भारत का सैन्य इतिहास

युद्ध
पर एक श्रृंखला का हिस्सा
इतिहास[छुपाएँ]प्रागैतिहासिकप्राचीनपोस्ट-शास्त्रीयप्रारंभिक आधुनिक वर्तमान औद्योगिकचौथी पीढ़ीभारत का सैन्य इतिहासहथियारों का इतिहास
युद्धक्षेत्र[छुपाएँ]वायुसाइबरजानकारीअंतरिक्षभूमि
ठंडे क्षेत्ररेगिस्तानजंगलपर्वतशहरीसमुद्र
द्विधा गतिवालानीलाभूराहरासतहपानी के नीचे
हथियार[छुपाएँ]बख्तरबंद युद्धतोपख़ानाजैविककैवलरीरासायनिकपरम्परागतसाइबरक्षेत्र-इनकारदुस्सूचनाइलेक्ट्रॉनिकइन्फेंट्रीकानूनन युद्धसंगीतपरमाणुमनोवैज्ञानिकअपरंपरागतहथियार के रूप में शरणार्थियों का प्रयोग
समर-विद्या[छुपाएँ]हवाईलड़ाईघुड़सवार सेनाचार्जजवाबी हमलाजवाबी कार्रवाईआवरणफूट डालनारक्षात्मक (लोमड़ी का बिल)गुरिल्लामनोबलघेराबंदीझुंडसामरिक उद्देश्यलक्ष्य संतृप्तिखाईनिकासी
परिचालन[छुपाएँ]ब्लिट्जक्रेग डीप ऑपरेशनतिकड़म युद्धपरिचालनात्मक तिकड़म समूह
रणनीति[छुपाएँ]संघर्षणजवाबी हमलाअवसर की प्रतीक्षा करनाछलबचावलक्ष्यनौसेनाआक्रमणझुलसी पृथ्वी
भव्य रणनीति[छुपाएँ]घेरनाआर्थिकसीमितविज्ञानदर्शनराजनीतिकधार्मिकसामरिकतकनीकरंगमंच (युद्धकला)सिद्धांतसंपूर्ण युद्ध
संगठन[छुपाएँ]निर्देश व नियंत्रणसिद्धांतअभियान्त्रिकीखुफिया सूचनापदप्रौद्योगिकी और उपकरण
कर्मचारी[छुपाएँ]भर्तीअनिवार्य भर्तीभर्ती प्रशिक्षणसैन्य विशेषज्ञतामहिलाएंबच्चेट्रांसजेंडर लोगयौन उत्पीड़नअंतरात्मिक आपत्तिभर्ती का विरोध
लॉजिस्टिक्स[छुपाएँ]सैन्य-औद्योगिक परिसर शस्त्र उद्योगसाज सामानआपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन
संबंधित[छुपाएँ]असममित युद्धब्रोकन-बैक्ड वार थ्योरीकोर्ट मार्शलशीत युद्धनिरोध सिद्धांतयुद्ध में घोड़ेअनियमित युद्धयुद्ध का नियमभाड़े के सिपाहीसैन्य अभियानसैन्य अभियाननेटवर्क केंद्रित युद्धसंचालन अनुसंधानयुद्ध के सिद्धांतछद्म युद्धसुरक्षा दुविधा ट्रिपवायर बलयुद्ध अपराधयुद्ध पर बनी फ़िल्मेंसैन्य अभ्यासउपन्यासयौन हिंसामहिलाएंविश्व युद्धऔपनिवेशिक युद्धस्थानिक युद्धलैंचेस्टर के विचार
सूचियाँ[छुपाएँ]लड़ाईसैन्य कब्जेसैन्य रणनीतिसंचालनघेराबंदीयुद्ध अपराधयुद्धोंहथियार, शस्त्रलेखक
देवासं

भरतीय योद्धा का चित्रण: गान्धर्व कला, प्रथम शताब्दीयुद्ध के लिये प्रस्थान करते हुए रामचन्द्र

भारत के इतिहास में ‘सेना‘ का उल्लेख वेदोंरामायण तथा महाभारत में मिलता है। महाभारत में सर्वप्रथम सेना की इकाई ‘अक्षौहिणी’ उल्लिखित है। प्रत्येक ‘अक्षौहिणी’ सेना में पैदल, घुडसवार, हाथी, रथ आदि की संख्या निश्चित होती थी।

अनुक्रम

प्राचीन काल में भारतीय सैन्य व्यवस्था

प्राचीन काल से ही भारत में सुप्रशिक्षित, सुसंगठित तथा युद्ध कला में निपुण सेना थी। इसके उल्लेख महाकाव्योंअर्थशास्त्रशुक्रनीति, जैन व बौद्ध ग्रंथों, यूनानी ग्रंथों, अभिलेखों जैसे, हाथी गुम्फा अभिलेखरूद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख, इत्यादि में मिलते हैं।

वैदिक काल में सेना के तीन अंग होते थे- पदाति (पैदल), रथ एवं अश्व। महाकाव्य काल में और मौर्य काल में चतुरंगिणी सेना का आरम्भिक तथा विकसित रूप देखने को मिलता है। गुप्तकाल तक आते-आते राज्य की संगठित सेना का स्थान सामन्ती सेना ने ले लिया। परन्तु सेना का संगठन प्रायः मौर्यकालीन ही रहा। केवल पदों के नामों में परिवर्तन आया। रथ सेना गुप्तकाल में भी सेना का एक महत्त्वपूर्ण अंग थी। अश्व सेना भी युद्ध में महत्त्वपूर्ण योगदान देती थी परन्तु सीथियन लोगों की सजग एवं चपल अश्व सेना का प्रभाव कम दिखाई देता है। हस्ति सेना का प्रयोग भी गुप्तकाल एवं गुप्तोत्तर काल में होता था। ह्वेनसांग ने भी इसका प्रमाण दिया हैं।

मध्यकाल में भारतीय सैन्य व्यवस्था

आरम्भिक मध्यकाल में सैन्य प्रणाली प्राचीन पद्धति पर ही संगठित थी। तुर्कों के आक्रमण के समय भारतीय सेना की कमजोरी एवं पिछड़ापन स्पष्ट दिखाई दिया। भारतीयों की अपेक्षा तुर्कों के पास श्रेष्ठ घुड़सवार सेना, कुशल व योजनाबद्ध युद्ध-कला, श्रेष्ठ हथियार तथा आयुध सामग्री, साथ ही सैनिकों में लड़ने की उच्चतर प्रवृति, आदि उत्कृष्ट पक्ष सिद्ध हुए।

सल्तनत काल में सेना इक्तेदारी प्रथा पर संगठित हुई। सेना के दो विभाग थे- ‘आरिज़-ए-ममालिक’ और ‘नायब आरिज़-ए-ममालिक’। बलबन ने सर्वप्रथम इन विभागों की स्थापना की। अलाउद्दीन की केन्द्रीकरण की प्रवृति के कारण यह विभाग ज्यादा महत्त्वपूर्ण रहे। आधुनिक सैन्य विभाग की तरह सेवा नामावली, टुकड़ियों का चयन, प्रशिक्षण, अनुशासन, पदोन्नति, आपूर्ति संग्रह, युद्ध के विनाश का संग्रह, घोड़ों की नस्लों की सूचना, हाथियों का प्रबन्ध तथा सामान्य प्रबन्ध, शासन के कर्तव्य इत्यादि कार्य ये विभाग करते थे। सेना दशमलव प्रणाली के आधार पर विभाजित थी। सल्तनत काल की सेना चार टुकड़ियों में विभाजित थी- नियमित व स्थायी सेना, प्रान्तीय सेना, विशेष सैनिक टुकड़ी तथा स्वयंसेवी अथवा स्वैच्छिक सैनिक टुकड़ी ।

मध्यकाल में मुगल सेना सबसे बड़ी सेना थी जो वास्तव में मनसबदारों की सेना थी। सैनिकों की भर्ती, नियुक्ति, वेतन सम्बन्धी, सुरक्षा सम्बन्धी हुलिया लिखना, अनुपस्थिति, युद्ध पद्धति का चयन, रणनीति की तैयारी, सेना का विभाजन, नियुक्ति नेतृत्व चयन, इत्यादि कार्य मीर बक्शी करता था। मुगल सेना एकल संगठनात्मक नहीं थी। सामन्त या मनसबदार अपनी-अपनी सैन्य टुकड़ियों के साथ लड़ते थे जिनके सैनिक अपने मनसबदार के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा वफादार थे।

आधुनिक काल में भारतीय सैन्य व्यवस्था

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आरम्भिक दिनों में ही एक ऐसी प्रतिभावान सेना अस्तित्व में आ गई थी जो भारत की खैबर दर्रे से कन्याकुमारी तक सुरक्षा करती थी। प्रारम्भ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी केवल एक व्यापारिक कम्पनी थी परन्तु भारतीय शासकों की कमजोरी का लाभ उठा कर यह शासक बन गई। 1693 ई. में कम्पनी की सेना में प्रथम बार ब्रिटिश के अलावा देशी सैनिकों की भर्ती की गई। क्लाइव के अर्काट व प्लासी के युद्धों में सफलता में भारतीय सैनिक (मद्रासी, बंगाली, मराठा, राजपूत, आदि) भी बराबर के हकदार थे।

सेना का संगठन तीनों प्रेसिडेन्सियों (कलकतामुम्बई और मद्रास) में किया गया था जिसमें 1770 ई. में 7000 यूरोपीय तथा 30,000 भारतीय सैनिक थे। 1857 ई. में ब्रिटिश सेना में 38,000 यूरोपीय 276 युद्ध राइफल समेत तथा 348,000 देशी टुकडियाँ 248 राइफलों के साथ सम्मिलित थीं। परन्तु इसके बाद ब्रिटिश सैन्य नीति में परिवर्तन आया और सेना में ब्रिटिश या यूरोपीय एवं देशी सैनिकों का अनुपात बंगाल में 2:1, और मद्रास व बम्बई में 3:1 का हो गया।

1889 ई. में इम्पीरियल सर्विस ट्रूप्स की वृद्धि हुई जिसमें विभिन्न 25 देशी राज्यों से लगभग 25,000 घुड़सवार, पैदल, ट्रांसपोर्ट सैनिकों की भर्ती हुई। ये सैनिक विदेशी अधिकारियों द्वारा प्रशिक्षित किए गए थे। इन पलटनों ने देशी राजाओं के अधीन हजारागिलगित, होजा, नायर, चित्राल, तिराह, आदि जगहों पर अच्छी सेवाएं प्रदान की। इन इम्पीरियल सर्विस ट्रूप्स के अतिरिक्त देशी राज्यों में ब्रिटिश सरकार के साथ की गई सन्धियों की पालना, राज-समारोह, पुलिस वर्ग तथा अन्य सेवाओं के लिए देशी राज्यों की नियमित व अनियमित ‘पलटन’ की भर्ती की गई। नियमित पलटन को प्रशिक्षण व हथियार भी बेहतर दिये जाते थे। हालांकि भारत में देशी राज्य पश्चिमी रणनीति तथा पश्चिमी युद्ध पद्धति अपनाने लग गए थे। यद्यपि इन्होंने सेना के प्रशिक्षण के लिए विदेशियों की नियुक्ति की, परन्तु इन प्रशिक्षकों की कुशलता अच्छी नहीं थी। अंग्रेज अधिकारी उन्हें अनुशासन, अभ्यास और शस्त्रों का प्रयोग करना सिखाते थे। परन्तु उन्हें अंग्रेजी रणनीति और युद्ध पद्धति नहीं सिखाया जाता था। अतः भारतीय अंग्रेजी युद्ध कला से अनभिज्ञ ही बने रहे। भारतीय सेना की सबसे बड़ी कमजोरी उनको आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की जानकारी न होना था। इसलिए उनके हथियार सम्यक रूप से उन्नत एवं समयानुकूल नहीं थे।

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ

श्रेणी

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *