भारतीय उपमहाद्वीप का इस्लामी इतिहास

इस्लाम
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प्रवेशद्वार:इस्लाम
 इस्लाम प्रवेशद्वार
देवासं

इस्लाम भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्रमुख मजहब हैं। भारत की कुल जनसंख्या के 14.5%, पाकिस्तान के 97 %, बांग्लादेश के 89%, नेपाल के 6%,भूटान के 1.1% लोग इस्लाम के अनुयायी हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें] उपमहाद्वीप को इस्लाम से सबसे पहले अरबी व्यापरियो ने सातवी शताब्दी के मध्य में अवगत कराया। इस्लाम का व्यापक फैलाव सातवी शताब्दी के अंत में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों के द्वारा हुआ। इस प्रान्त ने विश्व के कुछ महान इस्लामिक साम्राज्यों के उठान एवं पतन को देखा है। सातवी शतब्दी से लेकर सन १८५७ तक विभिन्न इस्लामिक साम्राज्यों ने भारत, पाकिस्तान एवं दुसरे देशों पर गहरा असर छोड़ा है।

इस्लामी शासकों और इस्लामी आक्रमणकारियों के कारण भारतीय महाद्वीप को अनेक प्रकार से क्षति हुई। पूरा भारतीय समाज लगभग १००० वर्ष तक अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता रहा और अन्ततः सफल हुआ। किन्तु १००० वर्षों में भारत धीरे-धीरे पश्चिमी दुनिया की तुलना में ज्ञान-विज्ञान में पिछड़ गया।

आरम्भिक काल

मोहम्मद-बिन-कासिम के राज्य की सीमाएं

इस्लाम के प्रवेश के पहले बोद्ध एवं हिंदू धर्म उपमहाद्वीप के प्रमुख धर्म थे। मध्य एशिया और आज के पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में बोद्ध धर्म शताब्दियों से फल फूल रहा था। खास कर के सिल्क रुट या रेशम मार्ग के किनारे इसका व्यापक फैलाव था।सिन्ध प्रान्त

छठवी शतबदी के प्रारम्भ में सिंध फारस साम्राज्य के आधीन था। सन ६४३ में रशिदुन साम्राज्य ने अपने इस्लामिक राज्य के विस्तार के लिए सात सेनाएं साम्राज्य के सात कोनो में भेजी। इसमे से एक सेना फारस सामराज्य से सिंध प्रान्त के कुछ भाग को जीत कर लौटी। इस्लामिक सेनाएं सबसे पहले खलीफ उमर के नेतृत्व में सन ६४४ में सिंध पहुची. सन ६४४ में ही हाकिम इब्न अम्र, शाहब इब्न मखारक और अब्दुल्लाह इब्न उत्बन की सेन्य टुकडियों ने सिन्धु नदी के पश्चिमी किनारे पर एक युद्ध में सिंध के राज रसील के ऊपर विजय प्राप्त की। खलीफ उमर के शासन में सिन्धु नदी ही रशिदुन साम्राज्य की सीमा बन गई और इस्लामिक साम्राज्य उसके पार नहीं आया। खलीफ उमर की मृत्यु के पश्चात फारस साम्राज्य के अन्य प्रान्तों की तरह सिंध में भी विद्रोह हो गया। नए खलीफ उस्मान ने भी सिंध की दयनीय हालत को देखते हुए सेना को सिन्धु नदी को पार न करने का आदेश दिया। बाद के खलीफ अली ने भी सिंध के अन्दर प्रवेश करने में कोई ख़ास रूचि नहीं दिखाई।[1]बलूचिस्तान प्रान्त

सन ६५४ तक बलूचिस्तान का वह भाग जो की आज के पाकिस्तान में हैं रशिडून साम्राज्य के अन्दर आ गया था। खलीफ अली के समय तक पूरा बलूचिस्तान प्रान्त रशिडून साम्राज्य के आधीन हो चूका था।[2] बाद के सत्ता संगर्ष में बलूचिस्तान में एक साम्राज्य शासन नहीं रहा।

ऐतिहासिक इस्लामी दस्तावेज फतह-नामा-सिंध के अनुसार सन ७११ में दमस्कुस के उम्म्यद खलीफ ने सिंध एवं बलूचिस्तान के लिए दो असफल अभियान भेजे। इन अभियानों का उद्देश्य देय्बुल (आज के कराची के नजदीक) के निकट समुंदरी लुटेरे जो की अरबी व्यपारी जहाजों को लूट लेते थे उन्हें सबक सिखाना था। यह आरोप लगाया गया की सिंध के राजा आधीर इन लुटेरो को शरण दे रहे थे। तीसरे अभियान का नेतृत्व १७ साल के मुहम्मद बिन कासिम के हाथों में था उसने सिंध एवं बलूचिस्तान को जीतते हुए उत्तर में मुल्तान तक आपना राज्य स्थापित किया। सन ७१२ में कासिम की सेना ने आज के हैदराबाद सिंध में राजा दाहिर की सेना के ऊपर विजय प्राप्त की।

कुछ ही सालों में कासिम को बग़दाद वापस भेज दिया गया जिसके बाद इस्लामी साम्राज्य दक्षिण एशिया में सिंध और दक्षिणी पंजाब तक ही सिमित रह गया

अरब मुस्लिमों एवं बाद के मुस्लिम शासकों के सिंध एवं पंजाब में आने से दक्षिण एशिया में राजनेतिक रूप से बहुत बड़ा परिवर्तन आया और जिसने आज के पाकिस्तान एवं उपमहाद्वीप में इस्लामी शासन की नींव रखी।

सन्दर्भ

  1.  तरिख अल खुल्फ़, भाग :१, पृष्ठ १९७
  2.  Fatuh al buldan pg:386

प्रमुख इस्लामिक शासक

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