आँजणा

आँजणा
चौधरी, कणबी, पटेल, आँजणा जाट
अंजना की कुलदेवी
कूलदेवीश्री माँ अर्बुदा, माउंट आबू
देशभारत
वासित राज्यगुजरातराजस्थानमध्यप्रदेशउत्तरप्रदेशहरियाणामहाराष्ट्रबिहार और बंगाल

आँजणा (कलबी) समाज, अथवा आंजना एक भारतीय की एक प्राचीन खेतिहर जाति है और गोत्र है। कालान्तर में आंजना, कलबी, पटेल, आँजणा जाट/ आँजणा चौधरी, चौधरी तथा पाटीदार सहित कई उपजातियों का समूह बन गया है। पश्चिमी राजस्थान (मारवाड़)मेवाड़ सहित सीमावर्ती गुजरात राज्य के बनासकांठा, साबरकांठा सहित आस पास के आंचलों के ग्रामीण क्षेत्रों में इस जनजाति क बहुल्य है। कृषि एवं पशुपालन उनकी आय का प्रमुख स्रोत है।

वर्णक्षत्रिय,कृषक
पहचानचौधरी, पटेल, कणबी, देसाई, आँजणा जाट, आँजणा चौधरी आदि
कुलनामपटेल, चौधरी, देसाई, जाट, मौर्य, हुण, गुर्जर, काग, जुवा, सोलंकी, भाटिया, लोह, हाडीया,
धर्महिन्दू
व्यवसायकृषि एवं पशुपालन

इतिहास

सहस्रार्जुन के पुत्र जमदग्नि ऋषि के आश्रम में गए, ऋषि को टुकड़ों में काटकर उनकी हत्या कर दी।  तभी परशुराम यात्रा कर के वापस आश्रम में आये तो माता रेणुका ने रोने लगी और सभी जानकारी बताई। तब परशुराम का रोम-रोम क्रोधित हो गया और उनके हाथ में फर्शी (कुल्हाड़ी) लिया और क्षत्रियों को हरा दिया और ब्राह्मणों को दान में उनके राज्य दे दिए।  इस तरह, राम से लेकर कृष्ण तक 21 (इक्कीस) बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन किया गया।

जब मां अर्बुदा (कात्यायनी) की शरण में सहस्रार्जुन के छह पुत्र गए तो परशुराम उनकी तलाश में आबू आए, तो मां अर्बुदा ने कहा, “इन्होंने मेरे समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है, इसलिए उन्हें जीवन दान दें।  अब से ये लोग क्षत्रियत्व का त्याग कर देंगे और कृषि काम करेंगे। “मा अर्बुदा ने उनको बचाया तो उन्होंने मैया के पैर पकड़ लिए और आशीर्वाद मांगा। और कहा की,” अब से, आप हमारे  कुल देवी हैं, तो हमें मार्गदर्शन दें जीवित रहने वाले छह (6) बेटों में से, दो बेटे आबू पर रहे और खेती शुरू की। और चार बेटे उत्तर प्रदेश चले गए और खेती शुरू कर दी। जैसे-जैसे उनकी आबादी बढ़ती गई, वे उत्तर प्रदेश और हरियाणा में फैल गए।

टोडरमल ने राजस्थान के इतिहास के बारे में लिखा तब हो सकता है जाट किसान थे, लेकिन वे चंद्रवंश के क्षत्रिय हैं। जो कश्यप गोत्र के हैं। जाट आबू पर खेती करने के लगे और उन्होंने मा अर्बुदा को कुलदेवी के मान के आत्मसमर्पण कर दिया था, इसलिए जाट आँजणा चौधरियों की कुलदेवी हैं।

ऐतिहासिक रूप से, सोलंकी राजा भीमदेव की बेटी अंजना बाई, जो कि पाटन के सिंहासन पर थीं, उन्होंने माउंट आबू में अंजान किले का निर्माण किया इसलियें वहाँ रहने वाले लोगों को अंजना कहा जाता है।  सोलंकी एक चंद्रवंशी क्षत्रिय थे।  अतः इस मत के अनुसार भी अंजन क्षत्रिय हैं।[आपणे आँजणा 1]

“गजेटियर ऑफ धी म्बे प्रेसीडेंसी पार्ट-12(बारह)[1](खानदेश) में अंजना पाटीदारों के लिए निम्नलिखित लिखा है।  खानदेश जिले में दो प्रकार के गुर्जर हैं, रेव और डोर।  और रेव गुज्जर भीनमाल से निकल के मालवा होके खानदेश की और चले गए।  गजेटियर में उनकी कई शाखाओं के नाम हैं।  इसकी प्रमुख शाखाएँ हैं जैसे अंजना, आँजणा, आभय, पटलिया आदि।  इन शाखाओं में से, अंजना या अंजना नाम की शाखा स्पष्ट रूप से सूचित की गई है।

जब विदेशियों ने 953 ई.स (नौ सौ तिरपन) में भीनमाल पर आक्रमण किया तो कुछ गुर्जर भीनमाल छोड़कर अन्यत्र चले गए।  इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शामिल थे। इस बार आँजणा पाटीदार भीनमाल से लगभग 2,000 (दो हजार) बैलगाड़ी जोड़ के भीनमाल से पलायन कर कस चंद्रावती में आकर बस गए।  वहाँ से वह कच्छ के घानदार क्षेत्र में और वहाँ से गुजरात में आकर बस गए, जैसा कि भाट चारण की किताबों में और कुछ हद तक इतिहास के पन्नों में दर्ज है।  इन ऐतिहासिक नोटों से यह भी कहा जा सकता है कि आँजणा पाटीदार गुर्जर क्षत्रियों(यानी आर्य प्रजा) के प्रत्यक्ष वंशज हैं।

आँजणा पाटीदार की कुलदेवी “माँ अर्बुदा” हैं।  उन्हें कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है।  कात्यायनी नवदुर्गा का छठा अवतार है।  आँजणा की पारिवारिक देवी माउंट आबू में बिराजमान है। उनके मंदिर को अध्धरदेवी के नाम से भी जाना जाता है। अर्बुदाँचल आबू को ऋग्वेद में अर्बुदा पर्वत के रूप में वर्णित किया गया है।  माउंट आबुगिरी एक पवित्र भूमि है।  हजारों वर्षों से यह पर्वत ऋषियों की तपस्या का स्थान रहा है।

गुजरात में रहने वाले सभी आँजणा पाटीदार लोगों की कुलदेवी “माँ अर्बुदा” अर्थात माँ कात्यायनी हैं।  जिन्होंने परशुराम के कोप से क्षत्रियों को बचाया।  भारत में अंजना मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, कच्छ और महाराष्ट्र में रहते है।

उन्हें “आँजणा”, “आँजणा पटेल”, “अंजना कणबी/ कलबी” और “चौधरी” के रूप में जाना जाता है।  उनमें से कुछ खुद को ‘पटेल’, ‘चौधरी’, ‘देसाई’ के उपनामों से पुकारते हैं।  जबकि कुछ अपने उपनामों से खुद को ‘आँजणा’ या अपने मौर्य, हुण, गुर्जर, मालव-मालवी, काग, जुवा, सोलंकी, भाटिया, लोह, हाडीया कहते हैं। आँजणाओ का मुख्य व्यवसाय खेती है।  खेती के साथ-साथ वह पशुपालन का व्यवसाय भी करते है।

यूरोपीयन इतिहासकार एस.ए.  रोरिंग कच्छ में रहने वाले आँजणा की पहचान राजपूतों के रूप में थी और उनके नाम ‘अजाणी’, ‘अजानी’ बताते हैं।  जबकि ए.एस. अलटेकर और आर.सी.  मजूमदार जैसे भारतीय इतिहासकार इन लोगों को ‘अर्जुनिस’ कहते हैं।

अर्जुनक, अर्जुनायन, आर्जुनायन, आर्जुणायन शब्दों के ‘क’, ‘यन’ प्रत्यक्षो को निकाल के और ‘न’ का ‘ण’ करने पर अर्जुणा, आर्जुणा नाम निकल आया और फिर अर्जुणा का अपभ्रंश करने पर आँजणा शब्द का जन्म हुआ।  इस प्रकार मध्य एशिया का ‘अरजण’, पश्चिम एशिया का ‘ऐरझन’, यूनानी इतिहासकार जस्टिन का ‘अजिणी’, यूरोपीयन इतिहासकार ‘रोरिंग’ का अजाणी, काशीकाकार का अर्जुनी ‘, भारतीय इतिहासविदो तथा वेदों और पुराणों में ‘अर्जुनाका, आर्जुनायन ‘और’ आर्जुणायन’ शब्दों से मिल के आँजणा शब्द ने एक लंबा सफ़र तय किया है।[2]

अन्य इतिहास

चौधरी समाज के इतिहास पर कोई शिलालेख नहीं है। चौधरी समाज का यह इतिहास भाट-चारणों की किताबों और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों और इसकी स्वीकृति देने वाली अन्य किताबों की जानकारी के आधार पर लिखा गया है। देवेंद्र पटेल द्वारा लिखित महाजाती की संदर्भ पुस्तक भी इस इतिहास का प्रमाण देती है। परशुराम स्वयं ब्राह्मण और ऋषि थे। महाभारत में यह भी उल्लेख है कि परशुराम ने पितामह भीष्म और कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई थी। परशुराम ने इस पृथ्वी को इक्कीस बार निक्षत्रिय (क्षत्रिय विहीन) बनाया। जब उन्होंने अंततः पृथ्वी पर देखा, तो सहस्त्रार्जुन नामक एक क्षत्रिय राजा और उनके 100 पुत्र जीवित थे। परशुराम ने वहाँ पहुँच कर उसके 100 पुत्रों में से 92 को मार डाला। अन्य आठ बेटे युद्ध के मैदान से भाग गए और आबू पर ‘मा अर्बुदा’ के मंदिर के पीछे छिप गए। परशुराम वहां एक फ़रशी लेकर आए और उन्हें मारने की तैयार हुए। आठों घबरा गए और बचाने के लिए मा अर्बुदा से प्रार्थना की “हे मैया हमे बचाओ।” ‘माँ अर्बुदा’ प्रकट हुई और परशुराम से निवेदन किया, ” अरे ऋषिराज ये आठों अजनबी है। और उन्होंने मेरे सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। इसलिए मैं उन्हें मरने नहीं दूंगी। ” परशुराम ने कहा कि आठ में से भविष्य में अस्सी हजार होंगे और वह मेरे खिलाफ युद्ध छेड़ेंगे? मा अर्बुदा ने उत्तर दिया, “मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि ये आठ अब अपने हाथों में हथियार नहीं रखेंगे, आज से ये कृषि कार्य करेंगे और पृथ्वी के पुत्र बन के रहेंगे।” । ‘ परशुराम का क्रोध शांत हुआ। जब वे वापस गए, तो वो आठो बाहर आए, माँ के सामने अपने हाथ जोड़ कर खड़े हुए, और कहा, ‘मा। आज से तुम हमारी माँ हो। अब हमें रास्ता दिखाओ। ‘ मा ने कहा तुम अजनबी हो। आप यहाँँ कृषि काम करो। आज से लोग आपको आँजणा के रूप में पहचानेंगे। “आगे बढ़, आँजणा तेरा छोड़ू न साथ तनिक। बड़े मन से बाँटना तेरे घर धी दूध रहे अधिक।” आँजणा ने भारत के विभिन्न राज्यों में रहने लगे। खेती और पशुपालन के व्यवसाय के साथ भारत के राज्यों में फैल गए। जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल, राजस्थान और गुजरात। आज, आँजणा भारत के लगभग नौ राज्यों में रहते हैं और उन सभी ने मिलकर अखिल आँजणा महासभा का गठन किया। इसका मुख्य कार्यालय राजस्थान के आबू में है। उन्होंने देहरादून के पास एक बड़ा शिक्षण संस्थान भी स्थापित किया है।[3]

कलबी लोग अपने को हिंदू देवता हनुमान की माता अंजना से संबंधित मानते हैं और साथ ही राजपूत होने का दावा करते हैं।[4]

इन्हें भी देखें

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