भारत के महाराज्यपाल

महाराज्यपाल का ध्वज (१८८५-१९४७) जिसमें ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया एक संघीय ध्वज में एक भारतीय शाही मुकुट के नीचे दर्शित

भारत के महाराज्यपाल या गवर्नर-जनरल (१८५८-१९४७ तक वाइसरॉय एवं गवर्नर-जनरल अर्थात राजप्रतिनिधि एवं महाराज्यपालभारत में ब्रिटिश राज का अध्यक्ष और भारतीय स्वतंत्रता उपरांत भारत में, ब्रिटिश सम्प्रभु का प्रतिनिधि होता था। इनका कार्यालय सन 1773 में बनाया गया था, जिसे फोर्ट विलियम की प्रेसीडेंसी का गवर्नर-जनरल के अधीन रखा गया था। इस कार्यालय का फोर्ट विलियम पर सीधा नियंत्रण था, एवं अन्य ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों का पर्यवेक्षण करता था। सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत पर पूर्ण अधिकार 1833 में दिये गये और तब से यह भारत के गवर्नर-जनरल बन गये।

१८५८ में भारत ब्रिटिश शासन की अधीन आ गया था। गवर्नर-जनरल की उपाधि उसके भारतीय ब्रिटिश प्रांत (पंजाब, बंगाल, बंबई, मद्रास, संयुक्त प्रांत, इत्यादि) और ब्रिटिष भारत, शब्द स्वतंत्रता पूर्व काल के अविभाजित भारत के इन्हीं ब्रिटिश नियंत्रण के प्रांतों के लिये प्रयोग होता है।

अनुक्रम1इतिहास2गवर्नर-जनरल के प्रकार्य3परिषद4शैली एवं उपाधि5ध्वज6आवास7गवर्नर-जनरल की सूची7.1फोर्ट विलियम प्रेसीडेंसी7.2भारत के गवर्नर-जनरल7.3भारत के वाइसरॉय एवं गवर्नर-जनरल7.4भारत के गवर्नर-जनरल7.5पाकिस्तान के गवर्नर-जनरल8अधिचिह्न9इन्हें भी देखें10सन्दर्भ

वैसे अधिकांश ब्रिटिश भारत, ब्रिटिश सरकार द्वारा सीधे शासित ना होकर, उसके अधीन रहे शासकों द्वारा ही शासित होता था। भारत में सामंतों और रजवाड़ों को गवर्नर-जनरल के ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि होने की भूमिका को दर्शित करने हेतु, सन १८५८ से वाइसरॉय एवं गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया (जिसे लघुरूप में वाइसरॉय कहा जाता था) प्रयोग हुई। वाइसरॊय उपाधि १९४७ में स्वतंत्रता उपरांत लुप्त हो गयी, लेकिन गवर्नर-जनरल का कार्यालय सन १९५० में, भारतीय गणतंत्रता तक अस्तित्व में रहा।

१८५८ तक, गवर्नर-जनरल को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों द्वारा चयनित किया जाता था और वह उन्हीं को जवाबदेह होता था। बाद में वह महाराजा द्वारा ब्रिटिश सरकार, भारत राज्य सचिव, ब्रिटिश कैबिनेट; इन सभी की राय से चयन होने लगा। १९४७ के बाद, सम्राट ने उसकी नियुक्ति जारी रखी, लेकिन भारतीय मंत्रियों की राय से, ना कि ब्रिटिश मंत्रियों की सलाह से।

गवर्नर-जनरल पांच वर्ष के कार्यकाल के लिये होता था। उसे पहले भी हटाया जा सकता था। इस काल के पूर्ण होने पर, एक अस्थायी गवर्नर-जनरल बनाया जाता था। जब तक कि नया गवर्नर-जनरल पदभार ग्रहण ना कर ले। अस्थायी गवर्नर-जनरल को प्रायः प्रान्तीय गवर्नरों में से चुना जाता था।

इतिहास

वार्रन हास्टिंग्स

वार्रन हास्टिंग्स, भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल फोर्ट विलियम के( 1774-1785) भारत के कई भागों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था, जो नाममात्र को मुगल बादशाह के प्रतिनिधि के तौर पर राज करती थी। १७७३ में, कंपनी में भ्रष्टाचार के चलते, ब्रिटिश सरकार ने, रेगुलेशन एक्ट अधिनियम के तहत, भारत का प्रशासन आंशिक रूप से अपने नियंत्रण में ले लिया था। बंगाल में फोर्ट विलियम की प्रेसेडेंसी के शासन हेतु एक गवर्नर-जनरल, तथा एक परिषद का गठन किया गया। प्रथम गवर्नर-जनरल एवं परिषद का नाम अधिनियम में लिखित है। उनके उत्तराधिकारी ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों द्वारा चयनित होना तय हुआ था। इस अधिनियक्म के अनुसार गवर्नर-जनरल तथा परिषद का पांच वर्षीय कार्यकाल निश्चित किया गया था। परंतु शासन को उन्हें मध्यावधि में हटाने का पूर्णाधिकार था।

१८३३ के चार्टर एक्ट अधिनियम ने फोर्ट विलियम के गवर्नर-जनरल एवं परिषद को बदल कर भारत का गवर्नर-जनरल एवं परिषद बना दिया। लेकिन उन्हें चयन करने की सामर्थ्य निदेशकों को ही रखी, केवल उसको शासन के अनुमोदन का विषय बना दिया।

१८५७ के संग्राम के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी समाप्त कर दी गयी और भारत ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। गवर्न्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट १८५८ अधिनियम के द्वारा, गवर्नर-जनरल को नियुक्त करने का धिकार दिया गया। भारत और पाकिस्तान को १९४७ में स्वतंत्रता मिली, परन्तु गवर्नर-जनरल फिर भी जारी रहे, जब तक कि दोनों देशों के संविधान नहीं बन गये। माउंटबैटन कुछ समय भारत का गवर्नर-जनरल बना रहा। लेकिन दोनों देशों के अपने गवर्नर-जनरल बने। बाद में भारत १९५० में धर्म-निरपेक्ष गणतंत्र बना और १९५६ में पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य बना।

गवर्नर-जनरल के प्रकार्य

लॉर्ड कर्जन, भारत के वाइसरॉय की वेशभूषा में, जो पद १८९९-१९०५ तक चला

गवर्नर-जनरल को पहले पहल, केवल बंगाल प्रेसीडेंसी पर ही अधिकार था। रेगुलेटिंग अधिनियम द्वारा, उन्हें विदेश संबंध एवं रक्षा संबंधी कई अतिरिक्त अधिकार दिये गये। ईस्ट इंडिया कंपनी की अन्य प्रेसीडेंसियों जैसे मद्रास प्रेसीडेंसीबंबई प्रेसीडेंसी, एवं बेंगकुलु प्रेसीडेंसी (बैनकूलन) को, बिना फोर्ट विलियम के गवर्नर-जनरल एवं परिषद की अग्रिम अनुमोदन के; ना तो कोई युद्ध की घोषणा के अधिकार थे, ना ही किसी भारतीय रजवाड़ॊं से शांति संबंध बनाने के अधिकार दिये गये थे।

गवर्नर-जनरल की विदेश मामलों के अधिकार इंडिया एक्ट १७८४ के द्वारा बढ़ाये गये। इस अधिनियम के तहत, कंपनी के अन्य गवर्नर नातो कोई युद्ध घोषित कर सकते थे, ना ही शांति प्रक्रिया, ना ही कोई संधि प्रस्ताव या अनुमति किसी भी भारतीय राजाओं से, जब तक कि गवर्नर-जनरल या कम्पनी के निदेशकों से अनुमति या आदेश ना मिला हो।

हालांकि गवर्नर-जनरल विदेश नीतियों का संचालक बन गया, परन्तु वह भारत का पूर्ण अध्यक्ष नहीं था। यह स्थिति केवल चार्टर एक्ट १८३३ के तहत आयी, जिसने उसे पूरे ब्रिटिश भारत पर नागरिक एवं सैन्य शासन के पूर्ण अधीक्षण, निर्देशन, एवं नियंत्रण के अधिकार दिये। इस अधिनियम से उसे वैधानिक अधिकार भी मिले।लॉर्ड डफरिन, भारत के वाइसरॉय।

१८५८ उपरांत, गवर्नर-जनरल भारत का मुख्य प्रशासक और ब्रिटिश शासन का प्रतिनिधि बन गया। भारत को कई प्रांतों में बांटा गया, प्रत्येक के एक गवर्नर या प्रशासक नियुक्त हुए। गवर्नर ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त हुए थे, जिनके वे सीधे जवाबदेही थे। लेफ्टिनेंट गवर्नर, चीफ कमिश्नर (मुख्य आयुक्त) एवं प्रशासक (एदमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त हुए, जो कि गवर्नर के अधीन कार्यरत थे।लॉर्ड मैटकाफ, भारत के वाइसरॉय।

गवर्नर-जनरल सबसे शक्तिशाली राज्य भी स्वयं देखता था, जैसे:-हैदराबाद के निजाममैसूर के महाराजा, ग्वालियर के सिंधिया महाराजा, बड़ौदा के गायक्वाड महाराजा, जम्मू एवं कश्मीर के महाराजा, इत्यादि। शेशः रजवाड़े या तो राजपूताना एजेंसी]] एवं सेंट्रल इंडिया एजेंसी देखती थी (जो कि गवर्नर-जनरल के प्रतिनिधि की अध्यक्षता में होता था), या प्रान्तीय शासन।

एक बार भारत के स्वतंत्रता प्राप्त करने के उपरांत, भारतीय मंत्रीमण्डल (कैबिनेट) के दिन पर दिन अधिकार प्राप्त करते रहने पर, गवर्नर-जनरल की भूमिका केवल औपचारिक रह गयी थी। राष्ट्र के गणतंत्र बनने पर, गैर-कर्यपालक भारत के राष्ट्रपति ने वही प्रकार्य जारी रखे।

परिषद

गवर्नर-जनरल को अपने वैधानिक एवं कार्यपालक अधिकारों के प्रयोग हेतु, सर्वदा ही परिषद की सलाह मिली। गवर्नर-जनरल को, कईप्रकार्यों के दौरान, गवर्नर-जनरल इन कॉन्सिल कहा जाता था।विलियम डैनिसन, भारत के वाइसरॉय।

  • रेगुलेटिंग एक्ट १७७३ अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के निदेशकों को चुनावों द्वारा, चार सलाहकार नियुक्त कराये। गवर्नर-जनरल के पास इन सलाहकारों सहित, एक मत (वोट) का अधिकार था, जिसके साथ ही उसे समान मत संख्या की स्थिति में उठे विवाद को सुलझाने हेतु, एक अतिरिक्त मत दिया गया था। परिषद का निर्णय गवर्नर-जनरल को मान्य होना था।
  • १७८४ में, परिषद को तीन सदस्य तक सीमित कर दिया गया, जबकि गवर्नर-जनरल के पास अभी भी दो वोट थे। १७८६ में, गवर्नर-जनरल के अधिकार और बढ़ाये गये, औइर परिषद के निर्णय अब उसके लिये बाध्य नहीं थे।
  • चार्टर एक्ट १८३३ से परिषद के ढांचे में और बदलाव आये। यह प्रथम अधिनियम था, जिसके तहत गवर्नर-जनरल की कार्यपलक एवं वैधानिक उत्तरदायित्वों में अन्तर बताया गया। इसके तहत परिषद में चार सदस्य होने चाहिये थे, जो कि निदेशकगण चुनते थे। प्रथम तीन सदस्य प्रत्येक अवसर पर भाग लेते थे, परन्तु चौथे सदस्य को केवल विधान के बहस के दौरान ही बैठने की अनुमति थी।
  • १८५८ में निदेशकगण के अधिकार घटा दिये गये। उनका परिषद के सदस्य चुनने का अधिकार बंद हो गय। इसके स्थान पर, चौथे सदस्य, जिसे केवल वैधानिक बैठक में मत देने का अधिकार था, उसे शासक ही चुनते थे और अन्य तीन सदस्य भारत के राज्य सचिव चुनते थे।

विलियम डैनिसन, भारत के वाइसरॉय।

  • इंडियन काउंसिल एक्ट १८६१ अधिनियम द्वारा परिषद के संयोजन में कई बदलाव किये गये। तीन सदस्य भारत के राज्य सचिव द्वारा नियुक्त होना तय हुआ और दो सदस्य मुख्य शासक द्वारा (१८६९ में पांचों सदस्यों के चुनाव का अधिकार ब्रिटिश सम्राट के पास चला गया)। गवर्नर-जनरल को अतिरिक्त छः से बारह सदस्य (१८९२ में छः से दर हुए और १९०९ में दस से बारह)। भारतीय सचिव द्वारा चुने गये पांच लोग कार्यपालक विभाग के मुख्य होते थे, जबकि गवर्नर-जनरल द्वारा चयनित सदस्य बहस में और विधान में मत देने का कार्य करते थे।
  • १९१९ में, राज्य परिषद एवं वैधानिक सभा के संयोजन से बना भारतीय विधान अस्तित्व में आया, जिसने गवर्नर-जनरल की परिषद के वैधानिक प्रकार्यों का कार्य संभाला। गवर्नर-जनरल को विधान के ऊपर महत्वपूर्ण अधिकार था। वह विधान की सहमति के बिना भी आर्थिक व्यय को अधिकृत कर सकता था। यह केवल भूमि (राजनैतिक), रक्षा आदि उद्देश्यों हेतु, एवं आपातकाल में सभी निर्णयों में, सीमित था। यदि उसने संस्तुति की है, लेकिन केवल एक ही चैम्बर ने कोई बिल पास किया है, तो भी वह दूसरे चैमब्र के आपत्ति करने पर भी उस बिल को अध्यादेश बना कर जारी कर सकता था। विधान को विदेश मामलों एवं रक्षा में कोई अधिकार नहीं था। राज्य परिषद का अध्यक्ष, गवर्नर-जनरल द्वारा नियुक्त किया जाता था। विधान सभा अपना अध्यक्ष चुनती थी, लेकिन इसका चुनाव, गवर्नर-जनरल की सहमति से ही होता था।

शैली एवं उपाधि

लॉर्ड हार्डिंग, भारत के वाइसरॉय।

गवर्नर-जनरल (जब वे वाइसरॉय थे १८५८ से १९४७ तक के समय समेत) एक्सीलेंसी की शैली प्रयोग किया करते थे, एवं भारत में, अन्य सभी सरकारी अधिकारियों पर वर्चस्व रखते थे। उन्हें योर एक्सीलेंसी से सम्बोधित किया जाता था, तथा उनके लिये हिज़ एक्सीलेंसी प्रयोग किया जाता था। १८५८-१९४७ के काल में, गवर्नर-जनरल को फ्रेंच भाषा से रॉय यानि राजा और वाइस अंग्रेज़ी से, यानि उप, मिलाकर वाइसरॉय कहा जाता था। यह उपाधी सर्वप्रथम रानी विक्टोरिया ने विस्कस कैनिंग के नियुक्ति के समय की थी।[1] इनकी पत्नियों को वाइसराइन कहा जाता था। उनके लिये हर एक्सीलेंसी, एवं उन्हें योर एक्सीलेंसी कहकर सम्बोधित किया जाता था। परन्तु ब्रिटेन के महाराजा के भारत में होने पर, यह उपाधियां प्रयोग नहीं होती थीं। [2]

सन १८६१ में, जब ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया, वाइसरॉय को ग्रैंड मास्टर एक्स ऑफीशियो (पदेन या पदानुसार) घोषित किया गया। गवर्नर-जनरल को १८७७ में, पदेन ग्रैंड मास्टर ऑफ ऑर्डर ऑफ इंडियन एम्पायर भी घोषित किया गया। [3]

अधिकांश गवर्नर-जनरल एवं वाइसरॉय पीयर थे। जो नहीं थे, उनमें सर जॉन शोर बैरोनत, एवं कॉर्ड विलियम बैंटिक लॉर्ड थे, क्योंकि वे एक ड्यूक के पुत्र थे। केवल प्रथम और अंतिम गवर्नर-जनरल वार्रन हास्टिंग्स तथा चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य और कुछ अस्थायी गवर्नर-जनरल, को कोई विशेष उपाधि नहीं थी।

ध्वज

ब्रिटिश राज का ध्वज, जिस पर स्टार ऑफ इंडिया अंकित है।

१८८५ के लगभग, गवर्नर-जनरल को संघीय ध्वज फहराने की अनुमति दे दी गयी जिसमें बीच में स्टार ऑफ इंडिया के ऊपर एक मुकुट लगा हुआ था। यह ध्वज, गवर्नर-जनरल का निजी ध्वज नहीं था, यह गवर्नर, लेफ्टिनेंट गवर्नर, चीफ कमिश्नर (मुख्य आयुक्त) एवं भारत में अन्य ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भी प्रयोग किया जाता था। समुद्री यात्रा के दौरान, केवल गवर्नर-जनरल ही इस ध्वज कि मुख्य ध्वज स्तंभ पर फहराता था, अन्य उसे गौण स्तंभों से ही फहराते थे।

१९४७ से १९५० तक, भारत के गवर्नर-जनरल, एक शाही ढाल (एक मुकुट पर सिंह आसीन) सहित एक नीला ध्वज प्रयोग किया करते थे। इस चिन्ह के नीचे शब्द “भारत” सुनहरे अक्षरों में अंकित होता था। यही नमूना कई अन्य गवर्नर-जनरल द्वारा भी प्रयोग किया गया। यह किसी गवर्नर-जनरल का अंतिम निजी ध्वज था।

आवास

पूरी उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान गवर्न्मेंट हाउस ही गवर्नर-जनरल का सरकारी आवास हुआ करता था।

फोर्ट विलियम के गवर्नर-जनरल बैल्वेडेर हाउस, कलकत्ता में आरम्भिक उन्नीसवीं शताब्दी तक रहा करते थे। फिर गवर्न्मेंट हाउस का निर्माण हुआ। १८५४ में, बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने वहां अपना आवास बनाया। अब बेलवेडेर हाउस में भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय है।लॉर्ड कैन्निंग

लॉर्ड वैलेस्ली, जिन्होंने कहा था, कि भारत को एक महल से शासित होना चाहिये, ना कि एक डाक बंगले से; ने एक एक वृहत हवेली बनवायी, जिसे गवर्न्मेंट हाउस कहा गया। यह १७९९-१८०३ के बीच निर्मित हुआ। यह हवेली सन १९१२ तक प्रयोग में रही, जब तक की राजधानी कलकत्ता में रही। फिर राजधानी दिल्ली स्थानांतरित की गयी। तब बंगाल के लेफ्टि. गवर्नर को गवर्नर का पूर्णाधिकार दिया गया और गवर्न्मेंट हाउस में आवास दिया गया। अब यही भवन, वर्तमान पश्चिम बंगाल का राज्यपाल आवास है। इसे अब इसी नाम के हिन्दी रूपान्तर, राज भवन कहा जाता है।१८५४ में, बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने गवर्न्मेंट हाउस में, अपना आवास बनाया। अब बेलवेडेर हाउस में भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय है।

जब राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया गया, वाइसरॉय ने नव-निर्मित सर एड्विन लूट्यन्स द्वारा अभिकल्पित, वाइसरॉय हाउस में आवास किया। हालांकि निर्मान १९१२ में आरम्भ हुआ, परन्तु वह १९२९ तक भी पूर्ण ना हो सका; और १९३१ तक भी उसका औपचारिक उद्घाटन नहीं सम्पन्न हो पाया। इसाखी अंतिम लागत पाउण्ड ८,७७,००० (आज के अनुसार साढ़े तीन करोड़ पाउण्ड) थी। वर्तमान में, यह आवास, अपने वर्तमान हिन्दी नाम “राष्ट्रपति भवन” से प्रसिद्ध है।

पूरे ब्रिटिश प्रशासन के दौरान, गवर्नर-जनरल शिमला स्थित वाइसरीगल लॉज (देखें “राष्ट्रपति निवास”) में ग्रीष्म ऋतु बिताते थे। पूरी सरकार ग्रीष ऋतु की गर्मी से बचने हेतु, हर वर्ष शिमला जाते थे।

गवर्नर-जनरल की सूची

फोर्ट विलियम प्रेसीडेंसी

यहां के गवर्नर-जनरल की सूची, 1774 – 1833लॉर्ड राइपन

गवर्नर-जनरल

भारत के गवर्नर-जनरल

1833–1858वेवल, भारत के गवर्नर जनरल

भारत के वाइसरॉय एवं गवर्नर-जनरल

1858–1947

भारत के गवर्नर-जनरल

1947–1950

पाकिस्तान के गवर्नर-जनरल

1947–1958मुख्य लेख: पाकिस्तान के गवर्नर जनरल

अधिचिह्न]

इन्हें भी देखें: ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया

  • महाराज्यपाल क बिल्ला (१८८५–१९४७)
  • महाराज्यपाल का ध्वज (१८८५–१९४७)
  • महाराज्यपाल का ध्वज (१९४७–१९५०)

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

  1.  “रानी विक्टोरिया की घोषणा”. मूल से 28 सितंबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 19 मार्च 2018.
  2.  Arnold P. Kaminsky, The India Office, 1880–1910 (Greenwood Press, 1986), p. 126.
  3.  H. Verney Lovett, “The Indian Governments, 1858–1918”, The Cambridge History of the British Empire, Volume V: The Indian Empire, 1858–1918 (Cambridge University Press, 1932), p. 226.
[छुपाएँ]देवासं       भारत के गवर्नर जनरल       
फोर्ट विलियम प्रेसीडेंसी
के गवर्नर-जनरल

(1774–1833)
वार्रन हास्टिंग्स · लॉर्ड कॉर्नवालिस · सर जॉन शोर · सर एल्यूरेड क्लार्क · लॉर्ड वैलेस्ली · लॉर्ड कॉर्नवालिस · सर जॉर्ज हिलेरियो बार्लो · लॉर्ड मिंटो · फ्रांसिस रॉडन हास्टिंग्स · जॉन · लॉर्ड एम्हर्स्ट · विलियम बटर्वर्थ बेले · लॉर्ड बैन्टिक
भारत के गवर्नर-जनरल
(1833–1858)
लॉर्ड विलियम बैन्टिक · सर चार्ल्स मैटकाफ · लॉर्ड ऑकलैंड · लॉर्ड ऐलनबरो · विलियम विबरफोर्स बर्ड · सर हैनरी हार्डिंग · लॉर्ड डलहौज़ी · लॉर्ड कैनिंग
भारत के वाइसरॉय
एवं गवर्नर-जनरल

(1858–1947)
लॉर्ड कैनिंग · जेम्स ब्रूस · सर रॉबर्ट नैपियर · सर विलियम डैनिसन · सर जॉन लॉरेंस · लॉर्ड मेयो · सर जॉन स्ट्रैचे · लॉर्ड नैपियर · लॉर्ड नॉर्थब्रूक · लॉर्ड लिट्टन · लॉर्ड राइपन · लॉर्ड डफरिन · लॉर्ड लैंस्डाउन · विक्टर ब्रूस · लॉर्ड कर्जन · लॉर्ड ऐम्प्थिल · लॉर्ड मिंटो · लॉर्ड हार्डिंग · लॉर्ड चेम्स्फोर्ड · लॉर्ड रीडिंग · लॉर्ड इर्विन · लॉर्ड विलिंग्डन · विक्टर होप · वेवैल · लॉर्ड माउंटबैटन
स्वतंत्र भारत के
(1947–1950)
माउंटबैटन • चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
पाकिस्तान के
(1947–1958)
मोहम्मद अली जिन्नाह • ख्वाजा नजीमुद्दीन • गुलाम मोहम्मद • इस्कंदर मिर्जा
इन्हें भी देखेंब्रिटिश साम्राज्य • भारत के सम्राट • गवर्नर जनरल • पाकिस्तान के गवर्नर जनरल • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन • भारत के राष्ट्रपति • पाकिस्तान के राष्ट्रपति • वाइसरॉय • ब्रिटिश राज • भारत के राज्य सचिव •
भारतीय सिविल सेवाएं • भारत का विभाजन • बांग्लादेश का इतिहास • भारत का इतिहास • पाकिस्तान का इतिहास
[छुपाएँ]देवासंभारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन
इतिहासउपनिवेशपोर्टो ग्रांडे दे बंगालडच बंगालईस्ट इण्डिया कम्पनीब्रिटिश राजफ्रांसीसी भारतपुर्तगाली भारतप्लासी का युद्धबक्सर का युद्धआंग्ल-मैसूर युद्ध पहलादूसरातीसराचौथाआंग्ल-मराठा युद्ध पहलादूसरातीसरापॉलीगर का युद्धवेल्लोर विद्रोहप्रथम आंग्ल-सिख युद्धद्वितीय आंग्ल-सिख युद्धसन्यासी विद्रोह1857 की क्रांतिरैडक्लिफ़ रेखाऔर
दर्शनशास्र
और विचारधारा
भारतीय राष्ट्रवादहिंदू राष्ट्रवादआंबेडकरवादगांधीवादखिलाफत आन्दोलनभारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादसत्याग्रहसमाजवादस्वदेशी आन्दोलनस्वराज
घटनाक्रम और
आंदोलन
बंगाल का विभाजन (1905)बंगाल का विभाजन (1947)क्रांतिकारी आन्दोलनकलकत्ता दंगादिल्ली-लाहौर षडयंत्रद इंडियन सोसियोलोजिस्टसिंगापुर विद्रोहहिंदु-जर्मन षडयंत्रचम्पारण सत्याग्रहखेड़ा सत्याग्रहरॉलेट कमेटीरॉलेट एक्टजालियाँवाला बाग हत्याकांडनोआखाली नरसंहारअसहयोग आन्दोलनक्रिसमस दिवस षडयंत्रकुली-बेगार आन्दोलनचौरीचौरा काण्ड, 1922काकोरी काण्डकिस्सा-ख्वानी बाजार नरसंहारझण्डा सत्याग्रहबारडोली सत्याग्रहसाइमन कमीशननेहरु रिपोर्टजिन्ना के चौदह तर्कपूर्ण स्वराजदांडी मार्चधारासना सत्याग्रहवेदारायणम मार्चचटगांव शस्त्रागार कांडगांधी-इरविन समझौतागोलमेज सम्मेलन1935 का अधिनियमऔंध प्रयोगहिन्द सेनाक्रिप्स मिशनभारत छोड़ोबॉम्बे विद्रोहयानौन का विद्रोहभारत की अंतःकालीन सरकारस्वतंत्रता दिवसप्रजामंडल आन्दोलन
संस्थायेंअखिल भारतीय किसान सभाअखिल भारतीय मुस्लिम लीगअनुशीलन समितिआर्यसमाजआज़ाद हिन्दबर्लिन समितिग़दर पार्टीहिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशनभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इण्डिया हाउसहोम रूल आन्दोलनभारतीय स्वतंत्रता लीगआज़ाद हिन्द फ़ौजयुगान्तरखाकसार आंदोलनलाल कुर्ती आन्दोलनस्वराज पार्टीऔर देखे
समाज
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ए वैद्यनाथ अय्यरअय्या वैकुंदरअय्यंकलीबी आर अम्बेडकरबाबा आमटेबाल गंगाधर तिलकदयानंद सरस्वतीधोंडो केशव कर्वेजी. सुब्रमण्य अय्यरगाज़ुलू लक्ष्मीनरसू चेट्टीगोपाल गणेश आगरकरगोपाल हरि देशमुखगोपालदास अंबादास देसाईईश्वर चंद्र विद्यासागरजे॰ बी॰ कृपलानीज्योतिराव फुलेकंदुकूरि वीरेशलिंगम्महादेव गोविंद रानडेमहात्मा गांधीमुत्तुलक्ष्मी रेड्डीनारायण गुरुनिरालम्ब स्वामीपंडिता रमाबाईपेरियार ई वी रामसामीराम मोहन रायआर. श्रीनिवासनसहजानंद सरस्वतीसावित्रीबाई फुलेशाहूभगिनी निवेदिताअरविन्द घोषसैयद अहमद खानवक्कम मौलवीविनायक दामोदर सावरकरविनोबा भावेविट्ठल रामजी शिंदेविवेकानंद
स्वतंत्रता
सेनानी
अबुल कलाम आजादअक्कम्मा चेरियनअच्युत पटवर्धनए.के. फजलुल हकअल्लूरी सीताराम राजूअन्नपूर्णा महाराणाएनी बेसेंटअशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँबाबू कुंवर सिंहबाघा यतीनबहादुर शाह द्वितीयबख़्त खानबाल गंगाधर तिलकबसावन सिंहबेगम हजरत महलभगत सिंहभारतीदासनभवभूषण मित्रभीखाजी कामाभूपेन्द्र कुमार दत्तबिधान चंद्र रॉयविपिनचंद्र पालसी. राजगोपालचारीचंद्रशेखर आजादचितरंजन दासदादाभाई नौरोजीदयानंद सरस्वतीधन सिंह गुर्जरगोपाल कृष्ण गोखलेगोविंद बल्लभ पंतलाला हरदयालहेमू कालाणीइनायतुल्ला खान माश़रिकीयतीन्द्र मोहन सेनगुप्तयतीन्द्रनाथ दासजवाहर लाल नेहरूके. कामराजकन्हैयालाल माणिकलाल मुंशीकर्तार सिंह सराभाख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ानखुदीराम बोसश्री कृष्ण सिंहलाला लाजपत रायएम. भक्तवत्सलमएम एन रायमहादजी शिंदेमहात्मा गांधीमदनमोहन मालवीयमंगल पांडेमीर कासिममिथुबेन पेटिटमुहम्मद अली जौहरमुहम्मद अली जिन्नामुहम्मद मियां मंसूर अंसारीनागनाथ नायकवाडीनाना फडणवीसनाना साहिबपी. कक्कनप्रफुल्ल चाकीप्रीतिलता वादेदारपुरुषोत्तम दास टंडनरामस्वामी वेंकटरमणराहुल सांकृत्यायनराजेन्द्र प्रसादराम प्रसाद बिस्मिलरानी लक्ष्मीबाईरासबिहारी बोससहजानंद सरस्वतीसंगोली रायण्णासरोजिनी नायडूसत्यपाल डांगशुजाउद्दौलाश्यामजी कृष्ण वर्मासिराजुद्दौलासुभाष चंद्र बोससुब्रमण्य भारतीसूर्य सेनश्यामाप्रसाद मुखर्जीतारकनाथ दासतात्या टोपेतिरुपुर कुमारनउबैदुल्लाह सिंधीवी० ओ० चिदम्बरम पिल्लैवी के कृष्ण मेननवल्लभभाई पटेलवंचिनाथनविनायक दामोदर सावरकरवीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याययशवंतराव होलकरऔर देखे
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