भारत का राजनीतिक एकीकरण

स्वतंत्रता के समय ‘भारत‘ के अन्तर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे-

इन सभी क्षेत्रों को एक राजनैतिक इकाई के रूप में एकीकृत करना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का घोषित लक्ष्य था। भारत सरकार ने समय के साथ इन लक्ष्यों को कमोबेश हासिल किया।

भारत की एकता का इतिहास

भारतीय एकीकरण के महानायक सरदार वल्लभभाई पटेलचीन सीमा पर स्थित सिक्किम राज्य को १९७२ में भारत में विलय करके उसे २२वाँ भारतीय राज्य बनाया गया।

परिचय

सन् 1947 में स्वतंत्र होने के बाद भारत स्वतंत्र रियासतों में बंटा हुआ था। 15 अगस्त 1947 की तारीख लार्ड लुई माउण्टबेटन ने जानबूझ कर तय की थी क्योंकि ये द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा समर्पण करने की दूसरी वर्षगांठ थी। 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया था, तब माउण्टबेटन सेना के साथ बर्मा के जंगलों में थे। इसी वर्षगांठ को यादगार बनाने के लिए माउण्टबेटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के लिए तय किया था। किन्तु भोपाल के लोगों को भारत संघ का हिस्सा बनने के लिए बाद में दो साल और इंतजार करना पड़ा था। तब सरदार पटेल ने लगभग 562 देशी रियासतों को भारत में मिलाकर भारत को एक सूत्र में बांधा और भारत को मौजूदा स्वरूप दिया। एक कुशल प्रशासक होने के कारण कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें ’लौह पुरुष‘ के रूप में भी याद करता है।[1]

आजादी प्राप्ति के दौरान भारत में करीब 562 देशी रियासतें थीं। सरदार पटेल तब अंतरिम सरकार में उपप्रधानमंत्री के साथ देश के गृहमंत्री थे। जूनागढहैदराबाद और कश्मीर को छोडक़र 562 रियासतों ने स्वेच्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी।

वास्तव में, माउण्टबैटन ने जो प्रस्ताव भारत की आजादी को लेकर जवाहरलाल नेहरू के सामने रखा था उसमें ये प्रावधान था कि भारत के 565 रजवाड़े भारत या पाकिस्तान में किसी एक में विलय को चुनेंगे और वे चाहें तो दोनों के साथ न जाकर अपने को स्वतंत्र भी रख सकेंगे। इन 565 रजवाड़ों जिनमें से अधिकांश प्रिंसली स्टेट (ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का हिस्सा) थे में से भारत के हिस्से में आए रजवाड़ों ने एक-एक करके विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, या यूँ कह सकते हैं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा वीपी मेनन ने हस्ताक्षर करवा लिए।

बचे रह गए थे – हैदराबादजूनागढ़कश्मीर और भोपाल। इनमें से भोपाल का विलय सबसे अंत में भारत में हुआ। भारत संघ में शामिल होने वाली अंतिम रियासत भोपाल इसलिए थी क्योंकि पटेल और मेनन को पता था कि भोपाल को अंतत: मिलना ही होगा। जूनागढ़ पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर चुका था तो काश्मीर स्वतंत्र बने रहने की। जूनागढ़, काश्मीर तथा हैदराबाद तीनों राज्यों को सेना की मदद से विलय करवाया गया किन्तु भोपाल में इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी।

भोपाल जहां नवाब हमीदुल्लाह खान उस रियासत के नवाब थे जो भोपाल, सीहोर और रायसेन तक फैली हुई थी। इस रियासत की स्थापना 1723-24 में औरंगजेब की सेना के बहादुर अफगान योद्धा दोस्त मोहम्मद खान ने सीहोर, आष्टा, खिलचीपुर और गिन्नौर को जीत कर स्थापित की थी। 1728 में दोस्त मोहम्मद खान की मृत्यु के बाद उसके बेटे यार मोहम्मद खान के रूप में भोपाल रियासत को अपना पहला नवाब मिला था।

मार्च 1818 में जब नजर मोहम्मद खान नवाब थे तो एंग्लो भोपाल संधि के तहत भोपाल रियासत भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य की प्रिंसली स्टेट हो गई। 1926 में उसी रियासत के नवाब बने थे हमीदुल्लाह खान। अलीगढ़ विश्वविद्यालय से शिक्षित नवाब हमीदुल्लाह दो बार 1931 और 1944 में चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर बने तथा भारत विभाजन के समय वे ही चांसलर थे। आजादी का मसौदा घोषित होने के साथ ही उन्होंने 1947 में चांसलर पद से त्यागपत्र दे दिया था, क्योंकि वे रजवाड़ों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे।

नवाब हमीदुल्लाह 14 अगस्त 1947 तक सोच में थे कि वो क्या निर्णय लें। जिन्ना उन्हें पाकिस्तान में सेक्रेटरी जनरल का पद देकर वहाँ आने की पेशकश दे चुके थे और इधर रियासत का मोह था। 13 अगस्त को उन्होंने अपनी बेटी आबिदा को भोपाल रियासत का शासक बन जाने को कहा ताकि वे पाकिस्तान जाकर सेक्रेटरी जनरल का पद सभाल सकें, किन्तु आबिदा ने इससे इनकार कर दिया।

भोपाल का विलीनीकरण सबसे अंत में हुआ तो उसके पीछे एक कारण ये भी था कि नवाब हमीदुल्लाह जो चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर थे उनका देश की आंतरिक राजनीति में बहुत दखल था, वे नेहरू और जिन्ना दोनों के घनिष्ठ मित्र थे।

मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रीमंडल घोषित कर दिया था जिसके प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय थे। इस समय तक आते-आते भोपाल रियासत में विलीनीकरण को लेकर विद्रोह पनपने लगा था। साथ ही विलीनीकरण की सूत्रधार पटेल-मेनन की जोड़ी भी दबाव बनाने लगी थी।

एक और समस्या ये सामने आ गई थी कि चतुर नारायण मालवीय भी विलीनीकरण के पक्ष में हो चुके थे। प्रजामंडल विलीनीकरण आंदोलन का प्रमुख दल बन चुका था। अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर चले गये और दिसम्बर 1948 में भोपाल के इतिहास का जबरदस्त प्रदर्शन विलीनीकरण को लेकर हुआ, कई प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए गए जिनमें भाई रतनकुमार, ठाकुर लाल सिंह, डॉ शंकर दयाल शर्मा, नाम भी शामिल थे। पूरा भोपाल बंद था, राज्य की पुलिस आंदोलनकारियों पर पानी फेंक कर उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।

23 जनवरी 1949 को डॉ॰ शंकर दयाल शर्मा को आठ माह के लिए जेल भेज दिया गया। इन सबके बीच वीपी मेनन एक बार फिर से भोपाल आए मेनन ने नवाब को स्पष्ट शब्दों में कहा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता, भौगोलिक, नैतिक और सांस्कृतिक नजर से देखें तो भोपाल मालवा के ज्यादा करीब है इसलिए भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा। आखिरकार 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे सूत्र एक बार फिर से अपने हाथ में ले लिए। पंडित चतुरनारायण मालवीय इक्कीस दिन के उपवास पर बैठ चुके थे।

वीपी मेनन पूरे घटनाक्रम को भोपाल में ही रहकर देख रहे थे, वे लाल कोठी (वर्तमान राजभवन) में रुके हुए थे तथा लगतार दबाव बनाए हुए थे नवाब पर। और अंतत: 30 अप्रैल 1949 को नवाब ने विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। सरदार पटेल ने नवाब को लिखे पत्र में कहा -मेरे लिए ये एक बड़ी निराशाजनक और दुख की बात थी कि आपके अविवादित हुनर तथा क्षमताओं को आपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया जब देश को उसकी जरूरत थी।

अंतत: 1 जून 1949 को भोपाल रियासत, भारत का हिस्सा बन गई, केंद्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर श्री एनबी बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया और नवाब को मिला 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स। भोपाल का विलीनीकरण हो चुका था। लगभग 225 साल पुराने (1724 से 1949) नवाबी शासन का प्रतीक रहा तिरंगा (काला, सफेद, हरा) लाल कोठी से उतारा जा रहा था और भारत संघ का तिरंगा (केसरिया, सफेद, हरा) चढ़ाया जा रहा था।

  1. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम:1947 ने रियासतों को यह विकल्प दिया कि वे भारत या पाकिस्तान अधिराज्य (डामिनियम) में शामिल हो सकती हैं या एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य के रूप में स्वंय को स्थापित कर सकती हैं।

तत्कालीन समय में लगभग 500 से ज़्यादा रियासतें लगभग 48% भारतीय क्षेत्र एवं 28% जनसंख्या की कवर करती थीं। ये रियासते वैधानिक रूप से ब्रिटिश भारत के भाग नहीं थें, लेकिन ये ब्रिटिश क्राउन के पूर्णत: अधीनस्थ थीं। ये रियासते, राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों एवं अन्य उपनिवेशी शक्तियों के उदय को नियंत्रित करने में, ब्रिटिश सरकार के लिये एक सहायक के रूप में थीं। सरदार वल्लभ भाई पटेल (भारत के पहले उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री) को V.P. मेनन की सहायता से रियासतों के एकीकरण का कार्य सौंपा गया। राजाओं के बीच राष्ट्रवाद का आह्वान शामिल न होने पर अराजकता की आशंका जताते हुए, पटेल ने राजाओं को भारत में शामिल करने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने ‘प्रिवी पर्स’ (एक भुगतान, जो शाही परिवारों को भारत के साथ विलय पर पर हस्ताक्षर करने पर दिया जाना था) की अवधारणा को भी पुनर्स्थापित किया। कुछ रियासतों ने भारत में शामिल होने का निर्णय किया, तो कुछ ने स्वतंत्र रहने का, वहीं कुछ रियासतें पाकिस्तान का भाग बनना चाहती थीं।

त्रावनकोर

दक्षिण तटीय राज्य, त्रावनकोर, उन प्रथम रियायतों में से एक था जिसने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया था एवं कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्त्व पर प्रश्नचिह्न लगाया था। ऐसा कहा जाता है कि सर सी.पी. अबयर (त्रावनकोर के दीवान) ने यू.के. सरकार के साथ गुप्त संधि भी कर ली थी। यू.के की सरकार स्वतंत्र त्रावनकोर के पक्ष में थी क्योंकि यह क्षेत्र मोनोजाइट नामक खनिज से समृद्ध था, जो ब्रिटेन को नाभकीय हथियारों की दौड़ में बढ़त दिला सकता था। लेकिन केरल समाजवादी पार्टी के एक सदस्य द्वारा उनकी हत्या के असफल प्रयास के बाद, सी.पी. अय्यर ने भारत से जुड़ने का फैसला किया और 30 जुलाई, 1947 को त्रावनकोर भारत में शामिल हो गया।

जोधपुर

एक राजपूत रियासत, जहाँ का राजा हिंदू था और अधिकांश जनसंख्या हिंदू थी, असाधारण रूप से पाकिस्तान की ओर झुकाव रखता था। युवा एवं अनुभवहीन राजा धनवंत सिंह ने यह अनुमान लगाया कि पाकिस्तान के साथ उसकी रियासत की सीमा लगने के कारण वह पाकिस्तान से ज़्यादा अच्छे तरीके से सौदेबाज़ी कर सकता है। जिन्ना ने महाराज को अपनी सभी मांगों को सूचीबद्ध करने के लिये एक हस्ताक्षरित खाली पेपर दे दिया था। इन्होंने सैन्य एवं कृषकों की सहायता से हथियारों के निर्माण और आयात के लिये कराची बंदरगाह तक मुफ्त पहुँच का प्रस्ताव भी रखा। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए , पटेल ने तुरंत राजा से संपर्क किया और उसे पर्याप्त लाभों एवं प्रस्तावों का आश्वासन दिया। पटेल ने आश्वस्त किया कि हथियारों के आयात की अनुमति होगी। जोधपुर को काठियावाड़ से रेल के माध्यम से जोड़ा जाएगा, साथ ही अकाल के दौरान अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। 11 अगस्त, 1947 को महाराजा हनवंत सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये, इस प्रकार जोधपुर रियासत का भारतीय अधिराज्य में एकीकरण हो गया।

भोपाल

यह एक और रियासत थी जिसने संप्रभु एवं स्वतंत्र रहने की घोषणा की। यहाँ एक मुस्लिम नवाब, हमीदुल्ला खान, अधिसंख्यक हिंदू जनसंख्या पर शासन करता था। वह मुस्लिम लीग का करीबी मित्र एवं कॉग्रेंस का घोर विरोधी था। हालाँकि, उसने माउंटबेटन को लिखा कि कि वह एक स्वतंत्र रियासत चाहता है किंतु माउंटबेटन ने उसे उत्तर देते हुए लिखा कि ‘‘कोई की शासक अपने नजदीकी अधिराज्य (डामिनियम) से भाग नहीं सकता है।” जुलाई 1947, जब अधिकांश राजाओं ने भारत में शामिल होने का निर्णय लिया, तो अंतत: भोपाल के नवाब ने भी विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।’’

हैदराबाद

यह सभी रियासतों में सबसे बड़ी एवं सबसे समृद्धशाली रियासत थी, जो दक्कन पठार के अधिकांश भाग को कवर करती थी। इस रियासत की अधिसंख्यक जनसंख्या हिंदू थी, जिस पर एक मुस्लिम शासक निजाम मीर उस्मान अली, शासन करता था। इसने एक स्वतंत्र राज्य की मांग की एवं भारत में शामिल होने से मना कर दिया। इसने जिन्ना से मदद का आश्वासन प्राप्त किया और इस प्रकार हैदराबाद को लेकर कशमकश एवं उलझनें समय के साथ बढ़ती गईं। पटेल एवं अन्य मध्यस्थों के निवेदनों एवं धमकियाँ निजाम के मानस पर कोई फर्क नहीं डाल सकीं और उसने लगातार यूरोप से हथियारों के आयात को जारी रखा। परिस्थितियाँ तब भयावह हो गईं, जब सशस्त्र कट्टरपंथियों ने हैदराबाद की हिंदू प्रजा के खिलाफ़ हिंसक वारदातें शुरू कर दीं। 13 सितंबर, 1948 के ‘ऑपरेशन पोलों के तहत भारतीय सैनिकों को हैदराबाद भेजा गया। 4 दिन तक चले सशस्त्र संघर्ष के बाद अंतत: हैदराबाद भारत का अभिन्न अंग बन गया। बाद में निजाम के आत्मसमर्पण पर उसे पुरस्कृत करते हुए हैदराबाद राज्य का गवर्नर बनाया गया।

जूनागढ़

गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक रियासत, जो 15 अगस्त, 1947 तक भारत में शामिल नहीं हुई थी, की अधिकांश जनसंख्या हिंदू एवं राजा मुस्लिम था। 15 सितंबर, 1947 को नवाब मुहम्मद महाबत खानजी ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया और तर्क दिया कि जूनागढ़ समुद्र द्वारा पाकिस्तान से जुड़ा है। दो राज्यों के शासक मंगरोल एवं बाबरियावाड जो जूनागढ़ के अधीन थे, ने प्रतिक्रिया स्वरूप जूनागढ़ से स्वतंत्रता एवं भारत में शामिल होने की घोषणा की। इसकी अनुक्रिया में जूनागढ़ के नवाब ने सैन्यबल का प्रयोग कर इन दोनों राज्यों पर कब्जा कर लिया, परिणामस्वरूप पड़ोसी राज्यों के राजाओं ने भारत सरकार से मदद की अपील की। भारत सरकार मानती थी कि यदि जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल होने की अनुमति दे दी गई तो सांप्रदायिक दंगे और भयावह रूप धारण कर लेंगे, साथ ही बहुसंख्यक हिंदू जनसंख्या, जो कि 80% है, इस फैसले को स्वीकार नहीं करेगी। इस कारण भारत सरकार ने ‘‘जनमत संग्रह’’ से विलय के मुद्दे के समाधान का प्रस्ताव रखा। इसी दौरान भारत सरकार ने जूनागढ़ के लिये ईंधन एवं कोयले की आपूर्ति को रोक दिया एवं भारतीय सेनाओं ने मंगरोल एवं बाबरियावाड पर कब्ज़ा कर लिया। पाकिस्तान, भारतीय सेनाओं की वापसी के शर्त के साथ ‘जनमत संग्रह’ के लिये सहमत हो गया, लेकिन भारत ने इस शर्त को खारिज कर दिया। 7 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ की अदालत ने भारत सरकार को राज्य का प्रशासन अपने हाथ में लेने के लिये आमंत्रित किया। जूनागढ़ के दीवान सर शाह नवाज भुट्टो (सुप्रसिद्ध जुल्फीकार अली भुट्टो के पिता), ने हस्तक्षेप के लिये भारत सरकार को आमंत्रित करने का निर्णय लिया। फरवरी, 1948 को ‘जनमत संग्रह’ कराया गया, जो लगभग सर्वसम्मति से भारत में विलय के पक्ष में गया।

कश्मीर

एक ऐसी रियासत जहाँ की बहुसंख्यक जनसंख्या मुस्लिम थी, जबकि राजा हिंदू था। राजा हरि सिंह ने पाकिस्तान या भारत में शामिल होने के लिये विलय पत्र पर कोई निर्णय न लेते हुए ‘मौन स्थिति’ बनाए रखी। इसी दौरान, पाकिस्तानी सैनिकों एवं हथियारों से लैस आदिवासियों ने कश्मीर में घुसपैठ कर हमला कर दिया। महाराजा ने भारत सरकार से मदद की अपील की। राजा ने शेख अब्दुल्ला को अपने प्रतिनिधि के रूप में सहायता के लिये दिल्ली भेजा। 26 अक्तूबर, 1947 को राजा हरि सिंह ने ‘विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर कर दिये।[2] इसके तहत संचार, रक्षा एवं विदेशी मामलों को भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में लाया गया। 5 मार्च, 1948 को महाराजा हरि सिंह ने अंतरिम लोकप्रिय सरकार की घोषणा की जिसके प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला बने। 1951 में राज्य संविधान सभा निर्वाचित हुई एवं 31 अक्तूबर, 1951 में इसकी पहली बार बैठक हुई। 1952 में, दिल्ली समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को ‘विशेष दर्जा’ प्रदान किया गया। 6 फरवरी, 1954 को, जम्मू-कश्मीर की संविधान ने भारत संघ के साथ विलय का अनुमोदन किया। जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 3 के अनुसार, जम्मू -कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और रहेगा। अनुच्छेद 370 के तहत, 5 अगस्त, 2019 को भारत के राष्ट्रपति ने संवैधानिक आदेश, 2019 की उद्घोषणा की जिसमें जम्मू-कश्मीर को दिये गए ‘विशेष राज्य’ के दर्जे को खत्म कर दिया गया।

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

  1.  [1]
  2.  “भारत में कश्मीर का विलय?”.

बाहरी कड़ियाँ

[छुपाएँ]देवासंभारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन
इतिहासउपनिवेशपोर्टो ग्रांडे दे बंगालडच बंगालईस्ट इण्डिया कम्पनीब्रिटिश राजफ्रांसीसी भारतपुर्तगाली भारतप्लासी का युद्धबक्सर का युद्धआंग्ल-मैसूर युद्ध पहलादूसरातीसराचौथाआंग्ल-मराठा युद्ध पहलादूसरातीसरापॉलीगर का युद्धवेल्लोर विद्रोहप्रथम आंग्ल-सिख युद्धद्वितीय आंग्ल-सिख युद्धसन्यासी विद्रोह1857 की क्रांतिरैडक्लिफ़ रेखाऔर
दर्शनशास्र
और विचारधारा
भारतीय राष्ट्रवादहिंदू राष्ट्रवादआंबेडकरवादगांधीवादखिलाफत आन्दोलनभारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादसत्याग्रहसमाजवादस्वदेशी आन्दोलनस्वराज
घटनाक्रम और
आंदोलन
बंगाल का विभाजन (1905)बंगाल का विभाजन (1947)क्रांतिकारी आन्दोलनकलकत्ता दंगादिल्ली-लाहौर षडयंत्रद इंडियन सोसियोलोजिस्टसिंगापुर विद्रोहहिंदु-जर्मन षडयंत्रचम्पारण सत्याग्रहखेड़ा सत्याग्रहरॉलेट कमेटीरॉलेट एक्टजालियाँवाला बाग हत्याकांडनोआखाली नरसंहारअसहयोग आन्दोलनक्रिसमस दिवस षडयंत्रकुली-बेगार आन्दोलनचौरीचौरा काण्ड, 1922काकोरी काण्डकिस्सा-ख्वानी बाजार नरसंहारझण्डा सत्याग्रहबारडोली सत्याग्रहसाइमन कमीशननेहरु रिपोर्टजिन्ना के चौदह तर्कपूर्ण स्वराजदांडी मार्चधारासना सत्याग्रहवेदारायणम मार्चचटगांव शस्त्रागार कांडगांधी-इरविन समझौतागोलमेज सम्मेलन1935 का अधिनियमऔंध प्रयोगहिन्द सेनाक्रिप्स मिशनभारत छोड़ोबॉम्बे विद्रोहयानौन का विद्रोहभारत की अंतःकालीन सरकारस्वतंत्रता दिवसप्रजामंडल आन्दोलन
संस्थायेंअखिल भारतीय किसान सभाअखिल भारतीय मुस्लिम लीगअनुशीलन समितिआर्यसमाजआज़ाद हिन्दबर्लिन समितिग़दर पार्टीहिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशनभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इण्डिया हाउसहोम रूल आन्दोलनभारतीय स्वतंत्रता लीगआज़ाद हिन्द फ़ौजयुगान्तरखाकसार आंदोलनलाल कुर्ती आन्दोलनस्वराज पार्टीऔर देखे
समाज
सुधारक
ए वैद्यनाथ अय्यरअय्या वैकुंदरअय्यंकलीबी आर अम्बेडकरबाबा आमटेबाल गंगाधर तिलकदयानंद सरस्वतीधोंडो केशव कर्वेजी. सुब्रमण्य अय्यरगाज़ुलू लक्ष्मीनरसू चेट्टीगोपाल गणेश आगरकरगोपाल हरि देशमुखगोपालदास अंबादास देसाईईश्वर चंद्र विद्यासागरजे॰ बी॰ कृपलानीज्योतिराव फुलेकंदुकूरि वीरेशलिंगम्महादेव गोविंद रानडेमहात्मा गांधीमुत्तुलक्ष्मी रेड्डीनारायण गुरुनिरालम्ब स्वामीपंडिता रमाबाईपेरियार ई वी रामसामीराम मोहन रायआर. श्रीनिवासनसहजानंद सरस्वतीसावित्रीबाई फुलेशाहूभगिनी निवेदिताअरविन्द घोषसैयद अहमद खानवक्कम मौलवीविनायक दामोदर सावरकरविनोबा भावेविट्ठल रामजी शिंदेविवेकानंद
स्वतंत्रता
सेनानी
अबुल कलाम आजादअक्कम्मा चेरियनअच्युत पटवर्धनए.के. फजलुल हकअल्लूरी सीताराम राजूअन्नपूर्णा महाराणाएनी बेसेंटअशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँबाबू कुंवर सिंहबाघा यतीनबहादुर शाह द्वितीयबख़्त खानबाल गंगाधर तिलकबसावन सिंहबेगम हजरत महलभगत सिंहभारतीदासनभवभूषण मित्रभीखाजी कामाभूपेन्द्र कुमार दत्तबिधान चंद्र रॉयविपिनचंद्र पालसी. राजगोपालचारीचंद्रशेखर आजादचितरंजन दासदादाभाई नौरोजीदयानंद सरस्वतीधन सिंह गुर्जरगोपाल कृष्ण गोखलेगोविंद बल्लभ पंतलाला हरदयालहेमू कालाणीइनायतुल्ला खान माश़रिकीयतीन्द्र मोहन सेनगुप्तयतीन्द्रनाथ दासजवाहर लाल नेहरूके. कामराजकन्हैयालाल माणिकलाल मुंशीकर्तार सिंह सराभाख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ानखुदीराम बोसश्री कृष्ण सिंहलाला लाजपत रायएम. भक्तवत्सलमएम एन रायमहादजी शिंदेमहात्मा गांधीमदनमोहन मालवीयमंगल पांडेमीर कासिममिथुबेन पेटिटमुहम्मद अली जौहरमुहम्मद अली जिन्नामुहम्मद मियां मंसूर अंसारीनागनाथ नायकवाडीनाना फडणवीसनाना साहिबपी. कक्कनप्रफुल्ल चाकीप्रीतिलता वादेदारपुरुषोत्तम दास टंडनरामस्वामी वेंकटरमणराहुल सांकृत्यायनराजेन्द्र प्रसादराम प्रसाद बिस्मिलरानी लक्ष्मीबाईरासबिहारी बोससहजानंद सरस्वतीसंगोली रायण्णासरोजिनी नायडूसत्यपाल डांगशुजाउद्दौलाश्यामजी कृष्ण वर्मासिराजुद्दौलासुभाष चंद्र बोससुब्रमण्य भारतीसूर्य सेनश्यामाप्रसाद मुखर्जीतारकनाथ दासतात्या टोपेतिरुपुर कुमारनउबैदुल्लाह सिंधीवी० ओ० चिदम्बरम पिल्लैवी के कृष्ण मेननवल्लभभाई पटेलवंचिनाथनविनायक दामोदर सावरकरवीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याययशवंतराव होलकरऔर देखे
ब्रिटिश नेतावेवेलकैनिंगकॉर्नवालिसइर्विनचेम्सफोर्डकर्जनरिपनमिंटोडलहौजीबैन्टिकमाउंटबेटनवैलेस्लीलिटनक्लाइवआउट्रमक्रिप्सलिनलिथगोहेस्टिंग्स
स्वतंत्रताकैबिनेट मिशनभारत में फ्रेंच उपनिवेशों का अधिग्रहणसंविधानभारतीय गणराज्यगोवा मुक्ति संग्रामभारतीय स्वतंत्रता अधिनियमभारत का विभाजनराजनीतिक एकीकरणशिमला सम्मेलन

श्रेणी

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *