एटालिन जलविद्युत परियोजना

  • सामान्य अध्ययन-I
  • ऊर्जा
  • सामान्य अध्ययन-III
  • वृद्धि एवं विकास
  • आधारिक संरचना

प्रीलिम्स के लिये:

एटालिन हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना, दिबांग नदी की भौगोलिक अवस्थिति

मेन्स के लिये:

भारत की जलविद्युत क्षमता और उससे संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 3097 मेगावाट की एटालिन परियोजना के कारण जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन की अनुशंसा की है।

अवस्थिति

  • यह परियोजना दिबांग नदी पर प्रस्तावित है। इसके पूर्ण होने की समयावधि 7 वर्ष निर्धारित की गई है।
    • दिबांग नदी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है जो अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर गुज़रती है।
  • परियोजना के अंतर्गत दिबांग की सहायक नदियों (दिर तथा टैंगो) पर दो बांधों के निर्माण की परिकल्पना की गई है।
  • यह परियोजना हिमालय के सबसे समृद्ध जैव-भौगोलिक क्षेत्र के अंतर्गत आती है तथा यह पुरापाषाणकालीन, इंडो-चाइनीज़ और इंडो-मलयन जैव-भौगोलिक क्षेत्रों के संधि-स्थल पर स्थित होगी।

महत्त्व:

  • भारत सरकार द्वारा यह परियोजना चीन से आने वाली नदियों पर प्राथमिक उपयोगकर्त्ता अधिकार स्थापित करने और उत्तर-पूर्व में परियोजनाओं को तेज़ करने के उद्देश्य से प्रस्तावित है।
  • इस परियोजना के भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक होने की उम्मीद है।

मुद्दे:

  • इस परियोजना से कुल 18 गाँवों के निवासी प्रभावित होंगे।
  • इसके तहत लगभग 2,80,677 पेड़ों की कटाई होगी और विश्व स्तर पर लुप्तप्राय 6 स्तनधारी प्रजातियों के अस्तित्व के लिये खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • इस क्षेत्र में पक्षियों की 680 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो भारत में पाई जाने वाली कुल एवियन प्रजातियों (Avian Species) का लगभग 56% है।

नोट:

  • जैव भौगोलिक क्षेत्र, समान पारिस्थितिकी, बायोम प्रतिनिधित्व, समुदाय और प्रजातियों की वृहद् विशिष्ट इकाइयाँ हैं। जैसे हिमालय, पश्चिमी घाट।
  • पुरापाषाण क्षेत्र में आर्कटिक और शीतोष्ण यूरेशिया, आर्कटिक क्षेत्र में महाद्वीप के आसपास के सभी द्वीप, जापान के समुद्री क्षेत्र और उत्तरी अटलांटिक के पूर्वी हिस्से शामिल हैं।
    • इसमें मैकरोल द्वीप, भूमध्यसागरीय उत्तरी अफ्रीका और अरब भी शामिल हैं।
  • इंडो-मलयन प्रांत की प्राकृतिक सीमाओं के अंतर्गत, उष्णकटिबंधीय एशिया में पाकिस्तान के बलूचिस्तान पहाड़ों से लेकर हिमालय शिखर के दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्व तक, इसके अलावा इसमें संपूर्ण दक्षिणपूर्वी एशिया, फिलीपींस और चीन की उष्णकटिबंधीय दक्षिणी सीमा के साथ ताइवान भी शामिल है।
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