जीनोमिक्स

जीनोमिक्स एक विज्ञान है जिसमे हम आर – डीएनए,डी एन ए अनुक्रमण तकनीक एवं जैव सूचना विज्ञान का उपयोग करके जीनोम की संरचना, कार्य एवं अनुक्रमण का अध्ययन करते हैं। यह विधा जीवों के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण का पता लगाने का प्रयास है। इस विधा के अन्तर्गत जीनोम के अन्दर एपिस्टासिस, प्लियोटरोपी एवं हेटरोसिस जैसे होने वाली प्रक्रियाओ का भी अध्ययन किया जाता है।

इतिहास

शब्द-साधन

जीनोम शब्द का प्रयोग सबसे पहले १९२६ में अंग्रेजी भाषा में किया गया[1]।जीनोमिक्स शब्द का सबसे पहले प्रयोग डाक्टर टॉम रॉड्रिक ने १९८६ में किया [2]

प्रारंभिक अनुक्रमण प्रयास

डाक्टर रॉबर्ट डब्ल्यू हौली और उनके सहयोगीयो ने मिलकर १९६४ में प्रथम न्यूक्लिक अनुक्रमण का पता लगाया। यह एलानीन टी-आर एन ए के राइबोन्यूक्लियोटाइड का अनुक्रमण था।[3][4] १९७२ में वाल्टर फायर्स एवं उनकी टीम ने मिलकर जीवाणुभोजी एमएस२ कोट प्रोटीन के जीन का अनुक्रमण ज्ञात किया।[5] फ्रेडरिक सैंगर और उनके सहयोगीयों ने डी एन ए अनुक्रमण को पता लगाने की तकनीक के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी तकनीक के कारण जीनोम अनुक्रमण परियोजना की कल्पना की जा सकी[6]। इस कार्य के लिये फ्रेडरिक सैंगर और गिलबर्ट को १९८० का नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। १९८१ में सर्व प्रथम मानवीय माइटोकॉन्ड्रिया के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण का पता लगाया[7]। इसके पश्चात १९८६ में क्लोरोप्लास्ट, १९९२ में यीस्ट एवं १९९५ में एच इंफ्लुएंजा के जीनोम अनुक्रमण की खोज हुई[8][9][10][11]। २००१ में मानवीय जीनोम परियोजना का प्रारूप तैयार किया गया। इस परियोजना के अन्तर्गत एक व्यक्ति विशेष के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण का पता लगाने के कार्य की रूपरेखा तैयार की गयी। यह परियोजना २००३ में पूरी की गयी।

इस्तेमाल

जीव विज्ञान में जीन और जीनोम का महत्व किसी भवन की नींव की तरह होता है। अतः जीनोम परियोजना के द्वारामिलने वाली सूचना अति महत्वपूर्ण होती है। जीनोमिक्स का उपयोग जैवप्रौद्योगिकी, मेडिकल, मानवशास्त्र एवं सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में किया जाता है। कृत्रिम जीवविज्ञान के क्षेत्र में भी इसका प्रयोग किया जाता है[12]

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