ खर्च नहीं किया।

शासनकाल

मुग़ल, ख़ासकर अकबर के बाद से, ग़ैर-मुसलमानों पर उदार रहे थे लेकिन औरंगज़ेब उनके ठीक उलट था। औरंगज़ेब ने जज़िया कर फिर से आरंभ करवाया, जिसे अकबर ने ख़त्म कर दिया था। उसने कश्मीरी ब्राह्मणों को इस्लाम क़बूल करने पर मजबूर किया। कश्मीरी ब्राह्मणों ने सिक्खों के नौवें गुरु तेग़ बहादुर से मदद मांगी। तेग़बहादुर ने इसका विरोध किया तो औरंगज़ेब ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। इस दिन को सिक्ख आज भी अपने त्यौहारों में याद करते हैं।

साम्राज्य विस्तार

औरंगज़ेब के शासन काल में युद्ध-विद्रोह-दमन-चढ़ाई इत्यादि का तांता लगा रहा। पश्चिम में सिक्खों की संख्या और शक्ति में बढ़ोत्तरी हो रही थी। दक्षिण में बीजापुर और गोलकुंडा को अंततः उसने हरा दिया पर इस बीच छत्रपति शिवाजी की मराठा सेना ने उनको नाक में दम कर दिया। छत्रपति शिवाजी को औरंगज़ेब ने गिरफ़्तार कर तो लिया पर शिवाजी और सम्भाजी के भाग निकलने पर उसके लिए बेहद फ़िक्र का सबब बन गया। आखिर शिवाजी महाराजा ने औरंगज़ेब को हराया और भारत में मराठो ने पूरे देश में अपनी ताकत बढाई शिवाजी की मृत्यु के बाद भी मराठों ने औरंगज़ेब को परेशान किया। इस बीच हिन्दुओं को इस्लाम में परिवर्तित करने की नीति के कारण राजपूत उसके ख़िलाफ़ हो गए थे और उसके 1707 में मरने के तुरंत बाद उन्होंने विद्रोह कर दिया।

औरंगज़ेब के प्रशासन में हिंदू

औरंगज़ेब के प्रशासन में दूसरे मुग़ल शहंशाहों से ज्यादा हिंदू नियुक्त थे और शिवाजी भी इनमें शामिल थे। मुग़ल इतिहास के बारे में यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि दूसरे शहंशाहों की तुलना में औरंगज़ेब के शासनकाल में सबसे ज्यादा हिंदू प्रशासन का हिस्सा थे। ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि औरंगज़ेब के पिता शाहजहां के शासनकाल में सेना के विभिन्न पदों, दरबार के दूसरे अहम पदों और विभिन्न भौगोलिक प्रशासनिक इकाइयों में हिंदुओं की तादाद 24 फीसदी थी जो औरंगज़ेब के समय में 33 फीसदी तक हो गई थी। एम अथर अली के शब्दों में कहें तो यह तथ्य इस धारणा के विरोध में सबसे तगड़ा सबूत है कि शहंशाह हिंदू मनसबदारों के साथ पक्षपात करता था।[3]

औरंगज़ेब की सेना में वरिष्ठ पदों पर बड़ी संख्या में कई राजपूत नियुक्त थे। मराठा और सिखों के खिलाफ औरंगज़ेब के हमले को धार्मिक चश्मे से देखा जाता है लेकिन यह निष्कर्ष निकालते वक्त इस बात की उपेक्षा कर दी जाती है कि तब युद्ध क्षेत्र में मुग़ल सेना की कमान अक्सर राजपूत सेनापति के हाथ में होती थी। इतिहासकार यदुनाथ सरकार लिखते हैं कि एक समय खुद शिवाजी भी औरंगज़ेब की सेना में मनसबदार थे। कहा जाता है कि वे दक्षिण भारत में मुग़ल सल्तनत के प्रमुख बनाए जाने वाले थे लेकिन उनकी सैन्य कुशलता को भांपने में नाकाम रहे औरंगज़ेब ने इस नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी।

व्यक्तित्व

औरंगज़ेब पवित्र जीवन व्यतीत करता था। अपने व्यक्तिगत जीवन में वह एक आदर्श व्यक्ति था। वह उन सब दुर्गुणों से सर्वत्र मुक्त था, जो एशिया के राजाओं में सामन्यतः थे। वह यति-जीवन जीता था। खाने-पीने, वेश-भूषा और जीवन की अन्य सभी-सुविधाओं में वह संयम बरतता था। प्रशासन के भारी काम में व्यस्त रहते हुए भी वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए क़ुरान की नकल करके और टोपियाँ सीकर कुछ पैसा कमाने का समय निकाल लेता था।

मातृभाषा और मूल

औरंगज़ेब ही नहीं सभी मध्यकालीन भारत के तमाम मुसलमान बादशाहों के बारे में एक बात यह भी कही जाती है कि उनमें से कोई भारतीय नहीं था। वैसे एक स्तर पर यह बचकाना और बेमतलब का तर्क है क्योंकि 17वीं शताब्दी के भारत में (और दुनिया में कहीं भी) राष्ट्र जैसी अवधारणा का तो कहीं अस्तित्व ही नहीं था।[3]

हालांकि इसके बाद भी यह बात कम से कम औरंगज़ेब के मामले में लागू नहीं होती। यह मुग़ल शहंशाह पक्का उच्चवर्गीय हिंदुस्तानी था। इसका सीधा तर्क यही है कि उसका जन्म गुजरात के दाहोद में हुआ था और उसका पालन पोषण उच्चवर्गीय हिंदुस्तानी परिवारों के बच्चों की तरह ही हुआ। पूरे मुग़लकाल में ब्रज भाषा और उसके साहित्य को हमेशा संरक्षण मिला था और यह परंपरा औरंगज़ेब के शासन में भी जारी रही। कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जुड़ी इतिहासकार एलिसन बुश बताती हैं कि औरंगज़ेब के दरबार में ब्रज को प्रोत्साहन देने वाला माहौल था। शहंशाह के बेटे आजम शाह की ब्रज कविता में खासी दिलचस्पी थी। ब्रज साहित्य के कुछ बड़े नामों जैसे महाकवि देव को उसने संरक्षण दिया था। इसी भाषा के एक और बड़े कवि वृंद तो औरंगज़ेब के प्रशासन में भी नियुक्त थे।

मुग़लकाल में दरबार की आधिकारिक लेखन भाषा फारसी थी लेकिन औरंगज़ेब का शासन आने से पहले ही शहंशाह से लेकर दरबारियों तक के बीच प्रचलित भाषा हिंदी-उर्दू हो चुकी थी। इसे औरंगज़ेब के उस पत्र से भी समझा जा सकता है जो उसने अपने 47 वर्षीय बेटे आजम शाह को लिखा था। शहंशाह ने अपने बेटे को एक किला भेंट किया था और इस मौके पर नगाड़े बजवाने का आदेश दिया। आजम शाह को लिखे पत्र में औरंगज़ेब ने लिखा है कि जब वह बच्चा था तो उसे नगाड़ों की आवाज खूब पसंद थी और वह अक्सर कहता था, ‘बाबाजी ढन-ढन!’ इस उदाहरण से यह बात कही जा सकती है कि औरंगज़ेब का बेटा तत्कालीन प्रचलित हिंदी में ही अपने पिता से बातचीत करता था।[3]

धार्मिक नीति

औरंगज़ेब

सम्राट औरंगज़ेब ने इस्लाम धर्म के महत्व को स्वीकारते हुए ‘क़ुरान’ को अपने शासन का आधार बनाया। उसने सिक्कों पर कलमा खुदवाना, नौरोज का त्यौहार मनाना, भांग की खेती करना, गाना-बजाना आदि पर रोक लगा दी। 1663 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाया। तीर्थ कर पुनः लगाया। अपने शासन काल के 11 वर्ष में ‘झरोखा दर्शन’, 12वें वर्ष में ‘तुलादान प्रथा’ पर प्रतिबन्ध लगा दिया, 1668 ई. में हिन्दू त्यौहारों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। 1699 ई. में उसने हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। बड़े-बड़े नगरों में औरंगज़ेब द्वारा ‘मुहतसिब’ (सार्वजनिक सदाचारा निरीक्षक) को नियुक्त किया गया। 1669 ई. में औरंगज़ेब ने बनारस के ‘विश्वनाथ मंदिर’ एवं मथुरा के ‘केशव राय मदिंर’ को तुड़वा दिया। उसने शरीयत के विरुद्ध लिए जाने वाले लगभग 80 करों को समाप्त करवा दिया। इन्हीं में ‘आबवाब’ नाम से जाना जाने वाला ‘रायदारी’ (परिवहन कर) और ‘पानडारी’ (चुंगी कर) नामक स्थानीय कर भी शामिल थे। औरंगज़ेब ‘दारुल हर्ब’ (क़ाफिरों का देश भारत) को ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम का देश) में परिवर्तित करने को अपना महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानता था।

औरंगज़ेब के समय में ब्रज में आने वाले तीर्थ−यात्रियों पर भारी कर लगाया गया जज़िया कर फिर से लगाया गया और हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया। उस समय के कवियों की रचनाओं में औरंगज़ेब के अत्याचारों का उल्लेख है।

जिज़्या

औरंगज़ेब द्वारा लगाया गया जिज़्या कर उस समय के हिसाब से था। अकबर ने जिज़्या कर को समाप्त कर दिया था, लेकिन औरंगज़ेब के समय यह दोबारा लागू किया गया। जिज़्या सामान्य करों से अलग था जो ग़ैर-मुसलमानों को चुकाना पड़ता था। इसके तीन स्तर थे और इसका निर्धारण संबंधित व्यक्ति की आमदनी से होता था। इस कर के कुछ अपवाद भी थे। गरीबों, बेरोजगारों और शारीरिक रूप से अशक्त लोग इसके दायरे में नहीं आते थे। इनके अलावा हिंदुओं की वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर आने वाले ब्राह्मण और सरकारी अधिकारी भी इससे बाहर थे। मुसलमानों के ऊपर लगने वाला ऐसा ही धार्मिक कर जकात था जो हर अमीर मुसलमान के लिए देना ज़रूरी था ।[3]

आधुनिक मूल्यों के मानदंडों पर जिज़्या निश्चितरूप से एक पक्षपाती कर व्यवस्था थी। आधुनिक राष्ट्र, धर्म और जाति के आधार पर इस तरह का भेद नहीं कर सकते। इसीलिए जब हम 17वीं शताब्दी की व्यवस्था को आधुनिक राष्ट्रों के पैमाने पर इसे देखते हैं तो यह बहुत अराजक व्यवस्था लग सकती है, लेकिन औरंगज़ेब के समय ऐसा नहीं था। उस दौर में इसके दूसरे उदाहरण भी मिलते हैं। जैसे मराठों ने दक्षिण के एक बड़े हिस्से से मुग़लों को बेदखल कर दिया था। उनकी कर व्यवस्था भी तकरीबन इसी स्तर की पक्षपाती थी। वे मुसलमानों से जकात वसूलते थे और हिंदू आबादी इस तरह की किसी भी कर व्यवस्था से बाहर थी।[3]

मंदिर निर्माण और विध्वंस

औरंगज़ेब ने जितने मंदिर तुड़वाए, उससे कहीं ज्यादा बनवाए थे। विश्वप्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड ईटन के मुताबिक मुग़लकाल में मंदिरों को ढहाना दुर्लभ घटना हुआ करती थी और जब भी ऐसा हुआ तो उसके कारण राजनीतिक रहे। ईटन के मुताबिक वही मंदिर तोड़े गए जिनमें विद्रोहियों को शरण मिलती थी या जिनकी मदद से शहंशाह के खिलाफ साजिश रची जाती थी। उस समय मंदिर तोड़ने का कोई धार्मिक उद्देश्य नहीं था।[3]

इस मामले में कुख्यात कहा जाने वाला औरंगज़ेब भी सल्तनत के इसी नियम पर चला। उसके शासनकाल में मंदिर ढहाने के उदाहरण बहुत ही दुर्लभ हैं (ईटन इनकी संख्या 15 बताते हैं) और जो हैं उनकी जड़ में राजनीतिक कारण ही रहे हैं। उदाहरण के लिए औरंगज़ेब ने दक्षिण भारत में कभी-भी मंदिरों को निशाना नहीं बनाया जबकि उसके शासनकाल में ज्यादातर सेना यहीं तैनात थी। उत्तर भारत में उसने जरूर कुछ मंदिरों पर हमले किए जैसे मथुरा का केशव राय मंदिर लेकिन इसका कारण धार्मिक नहीं था। मथुरा के जाटों ने सल्तनत के खिलाफ विद्रोह किया था इसलिए यह हमला किया गया।

ठीक इसके उलट कारणों से औरंगज़ेब ने मंदिरों को संरक्षण भी दिया। यह उसकी उन हिंदुओं को भेंट थी जो शहंशाह के वफादार थे। किंग्स कॉलेज, लंदन की इतिहासकार कैथरीन बटलर तो यहां तक कहती हैं कि औरंगज़ेब ने जितने मंदिर तोड़े, उससे ज्यादा बनवाए थे। कैथरीन फ्रैंक, एम अथर अली और जलालुद्दीन जैसे विद्वान इस तरफ भी इशारा करते हैं कि औरंगज़ेब ने कई हिंदू मंदिरों को अनुदान दिया था जिनमें बनारस का जंगम बाड़ी मठचित्रकूट का बालाजी मंदिर, इलाहाबाद का सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर और गुवाहाटी का उमानंद मंदिर सबसे जाने-पहचाने नाम हैं।[3]

जिस कालखंड यानी मुग़लकाल में मंदिरों को तोड़े जाने की बात इतनी ज्यादा प्रचलन में है, उसमें हिंदुओं द्वारा कहीं इस बात का विशेष जिक्र नहीं मिलता। तर्क दिया जा सकता है कि उस दौर में ऐसा करना खतरे से खाली नहीं रहा होगा, लेकिन 18वीं शताब्दी में जब सल्तनत खत्म हो गई तब भी इस बात का कहीं जिक्र नहीं मिलता। अतीत में मुग़ल शासकों द्वारा हिंदू मंदिर तोड़े जाने का मुद्दा भारत में 1980-90 के दशक में गर्म हुआ ।

संगीत

औरंगज़ेब को कट्टरपंथी साबित करने की कोशिश में एक बड़ा तर्क यह भी दिया जाता है कि उसने संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन यह बात भी सही नहीं है। कैथरीन बताती हैं कि सल्तनत में तो क्या संगीत पर उसके दरबार में भी प्रतिबंध नहीं था। शहंशाह ने जिस दिन राजगद्दी संभाली थी, हर साल उस दिन उत्सव में खूब नाच-गाना होता था।[3] कुछ ध्रुपदों की रचना में औरंगज़ेब नाम शामिल है जो बताता है कि उसके शासनकाल में संगीत को संरक्षण हासिल था। कुछ ऐतिहासिक तथ्य इस बात की तरफ भी इशारा करते हैं कि वह खुद संगीत का अच्छा जानकार था। मिरात-ए-आलम में बख्तावर खान ने लिखा है कि शहंशाह को संगीत विशारदों जैसा ज्ञान था। मुग़ल विद्वान फकीरुल्लाह ने राग दर्पण नाम के दस्तावेज में औरंगज़ेब के पसंदीदा गायकों और वादकों के नाम दर्ज किए हैं। औरंगज़ेब को अपने बेटों में आजम शाह बहुत प्रिय था और इतिहास बताता है कि शाह अपने पिता के जीवनकाल में ही निपुण संगीतकार बन चुका था।

औरंगज़ेब के शासनकाल में संगीत के फलने-फूलने की बात करते हुए कैथरीन लिखती हैं, ‘500 साल के पूरे मुग़लकाल की तुलना में औरंगज़ेब के समय फारसी में संगीत पर सबसे ज्यादा टीका लिखी गईं।’ हालांकि यह बात सही है कि अपने जीवन के अंतिम समय में औरंगज़ेब ज्यादा धार्मिक हो गया था और उसने गीत-संगीत से दूरी बना ली थी। लेकिन ऊपर हमने जिन बातों का जिक्र किया है उसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि उसने कभी अपनी निजी इच्छा को सल्तनत की आधिकारिक नीति नहीं बनाया।[3]

मौत

औरंगज़ेब के अन्तिम समय में दक्षिण में मराठों का ज़ोर बहुत बढ़ गया था। उन्हें दबाने में शाही सेना को सफलता नहीं मिल रही थी। इसलिए सन 1683 में औरंगज़ेब स्वयं सेना लेकर दक्षिण गया। वह राजधानी से दूर रहता हुआ, अपने शासन−काल के लगभग अंतिम 25 वर्ष तक उसी अभियान में रहा। 50 वर्ष तक शासन करने के बाद उसकी मृत्यु दक्षिण के अहमदनगर में 3 मार्च सन 1707 ई. में हो गई। दौलताबाद में स्थित फ़कीर बुरुहानुद्दीन की क़ब्र के अहाते में उसे दफना दिया गया। उसकी नीति ने इतने विरोधी पैदा कर दिये, जिस कारण मुग़ल साम्राज्य का अंत ही हो गया।हालाकी औरंगज़ेब खुदको हिंदू स्थान का बादशहा मानता था एवं उसकी दौलत बहोत थी मगर खुदकी कबर के बारे मे उसके खयालात अलग थे उसने खुदकि कबर बहोत ही सिधी बनायी जाए ऐसा लिखा था उसके खबर औरंगाबाद जिल्हा खुलताबाद में स्थित है

स्थापत्य निर्माण

  • औरंगज़ेब ने 167 ई. में लाहौर की बादशाही मस्जिद बनवाई थी।
  • औरंगज़ेब ने 1678 ई. में बीबी का मक़बरा अपनी पत्नी रबिया दुर्रानी की स्मृति में बनवाया था।
  • औरंगज़ेब ने दिल्ली के लाल क़िले में मोती मस्जिद बनवाई थी।

मुग़ल सम्राटों का कालक्रम

सन्दर्भ

  1.  सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; eb नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  2.  “Aurangzeb loved Dahod till the end”. मूल से 15 सितंबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 3 नवंबर 2017.
  3. ↑ इस तक ऊपर जायें:अ         दानियाल, शोएब. “पांच तथ्य जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि औरंगजेब हिंदुओं के लिए सबसे बुरा शासक था”सत्याग्रहमूल से 17 मई 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2018-05-21.
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