जलवायु परिवर्तन कारकों से पृथ्वी के अक्ष में परिवर्तन

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चर्चा में क्यों?

अमेरिकन जियोफिज़िकल यूनियन (AGU) के ‘जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि 1990 के दशक से वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियरों के पिघलने से पृथ्वी का अक्षीय घूर्णन सामान्य से अधिक गति कर रहा है।

  • जबकि इस परिवर्तन से दैनिक जीवन के प्रभावित होने की उम्मीद नहीं है लेकिन यह कुछ मिलीसेकंड तक दिन की लंबाई को परिवर्तित कर सकता है।
Axial-Tilt

प्रमुख बिंदु

पृथ्वी की घूर्णन धुरी :

  • यह वह रेखा है जिस पर पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर घूमती है।
    • पृथ्वी का अक्षीय झुकाव (जिसे अंडाकार आकृति के रूप में भी जाना जाता है) लगभग 23.5 डिग्री है। इस अक्षीय झुकाव के कारण, सूर्य वर्ष भर विभिन्न कोणों पर विभिन्न अक्षांशों पर चमकता है। पृथ्वी के अक्ष का यह झुकाव विभिन्न मौसमों के लिये भी ज़िम्मेदार है।
  • यह ग्रहों के अक्षीय सतह को जिन बिंदुओं पर काटता है, उन्हें भौगोलिक ध्रुव (उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव) कहते है।
    • ध्रुवों का स्थान निश्चित नहीं है। ग्रह के चारों ओर वितरित पृथ्वी के द्रव्यमान में परिवर्तन के कारण धुरी चलायमान है। इस प्रकार धुरी या अक्ष के घूमने पर ध्रुव गति करता है और इस गति को “ध्रुवीय गति” कहा जाता है।
    • सामान्य तौर पर ध्रुवीय गति जलमंडल, वायुमंडल, महासागरों या पृथ्वी में ठोस परिवर्तन के कारण होती है लेकिन अब जलवायु परिवर्तन उस मार्ग को प्रभावित कर रहा है जिसमें ध्रुवीय भंवर या पोलर वोर्टेक्स जैसी हवाएँ चलती है।
  • नासा के अनुसार, 20 वीं शताब्दी के आँकड़ों से पता चलता है कि धुरी का घुमाव प्रति वर्ष लगभग 10 सेंटीमीटर प्रवाहित होता है। एक सदी में ध्रुवीय गति 10 मीटर से अधिक होती है।

नए अध्ययन के परिणाम:

  • 1990 के दशक से जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरों में अरबों टन हिमाच्छादित बर्फ पिघल गई है। यही कारण है कि पृथ्वी की ध्रुवीय दिशाओं में परिवर्तन हो रहा है।
  • 1990 के दशक से जलमंडल में परिवर्तन के कारण उत्तरी ध्रुव एक नए मार्ग का अनुसरण करते हुए पूर्व दिशा की ओर स्थानांतरित हो गया है।(जिसका अर्थ है कि पृथ्वी पर जल का भंडार है)। 
  • वर्ष 1995 से 2020 तक इसके प्रवाह की औसत गति 1981 से 1995 की तुलना में 17 गुना तीव्र थी। 
  • इसके अतिरिक्त पिछले चार दशकों में ध्रुवीय प्रवाह लगभग 4 मीटर तक हुआ है।
  • यह गणना नासा के ‘ग्रेविटी रिकवरी एंड क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट’ (GRACE) मिशन के उपग्रह डेटा पर आधारित थी। 

ध्रुवीय प्रवाह के कारण:

  • बर्फ पिघलना:
    • 1990 के दशक में ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ के तेज़ी से पिघलने का सबसे संभावित कारण ध्रुवीय प्रवाहों का दिशात्मक परिवर्तन था।
    • जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघलते हैं, जल का द्रव्यमान पुन:विस्तारित होता है, जिससे ग्रहों की धुरी में स्थानांतरण होता है।
  • गैर-हिमनद क्षेत्रों में परिवर्तन (भौमिकी जल संग्रहण): 
    • गैर-हिमनद क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और भूजल के दोहन के कारण सिंचाई और अन्य मानवजनित गतिविधियों में परिवर्तन होता है।
  • भू-जल रिक्तिकरण:
    • भूजल में कमी भी इस घटना में इजाफा करती है। चूँकि पेयजल, उद्योगों या कृषि के लिये प्रत्येक वर्ष भूमि के अंदर से लाखों टन जल बाहर निकाला जाता है, अंततः यह जल समुद्र में शामिल हो जाता है, जिससे ग्रह के द्रव्यमान का पुनर्वितरण होता है।
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