आयनमंडल आधारित भूकंपीय निगरानी

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प्रीलिम्स के लिये:आयनमंडल, भू-कंपीय आयनमंडल अव्यवस्था/कंपन (CIP) मेन्स के लिये:वायुमंडलीय परतों का महत्त्व 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology- DST) के एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान ‘भारतीय भू-विज्ञान संस्थान’ (Indian Institute of Geology- IIG) के वैज्ञानिकों द्वारा आयनमंडल से भूकंपीय स्रोतों की विशेषताओं का पता लगाने के लिये अधिक तीव्रता वाले भूकंपों का अध्ययन किया गया है।

मुख्य बिंदु:

  • यह शोध IIG के अंतःविषय कार्यक्रम ‘कपलेड लिथोस्फीयर-एटमॉस्फियर- आयनोस्फियर-मैग्नेटोस्फीयर सिस्टम’ (CLAIMS) का एक भाग है। 

CLAIMS:

  • CLAIMS भूकंप के साथ-साथ सुनामी जैसी विवर्तनिक प्रक्रियाओं के दौरान वातावरण में ऊर्जा हस्तांतरण संबंधी शोध कार्यों पर केंद्रित है।

CLAIMS का उद्देश्य:

  • सह-भूकंपीय आयनमंडलीय कंपन (CIP) का स्थानिक वितरण, उपकेंद्र के आसपास भूमि विरूपण पैटर्न को अच्छी तरह से प्रतिबिंबित कर सकता है तथा CIP का वितरण आयनमंडलीय भेदी बिंदु (Ionospheric piercing point- IPP)  ऊँचाई पर अनुमानित है। CLAIMS के माध्यम से इनका संयुक्त अध्ययन किया जाता है। 
  • सह-भूकंपीय आयनमंडलीय अव्यवस्था/कंपन (Co-seismic Ionospheric Perturbations- CIP) का निर्धारण ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम ( Global Positioning System- GPS) द्वारा मापित कुल इलेक्ट्रॉन सामग्री (Total Electron Content- TEC) का उपयोग करके किया गया। TEC एक रेडियो ट्रांसमीटर तथा रिसीवर के मार्ग के मध्य मौजूद इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या है। 
  • IIG के वैज्ञानिकों ने हाल ही में आए भूकंपों यथा- वर्ष 2012 में हिंद महासागर, वर्ष 2015 में नेपाल तथा वर्ष 2016 के ऑस्ट्रेलिया-प्रशांत क्षेत्र के भूकंप का आयनमंडल पर प्रभाव का अध्ययन किया है।
  • IIG के वैज्ञानिकों ने गैर-विवर्तनिकी कारकों को आयनमंडल में उत्पन्न सह-भूकंपीय आयनमंडलीय अव्यवस्था का प्रमुख कारण माना है।

सह भू-कंपीय आयनमंडल अव्यवस्था/कंपन (CIP):

  • सामान्यत: जब कोई भूकंप आता है तो भू–पर्पटी में उत्पन्न उभार के कारण वायुमंडल में दबाव तरंगें (Compressional Waves) बनती हैं।
  • ये तरंगें अपने उत्पत्ति क्षेत्र (अधिकेन्द्र) के ऊपर स्थित वायुमंडल के कम घनत्व वाले क्षेत्र में तेज़ी से फैलती हैं तथा वायुमंडलीय ऊँचाई के साथ इसके आयाम में वृद्धि होती है। 
  • आयनमंडल में पहुँच कर ये तरंगें आयनमंडलीय इलेक्ट्रॉन घनत्व को पुनर्वितरित करती हैं तथा इलेक्ट्रॉन घनत्व अव्यवस्था (Electron Density Perturbations- EDP) उत्पन्न करती हैं, जिसे सह भू-कंपीय आयनमंडल अव्यवस्था/कंपन (CIP) के रूप में भी जाना जाता है।
JGR

CIP का अध्ययन:

  • CIP की विशेषताओं का अध्ययन करने में विभिन्न आयनमंडलीय ध्वनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन वैश्विक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली (Global Navigation Satellite System- GNSS) आधारित तकनीक व्यापक स्थानिक तथा कालिक जानकारी प्रदान करता है।
  • CIP मुख्यत: गैर विवर्तनिक दबाव प्रक्रियाओं यथा- उपग्रह ज्यामिति, भू-चुंबकीय क्षेत्र ध्वनिक तरंग युग्मन, आयनमंडल में आयनीकरण घनत्व आदि द्वारा नियंत्रित होता है, जिसका निर्धारण अनुरेखण मॉडल के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

CIP निर्धारण में चुनौतियाँ: 

  • आयनमंडल एक अत्यधिक गतिशील क्षेत्र है। आयनमंडल के इलेक्ट्रॉन घनत्व में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था का पता आयमंडल के ऊपरी (जैसे- सौर, भू-चुंबकत्व) या नीचे (जैसे- निचले वायुमंडलीय, भूकंपीय आदि) की विभिन्न गतिविधियों के आधार पर लगाया जाता है। CIP की पहचान करते समय यही एक बड़ी चुनौती है।

अध्ययन का महत्त्व:

  • यह अध्ययन CIP निर्माण के पीछे के कारणों की पहचान करने के क्रम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। 
  • अध्ययन बताता है कि CIP को गैर-विवर्तनिकी प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिये।
  • अध्ययन आयनमंडल आधारित उपकरणों के डिज़ाइन करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

आयनमंडल:

  • वायुमंडल संस्तरों में आयनमंडल 80 से 400 किलोमीटर के बीच स्थित है। इसमें विद्युत आवेशित कण पाए जाते हैं, जिन्हें आयन कहते हैं। अत: इस वायुमंडलीय परत को आयनमंडल के रूप में जाना जाता है। 
  • पृथ्वी द्वारा भेजी गई रेडियो तरंगे इस संस्तर द्वारा वापस लौटा दी जाती है। यहाँ ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान में वृद्धि होती है। 
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